“जीवन व्यर्थ है, यदि जीवन में कोई उद्देश्य न हो।
क्या केवल श्वास को अंदर लेना और बाहर छोड़ना ही जीवन है?
क्या बच्चों को जन्म देना ही जीवन है?
क्या धन एकत्र करना ही जीवन है?
क्या भ्रमित होकर इधर-उधर दौड़ते रहना ही जीवन है?
क्या हर समय व्यस्त रहना ही जीवन है?
क्या बुढ़ापा, शरीर की कंपकंपी, रोग, अज्ञान, अभाव, पीड़ा और दुःख ही जीवन है?
जब हमें अपने जीवन का उद्देश्य ही ज्ञात नहीं हो, तब हम उन पशुओं के समान हैं जो किसी अज्ञात शक्ति से विवश होकर निरुद्देश्य इधर-उधर भटकते रहते हैं। जिन्हें स्वयं यह भी ज्ञात नहीं होता कि वे किस मार्ग पर खड़े हैं। उन्हें स्वयं यह भी पता नहीं होता कि यात्रा कहाँ समाप्त होगी और उनका लक्ष्य क्या है।
जब मार्ग ही अज्ञात हो, तब उस मार्ग पर चलना एक अंधे मनुष्य के चलने के समान होता है। जब हमें सुखी जीवन जीने का सूत्र ज्ञात नहीं है, जब हमारे पास जीवन का ज्ञान और दर्शन नहीं है, तब हम इसको जीवन कैसे कह सकते हैं?
हम तो केवल अपने मृत शरीर को कंधों पर उठाए निरंतर चलते जा रहे हैं। एक क्षण के लिए हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या हमने अपने जीवन को पशु जीवन से ऊपर उठाया है?
क्या हमने अपने जीवन का लक्ष्य समझा है?
क्या हमें अपना लक्ष्य का पता है?
क्या हमें उस मार्ग का ज्ञान है जिस पर हम खड़े हैं?
हमने कभी इस पर विचार ही नहीं किया।
हमने भोग और कष्ट को ही जीवन मान लिया है, हमने श्वास-प्रश्वास को ही जीवन स्वीकार कर लिया है।
जीवन वही है, जिसके सूत्र हमारे हाथ में हों।
जीवन वही है, जिसका मर्म हमें ज्ञात हो।
समाज की भाषा में और विज्ञान की भाषा में तो हम जीवित हैं, परंतु शास्त्रों के अनुसार हम मृत हैं।
क्योंकि महान प्राचीन भारतीय शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति चेतन नहीं है, जिसे यह ज्ञान नहीं है कि मैं कौन हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? मुझे कहाँ पहुँचना है? वह व्यक्ति मृत है।
जब तक हम जीवन का मर्म, जीवन का दर्शन नहीं समझते, वास्तविक अर्थों में हम जीवित नहीं हैं।”
— पूज्य सद्गुरुदेव डॉ. श्री नारायण दत्त श्रीमाली जी
परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज
सनातन धर्म मे प्रवेश
सनातन धर्म में यात्रा कहाँ से आरम्भ होती है?
आज के समय में, असंख्य गुरुओं, साधनाओं और शिक्षाओं के बीच साधक सामान्यता यह प्रश्न करते हैं कि “मैं कहाँ से प्रारम्भ करूँ?”
सनातन धर्म की वास्तविक समझ का आरम्भ होता है—
आत्म-साक्षात्कार से
अर्थात् स्वयं जीवन को समझने से।
मंत्र, योग या ध्यान सीखने से पहले यह जानना अनिवार्य है—
मैं कौन हूँ?
इस अस्तित्व की रचना क्यों हुई?
इस अस्तित्व को संचालित कौन करता है?
इसमें मेरी भूमिका क्या है?
उमा कैलाश फ़ाउंडेशन में हम आपके लिए एकमात्र संरचित और वैज्ञानिक मार्ग प्रस्तुत करते हैं, जो इन्हीं मूल प्रश्नों से आरम्भ होता है—
यही सनातन धर्म की वास्तविक आधारशिला है
और यही मार्ग आपको चरणबद्ध रूप से
आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
YouTube पर हमने संक्षेप में SRS Series के 42 विडियो उपलब्ध किये हैं जो कि निःशुल्क हैं।
इस पृष्ठ पर जा कर SRS 1 से ले कर SRS 42 तक के विडियो निःशुल्क देखें। इस आत्म-साक्षात्कार के क्रम से सनातन धर्म की अपनी यात्रा प्रारम्भ करें।
यह सनातन धर्म की पूर्ण समझ का
पहला और सबसे अनिवार्य चरण है।
आत्म बोधः अपने स्वयं के जीवन को समझें।
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सनातन शिक्षा के प्रति
हमारा दृष्टिकोण
हम पाठकों को यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि सनातन धर्म की शिक्षा देने के प्रति हमारा दृष्टिकोण पारंपरिक अपेक्षाओं से भिन्न है।
कृपया यह अपेक्षा न करें कि आपको यहाँ माथे पर चौड़ा तिलक लगाए, दाढ़ी बढाये, भगवा वस्त्र धारण किए हुए कोई गुरु मिलेंगे, जो आपको आश्रम में रहने के लिए कहें, भव्य प्रवचन दें या केवल शास्त्रों की कथाएँ सुनाएँ।
उमा कैलाश फ़ाउंडेशन के प्रवर्तक भारत के एक प्रतिष्ठित संस्थान से शिक्षित योग्य इंजीनियर हैं।
६०० से अधिक शास्त्रों के अध्ययन के पश्चात हमें किसी भी ग्रंथ में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिला, जिसमें चौड़ा तिलक लगाने, दाढ़ी रखने या भगवा वस्त्र धारण करने का निर्देश दिया गया हो।
न ही हमारे गुरु ने कभी हमें ऐसा करने के लिए कहा है।
हाँ, साधना के समय गुरु चादर की अनुशंसा की जाती है, सरल तिलक की भी अनुशंसा है, और कुछ विशेष साधनाओं में साधना के समय श्वेत, पीत, लाल अथवा काले वस्त्र धारण करने का निर्देश अवश्य दिया गया है।
हमारा मुख्य केंद्रबिंदु शास्त्रों से प्राप्त प्रामाणिक ज्ञान है।
ध्यान रहे कि हमारे समस्त विवेचन पूर्णतया वैज्ञानिक आधार व दृष्टिकोण पर आधारित हैं।
जैसा कि आप सभी शिक्षितजन समझते हैं, ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी बाहरी वेश-भूषा की आवश्यकता नहीं होती।
वास्तव में, शास्त्रीय शिक्षाएँ आडंबरपूर्ण बाह्य प्रदर्शन से दूर रहने की ही प्रेरणा देती हैं।
औपचारिक प्रक्रिया का प्रारम्भ आत्म बोध से होता है, यानि हमारे साथ आगे की व्यवस्थित शिक्षा से जुड़ने का आरम्भ।
परंपराएँ
परंपरागत रूप से अधिकांश स्थानों पर यह किया जाता है कि विद्यार्थियों को एक के बाद एक शास्त्र पढ़ने के लिए लगा दिया जाता है।
परंतु इस प्रकार अध्ययन करने से विद्यार्थी शीघ्र ज्ञान के मर्म तक नहीं पहुँच पाता।
यदि कभी पहुँच भी पाता है, तो उसमें वर्षों लग जाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ज्ञान के मर्म को समझना आवश्यक है। यदि एक कटोरे जल से प्यास बुझ सकती है, तो पूरे सरोवर तक जाने की आवश्यकता नहीं होती।
पिछले लगभग पचास वर्षों में सैकड़ों शास्त्रों के अध्ययन और विश्लेषण के पश्चात, प्रवर्तक ने उन सबसे मूलभूत अवधारणाओं और सिद्धांतों को निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत किया है, जिन्हें समझना अनिवार्य है।
प्रत्येक अवधारणा के लिए अनेक शास्त्रों के संदर्भ लेकर उसकी पुष्टि की गई है।
प्रवर्तक ने भी सनातन धर्म को समझने के लिए किसी एक विशेष पारंपरिक या रूढ़िवादी पद्धति अथवा संप्रदाय का अनुसरण नहीं किया है।
इसलिए वे किसी भी प्रकार की मतांध उपदेश-प्रणाली के प्रभाव में नहीं हैं।
उनका ज्ञान शास्त्रों से सीधे आत्मसात किया गया है और गुरु की कृपा से प्राप्त हुआ है।
औपचारिक शिक्षा का आरम्भ आत्म बोध से होता है।
अध्ययन का स्थान
आपका अपना घर
हम आपको यह परामर्श भी नहीं देते और न ही कहते हैं कि आप सुदूर स्थानों, आश्रमों या महंगे रिट्रीट्स में भागें और यात्रा में अत्यधिक धन तथा समय व्यय करें।
अपितु हम यह कहते हैं कि विश्व में कहीं भी अपने ही घर में शांति से बैठकर ज्ञान अर्जित करें।
ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने ही घर की एकांतता से उच्च्तर कोई स्थान नहीं।
प्राचीन काल में और आज भी ऐसे ऋषि-मुनि रहे हैं और हैं, जो साधनाओं के लिए वनों की ओर जाते रहे हैं। परंतु वह एक अत्यंत उन्नत अवस्था में किया जाता है। प्रारंभ में इसकी कोई आवश्यकता नहीं होती।
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है—अधिक से अधिक जानना और ज्ञान अर्जित करना।
जिन साधनाओं की हम अनुशंसा करते हैं, वे भी आपके अपने घर पर ही, आपके वर्तमान व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन को यथावत रखते हुए की जा सकती हैं।
यात्रा का प्रारम्भ आत्म बोध से करें
कहाँ और कैसे प्रारम्भ करें
साधकों के मन में यह भ्रम भी रहता है कि प्राचीन ग्रंथों में से अध्ययन का प्रारम्भ किस ग्रंथ से किया जाए।
इसे भी हमने सरल बना दिया है—“Understanding Life” अथवा “Self-Realization” नामक पाठ्यक्रम प्रस्तुत करके।
इस पाठ्यक्रम में हम मूल सिद्धांत प्रस्तुत किये गये हैं जो कि SRS 1 से ले कर SRS 42 तक के YouTube Videos में विस्तृत रूप में बताये गये हैं। गृहपृष्ठ पर इन सब के लिंक दिये गये हैं।
इनमें से अधिकांश अवधारणाएँ आपके लिए पूर्णतया नई होंगी।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ये मूल सिद्धांत समय के साथ कैसे भुला दिये गये और आज के समय में और वर्तमान समय में केन्द्रबिन्दु बाहरी आडंबर और कथावाचन पर अधिक केंद्रित हो गया है।
इंटरनेट पर लोकप्रिय और अत्यधिक अनुयायी रखने वाले अधिकांश गुरुओं ने भी इन अवधारणाओं पर कभी चर्चा तक नहीं की है।
इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत हम आगे भी विशिष्ट पुस्तकों, प्रकाशकों और अध्यायों की अनुशंसा करते रहेंगे, जिस से आप और अधिक ज्ञान अर्जित कर सकें।
इन पुस्तकों में से कई अब निःशुल्क डाउनलोड के रूप में उपलब्ध हैं; इसके लिए भी हम विशिष्ट वेबसाइटों की अनुशंसा करेंगे।
जो अधिक उत्सुक हैं, वे इन पुस्तकों को ऑनलाइन भी क्रय कर सकते हैं।
प्रवर्तक एक इंजीनियर हैं और विज्ञान पृष्ठभूमि से आते हैं, इसलिए प्राचीन ग्रंथों पर उनका शोध सदैव वैज्ञानिक तर्क के साथ रहा है।
वर्तमान के संदर्भ में हर अवधारणा के लिए तर्क, और विशेष रूप से वैज्ञानिक व्याख्या, की आवश्यकता है। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमारे सभी पाठ्यक्रमों की आधारशिला है।
कुछ स्थानों पर वैज्ञानिक अवधारणाएँ उन्नत और जटिल हो सकती हैं। ऐसे विषयों में, जिन पाठकों की विज्ञान पृष्ठभूमि नहीं है, उन्हें बेहतर समझ के लिए कुछ ऑनलाइन शोध करने की अनुशंसा की जाती है।
“सनातन धर्म विविध अनुशासनों को समाहित करता है।
जहाँ मूलभूत दैनिक प्रक्रियायें सार्वभौमिक हैं, वहीं उन्नत प्रक्रियाएँ योग्यता और उत्तरदायित्व के अनुसार चयनात्मक रूप से निर्धारित की जाती हैं।
यह मंच इसी सिद्धांत का पालन करता है।”