वैदिक ज्ञान में मानव बुद्धि का विज्ञान
वैदिक ज्ञान में मानव बुद्धि का विज्ञान
यह लेख
“सनातन धर्म के वैज्ञानिक आधार”
लेख के पश्चात प्रस्तुत किया गया है। जिन पाठकों ने इस लेख में वर्णित मूलभूत सिद्धांतों को अभी तक नहीं समझा है, वे पहले उक्त लेख का अध्ययन करें और उसके बाद इस लेख को पढ़ें।
बुद्धि समस्त सृष्टि का मूल आधार है
पूर्व लेख में दिए गए संदर्भ चित्र को यदि हम पुनः देखें (जिसे मैं यहाँ फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ), तो स्पष्ट होता है कि जीवन की सम्पूर्ण प्रक्रिया एक बुद्धि-क्षेत्र (अहंकार) से आरम्भ होती है। यह बुद्धि-क्षेत्र ब्रह्म के क्षेत्र, ज्ञान के क्षेत्र और समय के परस्पर अंतःक्रिया से उत्पन्न होता है। यही मानव अस्तित्व की सृष्टि का दूसरा चरण है। बुद्धि को ग्रंथों में अहंकार इस कारण कहा गया है क्युंकि यह क्षेत्र सत्व, रजस व तमस बुद्धिओं का मिश्रण है।
हिन्दु ग्रंथों के अनुसार सृष्टि का तीसरा चरण बुद्धि की तीन शक्तियों की उत्पत्ति है। ये शक्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं
1. वैकारिक बुद्धि
2. तैजस बुद्धि
3. तमस बुद्धि
समस्त सृष्टि इन तीनों बुद्धियों का परिणाम है।
जहाँ तमस बुद्धि भौतिक पदार्थ का निर्माण करती है और भौतिक तत्वों के पीछे की शक्ति है, वहीं तैजस बुद्धि वह शक्ति है जो क्रिया या कर्म को उत्पन्न करती है, और वैकारिक बुद्धि वह शक्ति है जो समस्त ज्ञान की उत्पत्ति का कारण बनती है।
इनमें से तमस बुद्धि का क्षेत्र इन्द्रियों के साथ-साथ भौतिक पदार्थ का निर्माण करता है। हिन्दू ग्रंथों में Senses को “इन्द्रिय” कहा गया है, जो केवल ‘अनुभूति’ से परे हैं जैसे वाणी।
वाणी में निहित बुद्धि
भौतिक सृष्टि का प्रथम चरण Space अथवा Volume की सृष्टि है, जिसे शास्त्रों में “आकाश” कहा गया है। आकाश की सृष्टि के साथ जो पहली इन्द्रिय उत्पन्न होती है, वह है वाणी का अंग जीह्वा। और इस इन्द्रिय के साथ जो “गुण” उत्पन्न होता है, वह है अक्षर (वर्ण)।
यह समझना कि बिना जीव उत्पत्ति के वाणी किस प्रकार उत्पन्न हो गयी, अक्षर कैसे उत्पन्न हो गया अत्यंत जटिल है, किन्तु हम आगे बढ़ते हैं। जैसे-जैसे ज्ञान सजग होगा, यह स्पष्ट होता जाएगा।
यह केवल दर्शन नहीं है, अपितु हिन्दू ग्रंथों में वर्णित शुद्ध भौतिक सृष्टि का प्रथम चरण है।
पाठकों को ध्यान देना चाहिए कि समस्त जीवन वाणी की शक्ति के बिना निरर्थक है।
यह भी ध्यान दें कि मानव वाणी का गहरा संबंध निम्न क्रम से है:
बुद्धि से विचार जन्म लेता है, जो कि शब्द व अक्षर के बिना सम्भव नहीं। इसका संयोग जब जीह्वा से होता है तो वाणी का जन्म होता है।
बुद्धि <> विचार <> अक्षर <> शब्द <> वाणी
ये सभी पाँच तत्व परस्पर अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। बाद वाला तत्व पहले के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता, और यह जीवन के प्रत्येक पक्ष के लिए मूलभूत है। विचार और वाणी दोनों ही समस्त कर्म के आधार हैं।
प्राचीन हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य कर्म करने के लिए बाध्य है। इस संसार में जो कुछ भी आप देखते हैं, वह किसी न किसी के पूर्व में किए गए कर्म का परिणाम है।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि बुद्धि किस प्रकार वाणी के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।
भौतिक पदार्थ की सृष्टि के सभी चरणों का वर्णन हम पिछले लेख में कर चुके हैं। पूर्व लेख देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।
जीवन का उद्देश्य शास्त्रों में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है
आधुनिक विज्ञान जीवन के उद्देश्य को परिभाषित करने में असमर्थ रहा है।
इसी कारण आधुनिक विज्ञान और पाश्चात्य संस्कृतियाँ मानव जीवन का उद्देश्य केवल धन अर्जन, धन संचय और भोग-विलास को मानती हैं, तथा इन्द्रियों पर सभी प्रकार के नियंत्रण को समाप्त करने की अनुशंसा करती हैं। आधुनिक जीवन-शैली यह सिखाती है कि हर एक व्यक्ति अपने विचार और संसाधन इन्द्रियों की तृप्ति में लगा दे।
प्राचीन हिन्दू विज्ञान पाश्चात्य दृष्टिकोण के पूर्णतया विपरीत हैं और मानव जीवन का उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार जीवन का उद्देश्य
1. अपनी बुद्धि का उन्नत करना
2. इस उन्नत बुद्धि के माध्यम से कर्म द्वारा ज्ञान उत्पन्न करना
बताया गया है।
सनातन हिन्दू धर्म की मूल प्रक्रियायें
जब हम सनातन धर्म की मूल वैदिक प्रक्रियाओं को देखते हैं, तो वे निम्नलिखित निश्चित क्रम में व्यवस्थित रूप से बताई गयी है। यानि कि सर्वप्रथम से ले कर आगे चलने वाली क्रमबद्ध क्रियायें।
1. वास्तविक जीवन में मानव होने के पाँच मूलभूत सिद्धांतों को अपनाकर अपने चरित्र का मूल रूप से सुधार करना। विस्तृत रूप से यहाँ पढ़ें।
2. ध्यान-साधना के अभ्यास से मन पर नियंत्रण विकसित करना। विस्तृत रूप से यहाँ पढ़ें।
3. वैदिक साधनाओं व प्रक्रियाओं का पालन और आचरण करके जीवन को सुधारना। पूर्ण वैदिक मार्ग के लिये यहाँ जायें।
4. इस नियंत्रित और विकसित मन के माध्यम से कर्म करते हुए ज्ञान उत्पन्न करना। यह विडियो देखें।
बुद्धि कहाँ निवास करती है?
जब हम श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि बुद्धि और ज्ञान शरीर या मस्तिष्क में नहीं, अपितु आत्मा में स्थित होते हैं। विस्तार से समझने के लिये यहाँ क्लिक करें।
यह आत्मा शरीर के साथ नष्ट नहीं होती। अतः मृत्यु के समय जो बुद्धि और ज्ञान होता है, वह आत्मा में सुरक्षित रहता है। आत्मा ही बुद्धि और ज्ञान की वाहक है।
यही आत्मा पुनः कर्मानुसार किसी अन्य शरीर में जन्म लेती है या नया शरीर धारण करती है, और उसी बुद्धि एवं ज्ञान को साथ लेकर आगे बढ़ती है। यह प्रक्रिया तब तक निरंतर चलती रहती है जब तक आत्मा शुद्ध नहीं हो जाती। यही मोक्ष की स्थिति है।
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आत्मा का शुद्धिकरण कैसे होता है?
क्युँकि आत्मा का मूल तत्व बुद्धि है, अतः आत्मा का शुद्धिकरण सीधे-सीधे बुद्धि के शुद्धिकरण का ही है।
यह तथ्य हिन्दू शास्त्रों में निर्दिष्ट साधनाओं से भी स्पष्ट होता है। सभी सनातन हिन्दू साधनाएँ बुद्धि के विकास, ज्ञान की प्राप्ति और ज्ञान के सृजन की दिशा में कार्य करती हैं।
अब इसे और विस्तार से समझते हैं।
समस्याएँ कहाँ से प्रारम्भ होती हैं?
विश्व के किसी भी भाग में रहने वाला एक सामान्य व्यक्ति, जिसने आध्यात्मिक प्रशिक्षण नहीं लिया है, स्वाभाविक रूप से अपनी इन्द्रियों की तृप्ति की ओर प्रवृत्त होता है। यह स्वाभाविक है क्योंकि प्यास, भोजन, नींद, आश्रय और यौन-आवश्यकताएँ — ये सभी मूल प्रवृत्तियाँ अत्यंत शक्तिशाली होती हैं। इनका संतुलित रूप से उपभोग जीवन के लिए आवश्यक है।
किन्तु समस्यायें तब प्रारम्भ होती है जब आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद इच्छाएँ (desires) जीवन का नियंत्रण ले लेती हैं।
उदाहरण के लिए:
जब साधारण जल प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त नहीं लगता और व्यक्ति उससे अधिक की चाह करता है जैसे कि जूस, शीतल पेय, मदिरा इत्यादि।
जब साधारण भोजन पर्याप्त नहीं लगता और व्यक्ति स्वास्थ्य, स्वाद अथवा विलासिता के नाम पर अधिक जटिल और विलासी भोजन चाहता है।
जब एक जीवनसाथी पर्याप्त नहीं लगता और व्यक्ति विभिन्न कारण बताते हुये एक से अधिक शारीरिक संबंधों की इच्छा करने लगता है।
जब साधारण बिस्तर पर्याप्त नहीं लगता और व्यक्ति अधिक आराम की अपेक्षा करने लगता है।
यह स्थिति सभी इन्द्रियों पर लागू होती है।
वास्तविकता यह है कि इन्द्रियाँ निरंतर अधिक की माँग करती रहती हैं, और व्यक्ति अपना सम्पूर्ण जीवन इन्हीं इच्छाओं को पूरा करने में व्यतीत कर देता है। जीवन बीत जाता है, परंतु “और अधिक” की चाह कभी समाप्त नहीं होती।
इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति किसी भी सीमा तक जा सकता है जैसे विश्वास और ईमानदारी का उल्लंघन करने से लेकर छोटे अपराधों से लेकर बड़े और घोर अपराधों तक।
यह प्रवृत्ति सामान्य व्यक्ति से लेकर शक्तिशाली राजनेताओं और धनवान लोगों तक सभी पर लागू होती है।
यह स्थिति आधुनिक विश्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
व्यक्ति किसी भी प्रकार से अधिक धन अर्जन करने का प्रयास कर रहा है, व्यवसाय निरंतर अधिक लाभ और विस्तार चाहते हैं, राजनेता अधिक शक्ति और संपत्ति चाहते हैं, और राष्ट्र-नेता वैश्विक प्रभुत्व चाहते हैं चाहे नैतिक अथवा अनैतिक मार्ग से।
इसी के परिणामस्वरूप विश्वभर में अपराध और युद्ध बढ़ते जा रहे हैं। यह सब हमारे सामने प्रत्यक्ष रूप से घटित हो रहा है।
हिन्दू शास्त्र क्या कहते हैं?
प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के अनुसार, मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। जितना अधिक आप किसी इन्द्रिय को संतुष्ट करते हैं, वह उतना ही अधिक माँग करती है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जिसके पास कोई वाहन नहीं है और जो पैदल चलने के लिए बाध्य है, वह साइकिल पाकर प्रसन्न हो जाएगा। परन्तु यह संतोष अधिक समय तक नहीं टिकेगा वह फिर मोटरसाइकिल चाहेगा। उसके बाद कार, और यह क्रम कभी समाप्त नहीं होगा। यही उदाहरण भोजन, पेय और जीवन के आराम के संदर्भ में भी लागू होता है।
इसीलिए हिन्दू आध्यात्मिक शिक्षा का प्रथम चरण कुछ मूलभूत सिद्धांतों का पालन करने से प्रारम्भ होता है, जिस से कोई भी व्यक्ति एक शांत और सभ्य समाज में संतुलित जीवन जी सके।
यह मानव होने के पाँच मूलभूत सिद्धांत हैं सदैव सत्य बोलना और उसका पालन करना, किसी भी निर्दोष जीव को न सताना और न मारना, चोरी न करना, एक से अधिक जीवन-साथी न रखना तथा शिक्षा-काल तक ब्रह्मचर्य का पालन करना, और अन्य लोगों की संपत्ति पर अधिकार न करना।
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इसके अतिरिक्त कुछ अन्य नियम भी निर्धारित किए गए हैं — जैसे अहंकार न करना, क्रोध न करना, धैर्य रखना आदि। इन्हें हिन्दू शास्त्रों में यम और नियम कहा गया है।
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इच्छाएँ और कामनाएँ कहाँ उत्पन्न होती हैं?
सभी इच्छाएँ और कामनाएँ सबसे पहले मानव की बुद्धि (या मस्तिष्क) में उत्पन्न होती हैं। यही बुद्धि जीवनभर व्यक्ति को संचालित करती है।
असंयमित इच्छाओं का अर्थ है असंयमित बुद्धि।
बुद्धि को नियंत्रित करने के उपाय
बुद्धि को नियंत्रित करने का पहला चरण है उपर्युक्त नियमों का पालन करना। ध्यान रखें कि नियमों का पालन वास्तव में आपकी इच्छाओं पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करता है, और इस प्रकार बुद्धि पर भी नियंत्रण आता है। यह पहले बताए गए चार चरणों में पहला चरण है।
दूसरा चरण है बुद्धि पर प्रत्यक्ष नियंत्रण, और यह ध्यान (ध्यान-साधना) के माध्यम से प्राप्त हो सकता है। विश्व में इस प्रक्रिया के अतिरिक्त कोई अन्य प्रक्रिया नहीं है जो कि यह सम्भव करा सके। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अभ्यास के द्वारा मन पर नियंत्रण विकसित किया जा सकता है और यह अभ्यास है ध्यान की प्रक्रिया।
ध्यान के विषय में और अधिक पढ़ें।
स्मरण रखें कि निर्णय बुद्धि लेती है, बुद्धि मन को संचालित करती है, और मन शरीर के अंगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है।
ध्यान के अभ्यास में आप अपने मन को बलपूर्वक एक दिव्य स्वरूप पर केंद्रित करते हैं। मन भटकता है, परन्तु आप उसे पुनः उसी दिव्य स्वरूप पर लाते हैं। वास्तविक ध्यान में यह प्रक्रिया मौन मंत्र-जप के साथ की जाती है।
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इस प्रकार, किसी भी व्यक्ति के लिए यह संभव है कि वह ध्यान के माध्यम से मन और बुद्धि पर नियंत्रण विकसित करे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पहले और दूसरे दोनों अभ्यास नियमों का पालन और ध्यान वास्तव में अपनी बुद्धि पर नियंत्रण विकसित करने की प्रक्रियाएँ हैं। इसके परिणामस्वरूप आप अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करते हैं, बुद्धि को नियंत्रित करते हैं, और धीरे-धीरे अपने जीवन पर भी नियंत्रण स्थापित करते हैं क्योंकि जीवन का संचालन व्यक्ति की बुद्धि द्वारा ही होता है।
भगवान श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि वायु को नियंत्रित करना सरल है, परंतु मन को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है। इसलिए इन साधनाओं का जीवनभर पालन आवश्यक है, अन्यथा मन पुनः भटक सकता है।
मूलतः इन साधनाओं के माध्यम से हम अपनी बुद्धि पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
वर्तमान समय में अधिकांश हिन्दु इस मूलभूत क्रिया को भूल चुके हैं।
समस्त भौतिक पदार्थ और जीव तमस बुद्धि से उत्पन्न होते हैं
उपर्युक्त चित्र में हम यह भी देखते हैं कि हिन्दु ग्रंथों के अनुसार समस्त भौतिक पदार्थ, और इस प्रकार सभी जीवित प्राणी तथा समस्त मनुष्य, ‘तमस’ बुद्धि से उत्पन्न हुए हैं। यही मूल कारण है कि समस्त मानव जाति मुख्यतः तमस बुद्धि से प्रभावित रहती हैं।
हिन्दू समाज में सामान्यतः तमस को मांसाहार से जोड़ा जाता है, किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता में तमस बुद्धि की परिभाषा इस प्रकार नहीं दी गई है। यह बुद्धि का एक गुण है, अतः हमें यह समझना होगा कि गीता में बुद्धि के गुणों को कैसे परिभाषित किया गया है।
हिन्दू ज्ञान परंपरा में किसी भी व्यक्ति की बुद्धि तीन प्रकार की बुद्धियों का मिश्रण होती है — सत्त्व, रजस और तमस। प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि इन तीनों का सम्मिश्रण होती है, और ये गुण निरंतर परिवर्तित भी होते रहते हैं। कभी सत्त्व तमस पर प्रभावी होता है, तो कभी तमस सत्त्व पर हावी हो जाता है। इन दोनों अवस्थाओं के बीच परिवर्तन रजस के माध्यम से होता है।
अब इन तीनों गुणों को संक्षेप में समझते हैं
सत्त्व बुद्धि — वह बुद्धि जो यह भेद कर सके कि क्या कर्तव्य है और क्या नहीं, कौन शत्रु है और कौन नहीं, तथा अपने लिये क्या हितकर है और क्या अहितकर। श्रीमद्भगवद्गीता में कहीं भी मांसाहार के संदर्भ में सत्त्व की चर्चा नहीं की गई है। जो व्यक्ति इन भेदों को समझता है, वह सत्त्व बुद्धि से युक्त माना जाता है।
तमस बुद्धि — यह सत्त्व का विपरीत है। अर्थात् वह बुद्धि जो अकर्तव्य को कर्तव्य समझे, शत्रु को मित्र और मित्र को शत्रु समझे, तथा जो अहितकारी है उसे ही हितकारी माने।
रजस बुद्धि — वह बुद्धि जो उपर्युक्त तीनों में अनिश्चित रहती है, अर्थात् भ्रमित अवस्था में होती है और यह निर्णय नहीं कर पाती कि सत्त्व का अनुसरण करे या तमस का।
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समझने के लिये महत्वपूर्ण तथ्य
चूँकि सामान्य मानव बुद्धि प्रायः तमस से प्रभावित रहती है, इसलिए सभी हिन्दू साधनाओं का मुख्य उद्देश्य व जीवन का उद्देश्य मानव जीवन के इस मूल लक्ष्य की ओर होता है कि तमस बुद्धि को सत्त्व बुद्धि में कैसे परिवर्तित करें। अपने जीवन में परिवर्तन लाने के लिये इस तथ्य को समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
उन्नत या उच्च बुद्धि क्या है?
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, तमस बुद्धि को रजस के माध्यम से सत्त्व में परिवर्तित करना ही मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य है।
जो व्यक्ति इसे समझकर सत्त्व बुद्धि की दिशा में अग्रसर होता है, वह जीवन के सही मार्ग पर चल पड़ता है। यही मार्ग अंततः मोक्ष या मुक्ति की ओर ले जाता है। इस मार्ग का अनुसरण करने से व्यक्ति के जीवन में अनेक गुना सुधार होने लगता है।
इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह ‘उन्नत’ या ‘उच्च’ बुद्धि प्राप्त होती है, जिसका उल्लेख सभी शास्त्रों में किया गया है।
मंत्र और अन्य वैदिक साधनाएँ इसके बाद के चरण हैं। यही आत्मोत्त्थान है। यही आत्मा का उच्च्तर होना है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि मंत्रों और अन्य वैदिक साधनाओं में सफलता तभी प्राप्त होती है जब बुद्धि का स्तर उन्नत हो चुका हो। यदि उपर्युक्त मार्ग का पालन नहीं किया जाता, तो वैदिक साधनाएँ अपेक्षित परिणाम नहीं देतीं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है।
वर्तमान समय में जनमानस वैदिक साधनाओं और मंत्र-जप की ओर तो आकर्षित हो रहे हैं, परन्तु इन मूलभूत सिद्धांतों का पालन नहीं करते। इसलिए यह संदेह बना रहता है कि उन्हें इन साधनाओं से कोई ठोस परिणाम प्राप्त होगा अथवा नहीं।
किन्तु यदि सही मार्ग का पालन किया जाए, तो वैदिक साधनाएँ अत्यंत प्रभावशाली व चमत्कारी परिणाम देती हैं।
यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि किसी भी समकालीन गुरु ने इस विषय पर पर्याप्त बल नहीं दिया है, जबकि श्रीमद्भगवद्गीता में ‘बुद्धि’ के विकास और उसके विभिन्न पक्षों का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया गया है।
विशेषकर आधुनिक समय में बहुत कम जन उच्च बुद्धि के विकास पर ध्यान देते हैं व अपने मन को पूर्णतया धन अर्जन पर लगा देते हैं।
समस्त कर्म करने हेतु उन्नत बुद्धि की आवश्यक्ता
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन का दूसरा उद्देश्य है — उन्नत बुद्धि के माध्यम से कर्म करते हुए ज्ञान का सृजन करना।
आपका कर्म वे सभी कार्य हैं जो आप अपने दैनिक जीवन में करते हैं। इसमें आपके व्यक्तिगत कार्य भी आते हैं और व्यावसायिक कार्य भी। अतः इन सभी कर्मों को ‘उन्नत’ बुद्धि के साथ करना आवश्यक है। यदि बुद्धि का स्तर उन्नत नहीं है, तो व्यक्ति जीवन में निरंतर समस्याओं का सामना करता रहता है और अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाता। यही उन्नत बुद्धि का वास्तविक उद्देश्य है।
सामान्यतः लोग बुद्धि के उन्नयन को केवल धार्मिक या पुण्य कार्यों से जोड़ते हैं, परन्तु यह नहीं समझते कि उन्नत बुद्धि जीवन के प्रत्येक कार्य, विशेषकर व्यावसायिक जीवन के लिए भी अनिवार्य है। इसी कमी के कारण आज सरकारी कार्यालयों, व्यवसायों और व्यक्तिगत जीवन में व्यापक भ्रष्टाचार देखने को मिलता है, जो आगे चलकर सामाजिक व राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं का कारण बन रहा है।
जीवन के उद्देश्य विस्तार से समझने के लिये यहाँ क्लिक करें।
ज्ञान का सृजन क्या है?
आप जिस भी क्षेत्र या व्यवसाय में हों, आपको किसी न किसी समस्या का समाधान करना होता है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा।
नौकरी में व्यक्ति को दिन-प्रतिदिन उत्पन्न होने वाली अनेक समस्याओं के समाधान के लिए नियुक्त किया जाता है।
व्यवसायों का कार्य भी समस्याओं का समाधान करना ही है। जैसे जब कोई ग्राहक किसी सेवा या उत्पाद की आवश्यकता रखता है, तो व्यवसाय उस समस्या का समाधान प्रदान करता है।
अनुसंधान संस्थानों में ज्ञान का वास्तविक सृजन होता है।
यही है कर्म के माध्यम से ज्ञान का सृजन।
बुद्धि की आवश्यक्ता हर क्षण रहती है
गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि जीवन के प्रत्येक चरण में बुद्धि की आवश्यकता होती है। संसार का कोई भी व्यक्ति जो कि किसी भी समाज, धर्म या राष्ट्र में रहता हो, जो भी कार्य करता है, उसमें बुद्धि की भूमिका अनिवार्य है, यहाँ तक कि अपने शरीर के संचालन में भी बुद्धि का उपयोग होता ही है।
कर्म केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं है अपितु यह सार्वभौमिक सत्य है।
और प्रत्येक कर्म के पीछे कार्य करने वाली शक्ति है बुद्धि।
सनातन हिन्दू धर्म का सार
यह एक अपरिहार्य तथ्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के हर कार्य के पीछे उसकी बुद्धि ही कार्यरत होती है।
सनातन धर्म का सम्पूर्ण मार्ग इसी मानव बुद्धि के शुद्धिकरण और विकास पर आधारित है।
देवताओं की उपासना सनातन धर्म में एक उन्नत स्तर का विषय है। ये वैदिक साधनाएँ तब तक परिणाम नहीं देतीं जब तक बुद्धि को शुद्ध व उन्नत नहीं किया गया हो।
अतः यदि प्रारंभिक चरणों का पालन नहीं किया गया है, तो सीधे वैदिक साधनाओं में प्रवेश करना निष्फल सिद्ध हो सकता है।
निष्कर्ष
हमने संक्षेप में देखा कि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार सम्पूर्ण जीवन की प्रक्रिया बुद्धि के क्षेत्र से प्रारम्भ होती है।
इसके पश्चात मानव जीवन के जो उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, जो कि हैं
बुद्धि का विकास व उन्नयन
और दूसरा, उस उन्नत बुद्धि के माध्यम से कर्म के माध्यम से ज्ञान का सृजन
ये दोनों ही विषय बुद्धि से ही संबंधित हैं।
इसलिए वैदिक साधनाओं की सम्पूर्ण प्रक्रिया का प्रथम उद्देश्य है व्यक्ति की बुद्धि का शुद्धिकरण, और उसके बाद उसका विकास।
ईश्वर एवं देवी-देवताओं की उपासना मानव जीवन को उच्चतर बनाने हेतु दिव्य सहयोग प्राप्त करने की प्रक्रिया है। किन्तु यह दिव्य सहयोग तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी बुद्धि को शुद्ध और उन्नत कर चुका हो।
अतः सनातन हिन्दू धर्म का पूर्ण मार्ग बुद्धि के शुद्धिकरण और विकास के माध्यम से समृद्ध, संतुलित और पूर्ण जीवन की ओर ले जाता है। यही मार्ग अंततः मोक्ष की प्राप्ति तक पहुँचाता है।