पूर्ण वैदिक मार्ग

सनातन धर्म का पूर्ण वैदिक मार्ग 

सामान्य से ऊपर उठें, साधारण से ऊपर उठें, साधारण से असाधारण बनने का मार्ग।

वैज्ञानिक रूप से सिद्ध

 भारतीयों व विशेषकर हिन्दुओं के मन में चलचित्रों, मूवीज़ के माध्यम से यह अवधारणा बिठा दी गई है कि गरीबी अच्छी है, गरीब रहना ही ठीक है, समस्त समृद्ध व्यक्ति चोर होते हैं, अविश्वासी होते हैं, गलत काम करते हैं इत्यादि।

यह अवधारणा पूर्णतया गलत है।

शास्त्रों के अनुसार गरीबी एक अभिशाप है।

परन्तु हम हिन्दु भाग्यशाली हैं क्यूंकि हमारे शास्त्र गरीबी से मुक्ती पाने के एक नहीं अनेकों साधन बताते हैं।

जगदगुरु शंकराचार्य ने कहा था कि हमारे शास्त्रों में इतना ज्ञान है कि भारत में गरीबी होनी ही नहीं चाहिये।

इसी प्रकार समस्यायें व दुःख जीवन पर्यन्त आते रहते हैं। परन्तु विश्व में केवल सनातन धर्म ही वह मार्ग है जो कि समस्याओं व दुःखों को कम करने अथवा उनका अन्त करने का मार्ग़ दर्शाता है।

विश्व का कोई अन्य धर्म अथवा पंथ यह मार्ग नहीं बताता। इस के लिये केवल इतना आवश्यक है कि आप शिक्षित बने। हिन्दी व संस्कृत केवल पढ़ने में सक्षम हो जायें

आधुनिक अनुसंधान आज उन सत्यों की पुष्टि कर रहा है, जिनकी उद्घोषणा हिंदू ग्रंथों ने हजारों वर्ष पूर्व कर दी थी।

वैदिक दर्शन की सबसे मूलभूत अवधारणा
ब्रह्म, अर्थात् परम ब्रह्मांडीय सत्य का अस्तित्व

आज क्वांटम भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान की वैज्ञानिक खोजों द्वारा सनातन संस्कृति का यह मूल सिद्धांत प्रमाणित हो चुका है।

गणित, खगोलशास्त्र, भाषाविज्ञान तथा अन्य अनेक वैज्ञानिक विषयों के अनेक सिद्धांतों की जड़ें भारत की प्राचीन मौलिक ज्ञान परंपराओं में निहित हैं।

योग, ध्यान एवं आयुर्वेद का वैश्विक उत्थान

पिछले कुछ दशकों में विश्व ने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण के लिए हिंदू ज्ञान परंपरा की ओर दृष्टि की है।

योग, ध्यान और आयुर्वेद आज वैश्विक आंदोलनों के रूप में स्थापित हो चुके हैं— जिनका अभ्यास विश्व में करोड़ों लोग कर रहे हैं और जिनके लाभों को आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार किया है।

ये प्राचीन विज्ञान आज सनातन धर्म के सिद्धांतों की गहराई, शुद्धता और सार्वभौमिकता का जीवंत प्रमाण बन चुके हैं।

वैदिक ज्ञानः व्यावहारिक, अनुप्रयोग योग्य और कल्याणकारी

जब हिंदू दर्शन की आधारशिलाएँ बार-बार आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षों से मेल खाती हैं, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे प्राचीन शास्त्रों में वर्णित अन्य सिद्धांत भी मानव जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं व प्रमाणित व सत्यापित हैं।

इन अवधारणाओं के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को हमारी यूट्यूब श्रृंखला SRS 1 से SRS 42 में तर्क और प्रमाणों के माध्यम से विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

(मुख्य पृष्ठ पर जाएँ)

लगभग 800 वर्षों— अर्थात् लगभग 14 पीढ़ियों से— हिंदू ज्ञान को सुव्यवस्थित और संगठित रूप में नहीं पढ़ाया गया है।

परिणामस्वरूप समाज में विकृतियाँ, भ्रांतियाँ और गलत धारणाएँ प्रवेश कर गईं।

वर्ण एवं जाति, कर्म, ज्योतिष और यहाँ तक कि देवी-देवताओं के विषय में भी गलत समझ ने सिद्धांतों के मूल वैज्ञानिक स्वरूप को धुंधला कर दिया।

 सत्य की ओर लौटने का अब समय आ गया है।

अब समय है उस ज्ञान को पुनः खोजने का, जिसे हमारे पूर्वजों ने अत्यंत सटीकता के साथ लिपिबद्ध किया था।

एक परम सत्य, अनेक दिव्य अभिव्यक्तियाँ

वैज्ञानिक दृष्टि से जब एक परम ईश्वर ब्रह्म के अस्तित्व को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जा चुका है, तो देवी-देवताओं का अस्तित्व भी स्वतः वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो जाता है— क्योंकि प्राचीन शास्त्रों में उन्हें तर्क, ब्रह्मांडीय संरचना, चेतना एवं बुद्धि के सिद्धांतों और सार्वभौमिक नियमों के माध्यम से समझाया गया है।

हमें अपनी ही सनातन हिंदू विरासत की प्रामाणिकता के लिए पाश्चात्य विश्वविद्यालयों पाश्चात्य वैज्ञानिकों की मोहरों की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।

यही हिंदू संस्कृति और सनातन धर्म के मौलिक स्तंभ हैं।

नोट:
यहाँ वर्णित कुछ प्रक्रियाएँ विशेषीकृत वैदिक अनुशासनों से संबंधित हैं।
इन तक पहुँच तैयारी, अभ्यास की निरंतरता और व्यक्तिगत उपयुक्तता के आधार पर निर्धारित की जाती है — केवल जिज्ञासा या अनुरोध के आधार पर नहीं।

समस्त हिन्दुओं के लिये आह्वान

विज्ञान के माध्यम से अपने शास्त्रों का पुनः अन्वेषण करें

उमा कैलाश फाउंडेशन ने अपने शास्त्रों— वेद, उपनिषद, पुराण और शास्त्र— को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुनर्घोषित किया है।

जब हम ऐसा करते हैं, तो सनातन धर्म की स्पष्टता, तर्कसंगतता और सटीकता स्वतः ही प्रकट हो जाती है।

आज विज्ञान जिन अवधारणाओं तक पहुँचा है, या पहुंच भी नहीं पाया है, उन्हीं को हिंदू दर्शन सहस्रों वर्षों से वैज्ञानिक रूप में समझाता आया है।

वैदिक विज्ञानों का बढ़ता वैज्ञानिक प्रमाणीकरण
एक ऐसा मार्ग जिसकी आज विश्व को आवश्यकता है


आधुनिक पाश्चात्य जगत जीवन से संबंधित पुराने सिद्धांतों और नई वैज्ञानिक खोजों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा है— विशेषकर तब, जब बढ़ते प्रमाण डार्विन के विकास मॉडल को चुनौती दे रहे हैं, और विश्व एक राजनीतिक अराजकता के दौर में फंसा हुआ है।

अपने दार्शनिक आधारों के डगमगाने के साथ पाश्चात्य संस्कृति पहचान, उद्देश्य और स्थिरता के संकट से घिरी हुई है।

इसके विपरीत, सनातन धर्म एक पूर्ण, व्यावहारिक और कालातीत मार्ग प्रस्तुत करता है— ऐसा मार्ग जो आज उभरते गहन वैज्ञानिक सत्यों के साथ पूर्णतः सामंजस्य रखता है।

विश्व को हिंदू ज्ञान की आधारशिलाओं की ओर लौटना अनिवार्य हो चुका है

उमा कैलाश फाउंडेशन ने हिंदू शास्त्रों में प्रतिपादित मूलभूत सिद्धांतों की प्रामाणिकता स्थापित की है।

अन्य किसी भी ज्ञान परंपरा के विपरीत, भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System – IKS)

१. जीवन की उत्पत्ति और अस्तित्व की प्रकृति को स्पष्ट करती है,
२. पृथ्वी पर जीवन के क्रमिक विकास, मानव कल्याण और समस्त जीवन के दिव्यता से आंतरिक आध्यात्मिक संबंध का एक स्पष्ट, चरणबद्ध मार्ग भी प्रस्तुत करती है।

इतना समन्वित और सर्वांगीण ढाँचा किसी अन्य परंपरा या वैज्ञानिक प्रतिरूप में उपलब्ध नहीं है।

जब वैदिक सत्य वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो रहे हैं, तो संपूर्ण मार्ग का पुनर्निर्माण उमा कैलाश फाउंडेशन इस वेबसाईट के माध्यम से प्रस्तुत कर रही है

जैसे-जैसे अधिकाधिक वैदिक अवधारणाएँ वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित होती जा रही हैं, उमा कैलाश फाउंडेशन निम्नलिखित दिशा में कार्य कर रही है

• विभिन्न शास्त्रों में बिखरे हुए ज्ञान-सूत्रों को पुनः जोड़ना
• संपूर्ण वैदिक मार्ग का एक सुव्यवस्थित और संगठित पुनर्निर्माण करना
• इस ज्ञान को सामान्य जनमानस के लिए स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करना
• विश्वभर के लोगों को अधिक स्वस्थ, अर्थपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से संतुलित जीवन जीने हेतु ज्ञान का आविर्भाव करना


सनातन धर्म के ज्ञान को कभी खंडित रूप में नहीं समझा जा  सकता।

आज वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के आधार पर उमा कैलाश फाउंडेशन इस ज्ञान को पुनर्जीवित, पुनः संरचित करने का प्रयास कर रहा है और संपूर्ण विश्व के साथ साझा कर रहा है।

सनातन वैदिक मार्ग

 सरल रूप से छः भागों में प्रस्तुत

प्रत्येक इच्छुक को पूर्ण स्पष्टता प्रदान करने हेतु सनातन धर्म के इस कालातीत मार्ग को छः सरल एवं सुव्यवस्थित चरणों में संक्षेपित किया गया है।

इससे जीवन को समझने से लेकर पूर्णता की प्राप्ति तक की संपूर्ण यात्रा सरल, स्पष्ट और व्यवहारिक बन जाती है।

इस मार्ग को सनातन (शाश्वत) इसलिए कहा गया है, क्योंकि यह लाखों वर्ष पहले भी उतना ही प्रासंगिक था व आज भी पूर्णतः प्रासंगिक है और आने वाली अनगिनत पीढ़ियों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।

सनातन धर्म के सिद्धांत
सार्वभौमिक हैं,
अपरिवर्तनीय हैं और
मानव जीवन के सर्वोच्च एवं गहन सत्यों के अनुरूप हैं।

सनातन धर्म की सम्पूर्ण ज्ञान-परंपरा को इन छः चरणों में सुव्यवस्थित करके, अब प्रत्येक व्यक्ति इस मार्ग पर विश्वास, स्पष्टता और उद्देश्य के साथ आगे बढ़ सकता है।

पहला पग
आधारशिला

सबसे महत्वपूर्ण पग
स्वस्थ बुद्धि और
एक स्वस्थ शरीर


मानव जीवन की दो सर्वाधिक उपयोग में आने वाली, सबसे महत्वपूर्ण, परंतु सबसे अधिक उपेक्षित संपत्तियाँ

मानव जीवन का प्रत्येक क्षण मानव तंत्र के दो मूलभूत तत्वों पर निर्भर करता है 

१. बुद्धि — सही निर्णय लेने के लिए
२. शरीर — सभी कर्मों का निष्पादन करने के लिए

हम इन दोनों का उपयोग हर क्षण, हर दिन निरंतर करते हैं

फिर भी सामान्यता हम लगभग कभी भी इनके संरक्षण, संवर्धन और विकास में समय नहीं लगाते।

हमारे निर्णय, कर्म, लक्ष्य और उपलब्धियाँ इन्हीं दो स्तंभों पर आधारित हैं, फिर भी मानव जीवन के ये दोनों क्षेत्र लगभग सभी लोगों द्वारा सबसे अधिक उपेक्षित बने हुए हैं।

वास्तविक स्वास्थ्य = मन (आंतरिक संतुलन) + शरीर

अधिकांश जनमानस यह मानते हैं कि स्वास्थ्य का अर्थ केवल मांसपेशियाँ बनाना या अच्छा शारीरिक आकार होना है।

परंतु वास्तविक स्वास्थ्य का अर्थ है—

• संतुलित और स्थिर मन
• सशक्त और स्वस्थ शरीर
• ठीक प्रकार से कार्य करने वाले शरीर के आंतरिक अंग


इस पूर्ण स्वास्थ्य की अवस्था के बिना धन, सफलता या आध्यात्मिक साधना का अर्थ अप्रभावित तथा सीमित रह जाता है।

प्राचीन हिंदू शास्त्र शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को मानव जीवन का प्रथम और सर्वोच्च लक्ष्य घोषित करते हैं। यहाँ तक कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य से भी पहले स्थान दिया गया है।

मानसिक स्वास्थ्य: संपूर्ण बुद्धि-तंत्र का संतुलित विकास

जिस प्रकार शारीरिक असंतुलन दृष्टिगोचर हो जाता है— जैसे एक हाथ का बहुत पतला हो जाना, पेट का असामान्य रूप से बढ़ जाना या पैरों का अ समान होना इत्यादि।

उसी प्रकार मानसिक असंतुलन भी जीवन में विकृतियाँ उत्पन्न करता है।

आधुनिक विज्ञान बुद्धि को प्रायः केवल इन तक सीमित कर देता है

• स्मरण शक्ति
• गणना क्षमता
• जानकारी को संयोजित करने की योग्यता

परंतु हिंदू शास्त्र बुद्धि के अनेक और कहीं अधिक महत्वपूर्ण आयामों का वर्णन करते हैं, जैसे

• मन पर नियंत्रण
• धैर्य
• प्रतिबद्धता
• एकाग्रता एवं निरंतर चिंतन
• क्षमा एवं करुणा
• चेतना
• नींद की गुणवत्ता
• ज्ञान की अभिलाषा
• मानसिक दृढ़ता
• कौशल
• भक्ति
• इंद्रियों के माध्यम से जागरूकता
• संतोष
• सहज प्रवृत्तियाँ
• बुद्धि की दीप्ति और
• मातृत्व जैसी करुणा

वास्तव में स्वस्थ मन वही है जिसमें ये सभी पक्ष संतुलित, स्पष्ट और शुद्ध हों।

शुद्ध बुद्धि:
‘मस्तिष्क रूपी कम्प्यूटर के विषाणुओं’ की सफ़ाई


प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अनुसार प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही उत्कृष्ट बुद्धि से युक्त होता है।

प्रत्येक मानव को एक अत्यंत शक्तिशाली सुपरकंप्यूटर—अर्थात मस्तिष्क प्रदान किया गया है।

परंतु यह बुद्धि पूर्व जन्मों के पापकर्मों के कारण धूल से ढकी हुई होती है।

यह ठीक वैसा ही है जैसे आपका कंप्यूटर यदि वायरस से संक्रमित हो जाए।

यह बुद्धि के वाईरस

• अशुद्ध विचार
• अनियंत्रित इच्छाएँ
• नकारात्मक आदतें
• मानसिक विकृतियाँ
• तनाव एवं भावनात्मक विष
इत्यादि रूप् में मस्तिष्क में घर करते हैं।

हिंदू शास्त्रों का प्रथम उद्देश्य इसी बुद्धि के विकारों को शुद्ध करना है।

जिस प्रकार वायरस से भरा कंप्यूटर अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर सकता,

उसी प्रकार अशुद्धियों से भरा मन भी अपनी संपूर्ण क्षमताओं का प्रयोग नहीं कर सकता।

यम व नियम

बुद्धि को शुद्ध करने के वैज्ञानिक नियम
इन को नकारने की गलती कदापि न करें

लगभग समस्त समकालीन गुरुओं ने पाश्चात्य प्रभाव में आ कर इन यम नियमों का महत्व जनमानस को नहीं बताया है।

वैदिक मूल सिद्धांतों के अनुसार, इनके बिना सभी वैदिक साधनाएँ प्रभावहीन हो जाती हैं।

बुद्धि की शुद्धि में समय, निरंतरता और अनुशासन आवश्यक होता है।

शास्त्रों में मानसिक विषाक्तताओं को दूर करने के लिए यम और नियम—अर्थात् मूल वैदिक आचरण—निर्धारित किए गए हैं। दुर्भाग्यवश, आधुनिक समय में उन्नत साधनाएँ तो सिखाई जा रही हैं, परंतु मूल आधार—यम और नियम—को भुला दिया गया है।

परंतु यम और नियम के बिना—

• उच्च योगिक एवं वैदिक साधनाओं से सीमित लाभ ही प्राप्त होते हैं
• मानसिक शांति क्षणिक बनी रहती है
• आध्यात्मिक उन्नति असंभव हो जाती है

इन सिद्धांतों का अभ्यास औषधि के सेवन के समान है— इसे किसी भी आयु में आरंभ किया जा सकता है, और जितनी शीघ्र प्रारम्भ किया जाए, उतना ही श्रेष्ठ है।

विशेष रूप से युवा पीढ़ी को इस मार्ग पर शीघ्र चलने की प्रबल अनुशंसा की जाती है। क्योंकि यही वह मार्ग है जो तुरंत परिणाम देना प्रारंभ करता है और व्यक्तिगत, व्यावसायिक तथा आध्यात्मिक जीवन के लिए शक्तिशाली आधार स्थापित करता है।

सामान्यतः जनमानस वृद्धावस्था में आध्यात्मिक मार्ग अपनाने की प्रतीक्षा करते हैं, परंतु तब तक वह समय निकल चुका होता है जब इस ज्ञान की सबसे अधिक आवश्यकता थी।

वृद्धावस्था तक सामान्यता बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए जीवन के पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इस मार्ग पर यथाशीघ्र आरंभ किया जाए और किसी दिव्य संकेत की प्रतीक्षा न की जाए।

इसे ही दिव्य प्रकाश समझें, और यही वह मार्ग है जिस पर केवल सौभाग्यशाली व्यक्ति तुरंत कदम बढ़ाते हैं।

यम और नियम = मानव मस्तिष्क के लिए एंटीवायरस प्रणाली

ये उन मानसिक विषाणुओं को हटाते हैं जो आपकी

स्पष्टता,
एकाग्रता,
भावनाओं और
बुद्धि
को सीमित करते हैं।

यम और नियम के विषय में यहाँ और पढ़ें

भौतिक शरीर का विषहरण (डिटॉक्स)

मन निर्णय लेता है, परंतु उन्हें क्रियान्वित शरीर करता है।

दोनों का स्वस्थ होना आवश्यक है, परंतु आज के समय में मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य की गंभीर उपेक्षा की जा रही है।

आधुनिक जीवनशैली में हम प्रतिदिन 100 से अधिक कृत्रिम रसायनों के संपर्क में आते हैं जैसे कि

• पैकेज्ड भोजन (Prepackaged Food)
• रासायनिक संरक्षक (Preservatives)
• खाद्य प्रसंस्करण में प्रयुक्त योजक (Food Additives)
• मिलावटी सामग्री—फसलों में रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilisers)
• रसायनों से पाले गए पोल्ट्री और पशुधन (Chemicals used in Poultry and Animal Husbandry)

ये विषैले तत्व आंतरिक अंगों पर अत्यधिक भार डालते हैं और आधुनिक जीवनशैली जनित अधिकांश रोगों का कारण बनते हैं।

मांसाहार: आधुनिक जीवनशैली रोगों का एक प्रमुख कारण

वैश्विक स्तर पर उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि मांसाहार का गहरा संबंध निम्न रोगों से है—

• कैंसर
• हृदय रोग
• मोटापा
• मधुमेह
• हार्मोनल असंतुलन

इन तथ्यों की पुष्टि ऑनलाइन उपलब्ध शोधों से सरलता से प्राप्त की जा सकती है।

केवल जिम जाना पर्याप्त क्यों नहीं हैं

जिम मांसपेशियाँ बनाते हैं—परंतु

• आंतरिक अंगों की देखभाल कौन करता है?
• यकृत, गुर्दे, आंतें, फेफड़े और हृदय को कौन सुदृढ़ बनाता है?

आधुनिक फिटनेस प्रणालियाँ आंतरिक स्वास्थ्य पर अधिकतर केवल दवाओं और सप्लीमेंट्स के माध्यम से ध्यान देती हैं।

योग: आंतरिक और बाह्य स्वास्थ्य का पूर्ण विज्ञान

 योग आसन
• मांसपेशियों का
• तंत्रिकाओं का
• इंद्रियों का
• आंतरिक अंगों का
• ग्रंथियों का
विशिष्ट रूप से पोषण करते है तथा

• रक्त एवं लसीका तंत्र को मस्तिष्क से लेकर पैरों तक योग सम्पूर्ण शरीर को सुदृढ़ बनाता है।

हालाँकि, सभी आसनों का प्रतिदिन अभ्यास व्यावहारिक नहीं है। इसलिए एक विशेष, संतुलित और अनुकूलित दैनिक योग दिनचर्या आवश्यक है।

एक सुझाई गई दिनचर्या इस पृष्ठ पर उपलब्ध कराई गई है।

योग एवं ध्यान का वैश्विक विस्फोट
विश्व में योग का प्रसार

• विश्व में 30 करोड़ से अधिक लोग योग का अभ्यास करते हैं।
• अमेरिका में योग साधकों की संख्या 2012 में 2.04 करोड़ से बढ़कर 2016 में 3.6 करोड़ हो गई। कई रिपोर्टों के अनुसार पिछले 5 वर्षों में अमेरिका में योग साधकों की संख्या लगभग 50% बढ़ी है।

विश्वभर में ध्यान

• विश्व में लगभग 20 से 50 करोड़ लोग ध्यान करते हैं।
• कोविड-19 महामारी के समयकाल में कुछ क्षेत्रों में ध्यान का उपयोग 2900% तक बढ़ गया।

ये आँकड़े प्राकृतिक, वैदिक-आधारित उपचारों की ओर विश्वव्यापी झुकाव को दर्शाते हैं।

योग: परम स्वास्थ्य और दीर्घायु का मार्ग योग आज भी सबसे महत्वपूर्ण
भारतीय ज्ञान प्रणाली है— जो राष्ट्रीय सीमाओं, आस्था, धर्म या नस्ल से परे सभी मानवों के लिए समान रूप से लाभकारी है।

योग को जीवन में अपनाने का
सर्वोत्तम समय युवावस्था है।


युवा अवस्था में शरीर शीघ्र अनुकूलन कर लेता है और सही संतुलन में आ जाता है।

जितनी शीघ्र आरम्भ किया जाए, उतना ही अधिक लाभ होता है।

हमने योग पर एक विस्तृत मार्गदर्शिका यहाँ उपलब्ध कराई है

कुंडलिनी योग

योग की अनेक आधुनिक प्रक्रियायें मूल वैदिक योग मार्ग से पूर्ण रूप से भिन्न बना दी गई हैं। 

जबकि केवल व केवल मूल योगासन ही प्रमाणित हैं।

हमने इन योगिक साधनाओं को अपनी व्यक्तिगत दिनचर्या में सम्मिलित किया है और इन्हें अत्यंत प्रभावशाली पाया है।

कुंडलिनी योग पर हमने प्राचीन हिंदू शास्त्रों के आधार पर गहन अनुसंधान और अभ्यास किया है।

कुंडलिनी योग के विषय में यहाँ और पढ़ें

आयुर्वेद

पूर्ण उपचार का प्राचीन विज्ञान — आयुर्वेद,
अर्थात् जीवन का विज्ञान,
मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक है, जिसका वर्णन अथर्ववेद में किया गया है।

आयुर्वेद क्यों प्रभावी है? क्यूंकि यह

• प्राकृतिक रसायन व जड़ी-बूटियों पर आधारित है
• रोग के मूल कारणों को समाप्त करता है
• स्थायी उपचार प्रदान करता है
• न्यूनतम या नगण्य दुष्प्रभावी है

आयुर्वेद इन शारीरिक बिमारियों का सफलतापूर्वक उपचार करता है

•  यकृत (लिवर) विकार
• हृदय संबंधी समस्याएँ
• दमा
• मधुमेह
• गठिया
• थायरॉइड विकार
• रक्तचाप
• कान-नाक-गला (ईएनटी) रोग
• त्वचा संबंधी समस्याएँ
• बालों का झड़ना
• कोलेस्ट्रॉल
• तथा अनेक अन्य रोग

आज आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया जा चुका है— यहाँ तक कि आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सक भी आयुर्वेदिक यकृत औषधियाँ लिखते हैं।

यह सब क्यों महत्वपूर्ण है:
आपका स्वास्थय ही आपके संपूर्ण जीवन-उद्देश्य को संचालित करता है


अधिकांश लोग धन अर्जित करने या अपने व्यवसाय में सफलता पाने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करते हैं और शारीरिक स्वास्थय की उपेक्षा करते हैं।

परंतु आपका व्यवसाय किससे संचालित होता है?
आपके मन से।

और आपके मन को कौन सहारा देता है?

आपका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य।

श्रीमद्भगवद्गीता स्पष्ट रूप से घोषित करती है—

• स्वधर्म अथवा कर्तव्य पालन मनुष्य का एक प्रमुख कर्म है
• मन पर नियंत्रण प्रत्येक मानव के लिए अनिवार्य है
• अभ्यास के द्वारा मन को नियंत्रण में लाया जा सकता है

यही प्रथम चरण का मूल सार है

उत्तम बुद्धि → उत्तम मन → उत्तम स्वास्थ्य → उत्तम जीवन

पग दो
मन पर नियन्त्रण

उच्चतम बुद्धि का द्वार

मन पर नियंत्रण क्यों आवश्यक है

आप जो भी कर्म करते हैं—और जो भी परिणाम प्राप्त करते हैं— उनका मूल स्रोत मानसिक अवस्था होती है।

वैदिक मार्ग पर चलने के लिए मन पर नियंत्रण कोई वैकल्पिक विषय नहीं है;

यह आध्यात्मिक, व्यक्तिगत और व्यावसायिक— सभी प्रकार की सफलता का प्रारंभिक बिंदु है।

और मन को साधने की सबसे प्रभावशाली विधि है— ध्यान।

ध्यान : मन-साधना की मूल, पूर्ण और प्राचीन प्रणाली

विश्वभर में करोड़ों लोग मेडिटेशन के विषय में जानते हैं, परंतु बहुत कम लोग यह जानते हैं कि वैश्विक मेडिटेशन आंदोलन वैदिक साधना ध्यान के एक सरलीकृत और अपूर्ण रूप से उत्पन्न हुआ है।

मेडिटेशन के अपने लाभ अवश्य हैं, परंतु वह ध्यान द्वारा प्रदान की जाने वाली पूर्णता का केवल एक अंश मात्र है।

मेडिटेशन व ध्यान में वास्तविक अंतर

मेडिटेशन (आधुनिक स्वरूप)

• मुख्यतः श्वास पर ध्यान केंद्रित करता है
• एकाग्रता बढ़ाने में पूर्ण रूप से सहायक नहीं होता है
• मुख्य रूप से पाश्चात्य जगत द्वारा अपनी धारणाओं अनुसार लोकप्रिय बनाया गया
• पाश्चात्य मेडिटेशन एक सीमित प्रणाली है—आगे कोई गहन प्रगति नहीं

ध्यान
मूल प्राचीन वैदिक मन साधन का विज्ञान


ध्यान एक अत्यंत उन्नत प्रणाली है जो तीन शक्तिशाली उद्देश्यों की पूर्ति करती है

मन की एकाग्रता को तीव्र और स्थिर करना
संस्कृत मंत्रों के माध्यम से बुद्धि का शोधन और परिष्कार करना
गुरु, देवता और एक परम सर्वोच्च ईश्वर के साथ आंतरिक एकत्व स्थापित करना

मेडिटेशन = केवल एकाग्रता का अभ्यास

ध्यान = मन + बुद्धि + आंतरिक अनुभव का पूर्ण रूपांतरण


ध्यान का स्थान लेकर मेडिटेशन
एक स्थूल रूप क्यों बन गया


आधुनिक मेडिटेशन का विकास पाश्चात्य समाज में हुआ, जहाँ

• गुरु की भूमिका
• संस्कृत मंत्रों की आवश्यकता
• देवताओं का महत्व
• दीक्षा की अवधारणा
अज्ञात थीं, ठीक से समझी नहीं गईं अतः अपनाई नहीं गईं।

इसी कारण मूल वैदिक ध्यान को केवल श्वास-आधारित तकनीक में परिवर्तित कर दिया गया। इससे मेडिटेशन तो सरल और सुलभ बन गया, परंतु वह ध्यान की तुलना में कहीं कम प्रभावशाली रह गया।

ध्यान में
संस्कृत मंत्र + साकार दृष्टि स्थापित करना 
एक वैज्ञानिक और मापनीय विधि है

ध्यान में दो पवित्र साधनों का प्रयोग होता है—

1. साकार दृष्टि स्थापन (गुरु या देवता का ध्यान) यह मन को एक स्थिर आधार देता है और चंचलता को रोकता है।
2. संस्कृत मंत्रः  संस्कृत वर्णों की संरचना मन और बुद्धि की गहराई में जाकर शुद्धिकरण और संतुलन उत्पन्न करती है।

ये दोनों मिलकर ऐसी रूपांतरणकारी प्रक्रिया निर्मित करते हैं जिसकी तुलना आधुनिक मेडिटेशन से कहीं अधिक उन्नत है।

ध्यान सुस्पष्ट और संरचित है।

मेडिटेशन असंरचित है।


मेडिटेशन की कोई निश्चित माप-प्रणाली नहीं न निश्चित अवधि  साधक बार-बार घड़ी देखता है,अभ्यास बार-बार बाधित होता है।
मेडिटेशन को ही अंतिम लक्ष्य बना दिया गया है।

जबकि ध्यान एक प्रारम्भिक व जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है।

ध्यान में प्राचीन और सटीक मापन प्रणाली के माध्यम से संचालित हो सकती है।  ध्यान में जप-माला (108 मनकों वाली माला) का प्रयोग किया जाता है।

मंत्र-जप माला के आवर्तनों द्वारा गिने जाते हैं—

• कुछ मंत्रों के लिए 1 आवर्तन
• कुछ के लिए अनेक आवर्तन
• उन्नत साधनाओं में महीनों या वर्षों तक हजारों आवर्तन

यह प्रक्रिया 

• निरंतरता
• अनुशासन
• अखंड एकाग्रता
• गहन मानसिक तल्लीनता

सुनिश्चित करती हैं।

माला एक वैज्ञानिक उपकरण बन जाती है— जो एकाग्रता तोड़े बिना प्रगति को मापने में सहायक होती है।
ध्यान वह परिणाम देता है जो मेडिटेशन नहीं दे सकती।

ध्यान मन, मंत्र और आंतरिक चेतना को एकीकृत प्रक्रिया में संरेखित करता है। इसके वर्तमान वैश्विक संदर्भ में महत्वपूर्ण परिणाम इस प्रकार हैं

• मानसिक स्पष्टता
• उन्नत बुद्धि
• भावनात्मक स्थिरता
• गहन आध्यात्मिक अनुभव
• दिव्य चेतना से संबंध


मेडिटेशन ये परिणाम नहीं दे सकता, क्योंकि वह ध्यान की पूर्ण प्रणाली का केवल एक अपूर्ण अंश है।

ध्यान: मन पर पूर्ण अधिकार का वास्तविक मार्ग

मन-नियंत्रण सनातन धर्म की आधारशिला है— और ध्यान वह विधि है जिसे प्राचीन शास्त्रों ने निर्धारित किया है।

ध्यान तथा उसके पीछे के सम्पूर्ण विज्ञान को समझने के लिए नीचे दिए गए विस्तृत पृष्ठ को देखें।

गुरू दीक्षा

आध्यात्मिक वैदिक मार्ग का प्रारम्भ

  गुरु दीक्षा क्यों अनिवार्य है?

ध्यान मन को एकाग्र करने का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है, परंतु किसी भी विशेष कौशल की भाँति इसे भी सही विधि से सीखना आवश्यक होता है।

ध्यान नित्य आवश्यक है। इस में भी यह जानना आवश्यक है कि किन मन्त्रों का जाप नित्य करना चाहिये, कितना करना चाहिये इत्यादि।

इसी प्रकार साधनाओं की प्रक्रियायें विशिष्ट होती हैं। सहस्त्रों साधनायें हैं, कुछ केवल एक दिन की, कुछ में सप्ताह लगते हैं। कुछ मे महीने लग जाते हैं। कुछ साधनायें वर्षों चलती हैं। 

कौन सी साधना किस प्रकार करनी है?
मन्त्रों का चयन कैसे करना चाहिये?


क्युँकि एक मन्त्र जो एक व्यक्ति के लिये लाभदायक हो दूसरे के लिये हानिकारक हो सकता है। एक ही बार बैठ कर लाखों की संख्या में जाप नहीं किया जा सकता, तो जिस मन्त्र को सहस्त्रों या लाख बार जपना हो वह कैसे करें? इत्यादि अनेकों ऐसे अन्य भी तथ्य हैं जिन को एक गुरु अथवा टीचर ही बता सकता है।

हर प्रकार के ज्ञान के लिए एक शिक्षक की आवश्यकता होती है— और वही हिन्दी भाषा में शिक्षक अथवा गुरु कहलाता है।

गुरु दीक्षा शिष्य बनने की औपचारिक प्रक्रिया है।

यह ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी कोचिंग कक्षा या विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर किसी ऐसे व्यक्ति के मार्गदर्शन में अध्ययन करना जिसने उस ज्ञान में पूर्णता प्राप्त कर ली हो।

आप एक से अधिक गुरुओं से दीक्षा ले सकते हैं जिस प्रकार विद्यालयों में विभिन्न विषयों के लिए भिन्न-भिन्न शिक्षक होते हैं, उसी प्रकार आध्यात्मिक क्षेत्र में भी विभिन्न विषयों और साधनाओं के विशेषज्ञ होते हैं।

कोई भी एक गुरु हर साधना या हर आध्यात्मिक विद्या का पूर्ण ज्ञान नहीं रखता।

अतः

• आप विभिन्न गुरुओं से भिन्न-भिन्न विषयों पर गुरु दीक्षाएँ प्राप्त कर सकते हैं
• प्रत्येक दीक्षा आपको किसी विशिष्ट साधना, मंत्र या आध्यात्मिक विज्ञान में प्रशिक्षित करती है यह प्रक्रिया पूर्णतः स्वाभाविक है और प्राचीन परंपरा के पूर्णतः अनुरूप है।

क्या प्राचीन ज्ञान निःशुल्क था?
एक सामान्य भ्रांति

बहुत से लोग यह मानते हैं कि पवित्र या आध्यात्मिक ज्ञान सदैव निःशुल्क दिया जाना चाहिए। परंतु वास्तविकता यह है कि प्राचीन भारत में भी गुरुकुल कभी निःशुल्क संस्थाएँ नहीं थे।

• विद्यार्थियों से उनकी आर्थिक क्षमता के अनुसार गुरु दक्षिणा ली जाती थी
• निर्धन किंतु प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी
• अधिकांश गुरुकुल स्थानीय राजाओं एवं समाज के सहयोग से संचालित होते थे • केवल वास्तव में जिज्ञासु और इच्छुक विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाता था

आधुनिक समय की वास्तविकता आज के समय में संस्थानों को राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं होता। हमारे जैसे संस्थानों को चलाने की लागत अत्यधिक होती है। हम दान स्वीकार नहीं करते। अतः संस्था के संचालन हेतु कुछ निश्चित शुल्क का भुगतान आवश्यक हो जाता है।

गुरु दीक्षा में नामांकन करने पर आपको क्या प्राप्त होता है?

उमा कैलाश फाउंडेशन द्वारा गुरू दीक्षा दो प्रकार से प्रस्तावित की गई है।
गुरु दीक्षा में नामांकन करने पर आपको एक संपूर्ण दीक्षा-पैकेट प्राप्त होता है— जिसे चरणबद्ध मार्गदर्शन के लिए अत्यंत सावधानी और सुविचार के साथ तैयार किया गया है।

 आपके दीक्षा-पैकेट में यह समस्त सम्मिलित है—

गुरु पूजा पद्धति
तीन शक्तिशाली संस्कृत मंत्र
श्री गुरुजी महाराज का चित्र
एक जप-माला
एक गुरु चादर
एक यज्ञोपवीत (जनेऊ)
एक विस्तृत दीक्षा मार्गदर्शिका पुस्तिका,
जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि

घर पर ध्यान कैसे करें?
घर पर पूजा की व्यवस्था कैसे करें?
दीक्षा मंत्रों का जप कैसे करें?
प्रतिदिन प्रत्येक मंत्र के कितने आवर्तन (राउंड) करने हैं?
साधनाओं के लिए मंत्र का चयन कैसे करें? (क्योंकि प्रत्येक मंत्र हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता)
साधनाएँ कैसे की जाएँ?
साधना करने की आवश्यक क्या हैं?
स्तोत्रों का चयन कैसे करें?
स्तोत्रों का पाठ कैसे करें?
कौन-से दैनिक स्तोत्रों का पाठ किया जा सकता है?
अनुष्ठान कैसे किए जाएँ?
और भी बहुत कुछ।

संपूर्ण सामग्री को इस प्रकार स्पष्ट और सुव्यवस्थित किया गया है कि संसार के किसी भी कोने में रहने वाला व्यक्ति इस मार्ग का सरलता से अनुसरण कर सके।

दोनो प्रक्रियाओं का विवरण इस पृष्ठ पर देखें।

न आश्रम।
न रिट्रीट।
न दान।


घर में रहते ही ध्यान व साधना।

आपकी सम्पूर्ण साधना आपके अपने घर से ही की जानी है— चाहे आप संसार में कहीं भी रहते हों और सामान्य दैनिक जीवन में हों।

• कोई महंगे रिट्रीट नहीं
• आश्रमों में अनिवार्य प्रवास नहीं
• कोई सशुल्क कार्यशालाएँ नहीं
• कोई निरंतर दान नहीं

उद्देश्य है— सच्चे वैदिक मार्ग को सुलभ, व्यावहारिक और शुद्ध बनाना।

गुरु दीक्षा: एक पुनर्जन्म

जीवन का एक नया अध्याय प्राचीन शास्त्र गुरु दीक्षा को द्वितीय जन्म के रूप में वर्णित करते हैं।

जिस क्षण आप दीक्षा प्राप्त करते हैं—

• जीवन का एक नया अध्याय आरंभ होता है
• आप एक अनुशासित और सुव्यवस्थित मार्ग पर प्रवेश करते हैं
• जीवन में भटकाव समाप्त होता है
• आप अपने जीवन और अपने भाग्य का स्वयं नियंत्रण संभाल प्रारंभ कर देते हैं


गुरु दीक्षा आपको अपने आंतरिक व बाह्य संसार को पुनः गढ़ने के साधन प्रदान करती है— और परिणामस्वरूप आपका आंतरिक व बाह्य जीवन स्वाभाविक रूप से रूपांतरित होने लगता है।

रूपांतरणकारी परिणाम

सनातन धर्म के मार्ग पर चलना
सनातन धर्म केवल एक कुछ समय की
आध्यात्मिक यात्रा नहीं है
यह मानव जीवन रूपांतरण का एक संपूर्ण विज्ञान है।

सनातन धर्म के मार्ग पर अनुशासनपूर्वक चलने से आप ऐसी क्षमताएँ जाग्रत करते हैं जिन्हें

आधुनिक शिक्षा,
व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम या
कॉर्पोरेट प्रशिक्षण


कभी प्रदान नहीं कर सकते।

आगे वे जीवन-परिवर्तनकारी परिणाम दिए गए हैं जिनका आप स्वयं अनुभव करेंगे

1. विचार-प्रक्रिया पर पूर्ण नियंत्रण मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है— सटीक और स्पष्ट रूप से सोचने की क्षमता।

आज के समय में अधिकांश लोगों का मन अत्यंत विचलित और अस्थिर रहता है जिस कारण सामान्य जन की सोचने की क्षमता क्षीण होती जा रही है।

आम जन हड़बड़ाहट में, समय के अभाव में, जल्द से जल्द अधिक धन कमाने के लिये, बिना पर्याप्त सोच विचार किये एक के बाद एक गलत निर्णय लेता रहता है। जिस कारण वह जीवन में संकटो से घिरा रहता है। चाहे वह धनी हो अथवा गरीब। 

परंतु केवल व केवल सनातन मार्ग के माध्यम से आप यह क्षमता विकसित कर सकते हैं जिस के द्वारा आप

• बिना भटके मन को एक ही विषय पर स्थिर रख सकें
• बातचीत, वाद-विवाद या निर्णय लेते समय मानसिक विचलन से बच सकें
• दूरगामी परिणामों को स्पष्ट रूप से पहले ही देख सकें
• अधिक तीक्ष्ण, अधिक सटीक निर्णय ले सकें


इस स्तर का मानसिक नियंत्रण दुर्लभ है, परंतु व्यवसाय, संबंधों और नेतृत्व में सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

2. अधिक सशक्त और सृजनात्मक बुद्धि आपकी मौलिक चिंतन-क्षमता स्वाभाविक रूप से विस्तार पाती है। आपमें यह क्षमताएँ विकसित होने लगती हैं

• नए विचारों की उत्पत्ति
• स्वतंत्र और आत्मनिर्भर चिंतन
• संतुलित एवं प्रभावशाली दृष्टिकोण
• नवीन दृष्टि से समस्याओं का समाधान शुद्ध मन सृजनात्मक प्रतिभा को जाग्रत करता है। नवाचार, समस्या-समाधान, लेखन, रणनीति-निर्माण और कलात्मक दृष्टि— सभी उच्च स्तर पर पहुँच जाते हैं।

यह रचनात्मकता (रचनात्मकता) आपकी स्वाभाविक शक्ति बन जाती है। यही वास्तविक बौद्धिक सामर्थ्य है।

3. गहन और अडिग एकाग्रता
आपका ध्यान अत्यंत तीक्ष्ण और स्थिर हो जाता है।

चाहे आप जो कुछ भी कर रहे हों जैसे कि


• वाहन चला रहे हों
• मशीनरी संचालित कर रहे हों
• रणनीति बना रहे हों
• अध्ययन कर रहे हों
• किसी टीम का प्रबंधन कर रहे हों

अथवा किसी भी प्रकार का कोई भी कार्य कर रहे हों, व्यक्तिगत अथवा सार्वजनिक, पर्सनल अथवा प्रोफेशनल

आपका मन व लक्ष्य ठीक वहीं रहता है जहाँ आप उसे रखना चाहते हैं।
यह एकाग्रता आपके प्रत्येक कर्म की गुणवत्ता को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा देती है।

4. भावनात्मक स्थिरता और संतुलन
आप आवेग में प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं।


उसके स्थान पर परिपक्वता, शांति और विवेक से प्रतिक्रिया देना प्रारंभ करते हैं। भावनाएँ आपको नियंत्रित करना बंद कर देती हैं— आप उन्हें नियंत्रित करने लगते हैं।

5. वास्तविक प्राथमिकताओं की स्पष्ट समझ
आपका मन तुरंत यह पहचानने में सक्षम हो जाता है


• क्या महत्वपूर्ण है
• क्या महत्वहीन है
• किस कार्य पर ऊर्जा लगानी चाहिए
• किसे कुछ समय बाद भी बिना हानि किया जा सकता करना चाहिए
इत्यादि।

यह स्पष्टता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में निर्णय-क्षमता को अत्यंत उच्च स्तर पर पहुँचा देती है।

6. निर्मल चिंतन और प्रभावशाली वाणी जैसे-जैसे आपका मन शुद्ध और स्थिर होता है, वैसे-वैसे आपकी वाणी

• स्पष्ट
• सटीक
• प्रभावी
• तर्कसंगत हो जाती है।

यह व्यवसाय, नेतृत्व, वार्ता और संबंधों में असाधारण लाभ प्रदान करता है।

7. जीवन की अनिश्चितताओं का समापन

सनातन धर्म का मौलिक रूप समझने के पश्चात और सनातन मार्ग पर आरम्भ हो कर

जब आप गहन विचार के साथ निष्पक्ष रूप से निर्णय लेते हैं, तो आपके निर्णय अधिक सही होते हैं। इससे मन में यह शंका समाप्त हो जाती है कि निर्णय सही लिया या नहीं।

याद रखें

यदि आप सत्य के सनातन मार्ग का अनुसरण करते हैं, तो परिस्थितियाँ कैसी भी हों, परिणाम व्यापक रूप से अनुकूल होंगे।

8. एकाग्रता और उच्च बुद्धि का विकास

गहन एकाग्रता के बिना कोई मंत्र या साधना फलदायी नहीं होती।

अधिकांश लोग आध्यात्मिक साधना और जीवन— दोनों में इसलिए असफल होते हैं क्योंकि उनमें एकाग्रता का अभाव होता है।

सनातन विधि के माध्यम से

• आपकी एकाग्रता सुदृढ़ होती है
• उच्च बुद्धि जाग्रत होती है
• आंतरिक स्पष्टता तीव्र होती है आपको वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक मानसिक आधार प्राप्त होता है।

9. धृति का विकास — मानसिक स्थैर्य की सर्वोच्च शक्ति

आधुनिक विज्ञान के पास धृति जैसी कोई अवधारणा है ही नहीं। जब कि श्रीमद्भाग्वद गीता में धृति को बुद्धि का एक आवश्यक अंग माना गया है।

धृति मानव बुद्धि का एक अत्यंत उच्च गुण है, जिसे बहुत कम लोग समझते हैं।

धृति आपको यह क्षमता देती है कि आप

• मन पर नियंत्रण रखें
• धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर सकें
• आवेगपूर्ण निर्णयों से बच सकें
• परिणामों का विवेकपूर्ण मूल्यांकन कर सकें
• दबाव में भी सही निर्णय ले सकें

यही धृति वह गुण है जो मानव बुद्धि को कृत्रिम बुद्धिमत्ता
(Artificial Intelligence) से श्रेष्ठ बनाता है।

बुद्धि और धृति— दोनों पर श्रीमद्भगवद्गीता में विशेष बल दिया गया है, और सनातन धर्म की साधनाएँ इन्हें विकसित करने के लिए ही निर्मित की गई हैं।

10. नकारात्मकता का समाप्त होना और सकारात्मकता का विकास

आधुनिक समाज नकारात्मकता से ग्रस्त है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इसे समाप्त कैसे किया जाए।

सनातन धर्म इसका वैज्ञानिक और प्रभावशाली समाधान प्रदान करता है

सात्त्विक आहार मांस, मछली, अंडा तथा तामसिक और राजसिक भोजन से मुक्त सात्त्विक जीवनशैली मन को शुद्ध करती है और चेतना को ऊँचा उठाती है।

सात्त्विक आहार

• नकारात्मकता को दूर करता है
• आंतरिक शांति को बढ़ाता है
• मानसिक स्पष्टता को सुधारता है
• आध्यात्मिक ऊर्जा को सुदृढ़ करता है
• भावनात्मक स्थिरता को बढ़ाता है

मांसाहार नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ाता है और मन को अशांत करता है।

भोजन व भाषा की शुद्धता
विचारों की शुद्धता को जन्म देती है


यह सनातन धर्म का शाश्वत और सार्वभौमिक सत्य है।

आपका रूपांतरण कुछ ही दिनों में आरंभ हो जाता है

गुरु दीक्षा के माध्यम से निर्धारित दैनिक साधनाओं को जैसे ही आप प्रारंभ करते हैं, वैसे ही कुछ ही दिनों और सप्ताहों में

• बुद्धि तीक्ष्ण होने लगती है
• भावनाएँ स्थिर होती हैं
• जीवन स्पष्टता और उद्देश्य के साथ संरेखित होने लगता है सार रूप में

आप वही प्रज्ञा और गंभीरता विकसित करते हैं जो प्राचीन ऋषियों में थी।

यहाँ तक कि कम समय में लिए गए निर्णय भी दीर्घकाल में सही सिद्ध होने लगते हैं। 

गुरू दीक्षा लें और उत्तम बुद्धि और उत्तम जीवन की ओर पहला कदम उठाएँ।

उस आंदोलन का हिस्सा बनें जो सनातन धर्म की पूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान-परंपरा को पुनर्जीवित कर रहा है।

प्रामाणिक, मूल और संपूर्ण वैदिक मार्ग पर अपनी यात्रा आज ही प्रारंभ करें।

तीसरा पग
भविष्य को समझना

मानव जीवन अनिश्चितताओं से भरा हुआ है।
कोई भी वास्तव में यह नहीं जानता कि कल क्या होगा या अगले ही क्षण क्या घटित होगा।

 फिर भी, प्राचीन सनातन शास्त्र आपके भविष्य की व्यापक रूपरेखा को समझने की एक अत्यंत शक्तिशाली विधि प्रदान करते हैं।

ज्योतिष

भविष्य का व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करने वाला एकमात्र वैदिक विज्ञान

वैदिक ज्योतिष (ज्योतिष शास्त्र) वह एकमात्र प्राचीन विज्ञान है जो भविष्य की संभावनाओं को विशेष रूप से किसी व्यक्ति के संदर्भ में सुव्यवस्थित रूप से समझने की क्षमता रखता है।

यह पवित्र विज्ञान तीन अपरिवर्तनीय आधारों पर आधारित है

जन्म तिथि
जन्म समय
जन्म स्थान

एक बार व्यक्ति का जन्म हो जाने पर ये तीनों तत्व सदा के लिए स्थिर हो जाते हैं। इन्हीं के आधार पर ग्रहों की स्थितियों के अनुसार सटीक वैदिक गणनाओं द्वारा जन्म कुंडली का निर्माण किया जाता है।

वैदिक जन्म कुंडली निम्नलिखित विषयों का उद्घाटन करती है

• जीवन के प्रतिमान
• व्यक्ति की शक्तियाँ और कमजोरियाँ
• अनुकूल एवं प्रतिकूल काल
• अवसर और चुनौतियाँ
• मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियाँ
• कर्मजन्य प्रभाव

(हम ज्योतिषीय सेवाएँ प्रदान नहीं करते। इच्छुक पाठक किसी भी प्रतिष्ठित ज्योतिषीय वेबसाइट या विशेषज्ञ से परामर्श कर सकते हैं।)

धन हर समस्या का समाधान क्यों नहीं है

अधिकांश लोग यह मानते हैं कि धन ही अंतिम सुरक्षा कवच है। परंतु यदि गहराई से विचार करें, तो यह स्पष्ट होता है कि

• जीवन की अधिकांश गंभीर समस्याएँ धन द्वारा नहीं सुल्झाई जा सकतीं।

• अनेक प्रतिकूल परिस्थितियाँ धन के बल पर रोकी नहीं जा सकतीं

• भावनात्मक पीड़ा, स्वास्थ्य संकट, अचानक घटने वाली घटनाएँ धन द्वारा नहीं रोकी जा सकती

धन हर समस्या का समाधान नहीं दे पाता


धन सहायक अवश्य है, परंतु वह अंतिम रक्षक नहीं है।

विशेषकर आधुनिक विश्व परिपेक्ष्य में हम देख सकते हैं कि पाश्चात्य जगत जो कि केवल धन व बाहुबल पर ही अपना वर्चस्व स्थिर रखना चाहता है, जिस के पास समस्त भौतिक साधन व आधुनिक विज्ञान की उपलब्धता है, वह पाश्चात्य जगत किस प्रकार युद्धों में उलझा हुआ है, किस प्रकार उनका समस्त धन उन के किसी काम नहीं आ रहा, जितना धन है भी वे संजो कर नहीं रख पा रहे, किस प्रकार पाश्चात्य जगत ने एक के बाद एक गलत निर्णय लिये।
ऐसा नहीं कि उन में बुद्धि का अभाव है। परन्तु यह नोट करें कि जो संस्कार भारतीय सभ्यता में स्थापित हैं वे किसी अन्य सभ्यता में हैं ही नहीं।

तो यदि संस्कार ही इतने शक्तिशाली हों तो वास्तविक सनातन ज्ञान कितना शक्तिशाली होगा?

सनातन ज्ञान ही परम रक्षक है।

ज्योतिष के माध्यम से अपने भाग्य को समझना

वैदिक ज्योतिष आपको भविष्य से संबंधित आपके जीवन में मुख्यतः निम्न संभावनाओं को समझने में सहायता करता है

• धन, संपत्ति और वैभव
• शिक्षा और करियर
• विवाह और संबंध
• संतान
• व्यवसाय और नौकरी की स्थिरता
• सुख और समृद्धि
• प्रतिकूल काल और कठिन परिस्थितियाँ
• छिपे हुए शत्रु
• उन्नति के अवसर
• जीवन की प्रमुख घटनाओं का समय

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, ये सभी विषय मुख्यतः पूर्व जन्म के कर्मों और वर्तमान जीवन के प्रयासों के संयुक्त परिणाम होते हैं।

प्रयास व श्रम सदैव आवश्यक है

यदि आपके भाग्य में धन का संकेत हो, तब भी आपको

• उसे अर्जित करना होगा
• उसके लिए परिश्रम करना होगा
• योजना बनानी होगी
• उसका संरक्षण करना होगा
• सही निर्णय लेने होंगे

यहाँ तक कि समस्त धन होने के पश्चात भी भोजन करने के लिए भी आपको

रसोई उपकरण एकत्र करने पड़ते हैं
अनेको बर्तन एकत्र करेने पड़ते हैं
गैस चूल्हे का आयोजन करना पड़ता है
भोजन सामग्री एकत्र करनी होती है
भोजन पकाना पड़ता है
भोजन परोसना पड़ता है
कौर को मुख तक ले जाना पड़ता है

तब कहीं जा कर आप अपना व परिवार का पेट भरने में सक्षम होते हैं।

जीवन में प्रत्येक उपलब्धि प्रयास की माँग करती है।

ज्योतिष के माध्यम से आप अपने जीवन का एक व्यापक दृष्य प्राप्त करने मे सक्षम होते हैं। जिस दृष्य के अनुसार आप अपने जीवन का व्यापक निर्धारण कर सकते हैं। 

ज्योतिष द्वारा जीवन परिचय प्राप्त होने पर आप पूर्व में ही आवश्यक कदम उठा सकते हैं।

ज्योतिष एवं भाग्य के विषय में और अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करें।

response@umakailash.org

चौथा पग
अपने भविष्य पर
नियन्त्रण स्थापित करना

अधिकांश ज्योतिषी आचार्य
वैदिक समाधान प्रदान करने में सक्षम नहीं होते


कई ज्योतिषी भविष्य के विषय में अत्यंत सटीक भविष्यवाणियाँ कर सकते हैं और आपके अतीत में घटित घटनाओं के विषय में भी सही जानकारी दे सकते हैं।

साधारण व्यक्ति इन बातों से इतना प्रभावित हो जाता है कि वह ज्योतिषी को ही गुरु मान लेता है और उससे समाधान की भी अपेक्षा करने लगता है।

परंतु अधिकांश ज्योतिषियों को वैदिक साधनाओं और शास्त्रीय मार्गों की विस्तृत एवं गहन समझ नहीं होती। इसी कारण वे सही, प्रभावी और शास्त्रसम्मत समाधान प्रदान करने में सक्षम नहीं होते।

ज्योतिष शुद्ध गणित है

और कुंडली का सही निर्माण तथा पठन कोई भी व्यक्ति सीख सकता है।

यह एक महान वैदिक विज्ञान है।

आज इंटरनेट पर कुंडलियाँ निःशुल्क भी उपलब्ध हैं।

परंतु पूर्व कर्मों के कारण उत्पन्न समस्याओं के समाधान सरल नहीं होते।

इसी कारण हिंदू शास्त्र उस मार्ग को परिभाषित करते हैं जिसका वर्णन इस पृष्ठ पर किया गया है।

भविष्य के लिए समाधान

पूर्व कर्म का महत्व और शक्ति

पूर्व कर्म आपके जीवन के प्रत्येक क्षण को आकार देता है।

आपके इस जन्म और पूर्व जन्मों में किए गए कर्म

आपके भाग्य को नियंत्रित करने वाली सबसे शक्तिशाली शक्तियों में से एक हैं।

कोई भी सांसारिक शक्ति कर्म के फलों को मिटा नहीं सकती व परास्त नहीं कर सकती

• न अकूत धन सम्पदा
• न राजनीतिक प्रभाव
• न बुद्धि
• न अधिकार

प्रत्येक मनुष्य को अपने पूर्व कर्मों के अनुसार अनुकूल और प्रतिकूल
दोनों प्रकार के काल से अवश्य हो कर निकलना पड़ता है।

घटनाओं का यही अनिवार्य प्रवाह भाग्य (प्रारब्ध कर्म) कहलाता है।

केवल वैदिक ज्ञान में भाग्य को रूपांतरित करने की शक्ति है

कोई भी धन कठिन समय को रोक नहीं सकता।

कोई भी प्रभाव चुनौतियों को आने से नहीं रोक सकता।

परंतु वैदिक ज्ञान

• प्रतिकूल काल को शांति और संतुलन के साथ पार करने में सहायता करता है • अनुकूल समय के लाभों को अधिकतम करता है
• बाधाओं को पार करने के लिए मन को सुदृढ़ करता है
• जीवन को उच्चतर बुद्धि और स्पष्टता के साथ संरेखित करता है

वैदिक ज्ञान कर्म को समाप्त नहीं करता— वह उससे उत्पन्न समस्याओं से उबरने की शक्ति प्रदान करता है व मार्ग दर्शाता है।

वैदिक साधनाओं के लिए संस्कृत क्यों अनिवार्य है

वैदिक विधियों का प्रभावी प्रयोग करने के लिए संस्कृत का मूल पठन ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।

मूल संस्कृत मंत्र मानव बुद्धि जो कि पूर्व में किये गये दुष्कर्मों के कारण दूषित व भ्रष्ट हो चुकि है उस बुद्धि पर प्रत्यक्ष सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

केवल मूल संस्कृत मंत्र, स्तोत्र व अन्य साधन ही मनुष्य को दिव्य चेतना के साथ सही संरेखण में ला सकते हैं।

response@umakailash.org


अधिकांश हिन्दु सनातन वैदिक ज्ञान व प्रक्रियाओं से क्यूँ अनभिज्ञ हैं?

आज जिन क्रियाओं को “हिंदू कर्मकांड” के रूप में किया जा रहा है, उनमें से अधिकांश मूल वैदिक प्रणाली और उसकी साधनाओं से दूर भटक चुकी हैं।

पिछले लगभग 800 वर्षों से सनातन हिंदू ज्ञान को सुव्यवस्थित रूप में नहीं पढ़ाया गया है।

यह स्थिति ईस्वी सन् 1273 में नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश के बाद उत्पन्न हुई।

लगभग 15 से अधिक पीढ़ियों तक वैदिक ज्ञान व्यवस्थित रूप से प्रदान नहीं किया गया है।

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ।

फलस्वरूप, इतनी पीढ़ियों तक यह ज्ञान मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से वह भी खंडित और अपूर्ण रूप में आगे बढ़ता रहा।

इसी कारण अधिकांश साधनाएँ केवल कर्मकांड बनकर रह गईं हैं।

वर्तमान समय में किये जा रहे कर्मकांड मूल वैदिक प्रक्रियाओं से पूर्णतः भटकी हुई अवस्था है।

इस विचलन के परिणाम शताब्दियों तक सुव्यवस्थित शिक्षा के अभाव ने निम्न समस्याएँ उत्पन्न कीं

• अप्रभावी कर्मकांड
• धर्म के विषय में भ्रांत धारणाएँ
• युवाओं में आस्था का ह्रास
• प्राचीन साधनाओं पर आत्मविश्वास की कमी

जब तक कोई सच्चा गुरु मार्गदर्शन न करे, अधिकांश कर्मकांड अत्यंत सीमित परिणाम ही देते हैं।

वैदिक साधनाओं से पहले जीवनशैली सुधारना महत्वपूर्ण है।

आपकी जीवनशैली— आहार, अनुशासन, मन-नियंत्रण, विचार और आचरण— साधनाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण है। भले ही आप तुरंत उन्नत साधनाएँ आरंभ न करें, केवल सनातन जीवनशैली अपनाने मात्र से

• दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ
• मानसिक स्पष्टता
• भावनात्मक दृढ़ता
• मन की शुद्धता
• उच्चतर बुद्धि स्वाभाविक रूप से विकसित होने लगते हैं।

ये लाभ धीरे-धीरे प्रकट होते हैं, परंतु स्थायी होते हैं।

मानव शरीर को पवित्र मंदिर की भाँति क्यों सँभालना चाहिए

आपका शरीर वह यंत्र है जिसके माध्यम से आप प्रत्येक कर्म करते हैं।

आपका मस्तिष्क उस यंत्र का नियंत्रण कक्ष है।

यदि किसी मशीन की नियमित सफ़ाई, तेल-पानी और समुचित देखभाल की जाए, तो वह दशकों तक सुचारु रूप से कार्य करती है।

यदि उसकी उपेक्षा की जाए, तो वह बार-बार खराब हो जाती है।

यही सिद्धांत मनुष्य पर भी लागू होता है

• उपेक्षित शरीर रोगों और आयु के साथ घटती क्षमता का कारण बनता है
• उपेक्षित मन भ्रम, दुर्घटनाओं, आवेग और भावनात्मक टूटन को जन्म देता है
• उपेक्षित जीवनशैली दीर्घकालिक कष्ट का कारण बनती है

इसलिए मानव शरीर के आंतरिक और बाह्य संरक्षण को उच्चतर उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु एक अनिवार्य साधन के रूप में समझना अत्यंत आवश्यक है।

नित्य ध्यान

सनातन हिन्दु वैदिक मार्ग की मूल प्रक्रिया

वर्तमान समय में सोशल मीडिया पर अनेको जानकारियां उपलब्ध हो रही हैं। कोई केवल कहानियों पर केन्द्रित हैं, कोई चमत्कार दिखाकर गुरू बन गये हैं, अनेकों तो केवल तिलक लगाकर, भगवा पहन कर उपदेश दे रहे हैं, कोई कह रहे हैं कि बस यह कर लो, जीवन में चमत्कार हो जायेंगे। इत्यादि।

परन्तु एक सनातन मार्ग कोई नहीं बता रहा।

आपके रूपांतरण का केंद्रबिंदु और सबसे महत्वपूर्ण एकमात्र प्रक्रिया है

दैनिक ध्यान।

दैनिक ध्यान आपकी

• मानसिक स्पष्टता को तीव्र करता है
• बुद्धि का शोधन करता है
• मन को शांत करता है
• ब्रह्म तथा दिव्य शक्तियों से जोड़ता है
• पूरे दिन के लिए आपको मानसिक रूप से तैयार करता है
• आंतरिक भावनात्मक और मानसिक स्थिरता को सुदृढ़ करता है

दीक्षा-पैकेट में तीन मंत्र प्रदान किए जाते हैं। इन मंत्रों के आपको प्रतिदिन निर्धारित संख्या में कई आवर्तन (राउंड) करने होते हैं।

यह दैनिक प्रक्रिया 30 मिनट से भी कम समय में पूर्ण हो जाती है, परंतु जीवन पर इसका प्रभाव स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान होता है।

ध्यान आपकी बुद्धि के लिए दैनिक पोषण, दैनिक निर्माण और आजीवन साधना है।

ध्यान करना सीखें

एक सामान्य भ्रम

हिंदुओं के मन में यह एक गलत धारणा स्थापित कर दी गई है कि हवन या होम वायु की शुद्धि के लिए किया जाता है।

   परंतु श्रीमद्भगवद्गीता में हवन (होम) का जो मूल उद्देश्य बताया गया है, वह इससे भिन्न है।

हवन (होम) का वास्तविक उद्देश्य

हवन एक वैदिक प्रक्रिया है, जिसमें देवताओं को आहुति के रूप में अन्न अर्पित किया जाता है

अर्थात हवन द्वारा उन शक्तियों को भोजन प्रदान किया जाता है जो इस दृश्य एवं अदृश्य जगत को नियंत्रित करती हैं।

यह अवधारणा विस्तारपूर्वक 
SRS वीडियो श्रृंखला
में वर्णित है

पुस्तक
Sanatan Dharma A Complete Scientific Analysis
में बताया गया है कि किस प्रकार
हवन में दी जाने वाली आहूतियाँ
दिव्य शक्तियों के लिए अन्न है और
यह आपकी आध्यात्मिक आधारशिला को सुदृढ़ करता है।

यहीं से आप सनातन धर्म के वास्तविक केंद्र— उसकी साधनाओं—में प्रवेश करते हैं।

और अधिक समझने के लिए इस बटन पर क्लिक करें।

योग, स्तोत्र-पाठ एवं साधनाओं के माध्यम से पूर्व में किये गये पापों के दुष्प्रभावों का निवारण

स्तोत्र:
वैदिक परंपरा के शक्तिशाली, परंतु सबसे अधिक गलत समझे गए साधन

 वेदों और पुराणों में सहस्त्रों संस्कृत स्तोत्र उपलब्ध हैं

प्रत्येक स्तोत्र एक विशिष्ट उद्देश्य और विशिष्ट आध्यात्मिक प्रभाव के लिए रचा गया है।

परंतु आज के समय में अधिकांश लोग 

• उनके अर्थ को जाने बिना
• उनके उद्देश्य को समझे बिना
• केवल लोकप्रियता या परंपरा के कारण

स्तोत्र-पाठ करते हैं


इस प्रकार पाठ करने से स्तोत्रों की वास्तविक शक्ति प्राप्त नहीं होती।

जब आप यह भली-भाँति समझ लेते हैं कि किस प्रभाव के लिये किस स्तोत्र का पाठ चाहिये तब वही स्तोत्र आपके जीवन के रूपांतरण का एक अत्यंत प्रभावशाली साधन बन जाता है।

स्तोत्रों का पाठ केवल संस्कृत में ही क्यों आवश्यक है

कई लोग यह मानते हैं कि केवल भाव (भक्ति) ही पर्याप्त है।

भक्ति महत्वपूर्ण अवश्य है, परंतु केवल भाव ही पर्याप्त नहीं है।

संस्कृत में रचित स्तोत्र और मंत्र एक गहन विज्ञान हैं, जो अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर मानव बुद्धि को प्रभावित करने के लिए रचे गए हैं। इनकी शक्ति निहित होती है

• मूल संस्कृत श्लोकों में
• शुद्ध उच्चारण में
• छंद में अनुवाद का पाठ या किसी अन्य भाषा में पाठ वांछित प्रभाव उत्पन्न नहीं करता।

केवल संस्कृत भाषा ही उस उद्देश्य को सिद्ध कर सकती है जिसके लिए वह विशिष्ट स्तोत्र रचा गया है।

स्तोत्र-पाठ पापों के प्रभाव को कम करता है पाप वे कर्म हैं जो यम और नियम के सिद्धांतों के न चलने के कारणरूप होते हैं।

पाप 

• मानसिक अशांति
• भावनात्मक असंतुलन
• दुर्घटनाएँ
• रोग
• बाधाएँ
• प्रतिकूल परिस्थितियाँ

उत्पन्न करते हैं।

और इस तथ्य का आधार
पूर्णतया वैज्ञानिक है


इन प्रभावों को न तो अनदेखा किया जा सकता है, न ही टाला जा सकता है।

परंतु वैदिक विधि से किए गए सही स्तोत्र-पाठ द्वारा इन प्रभावों को अधिक सीमा रेखा तक कम किया जा सकता है।

संस्कृत में उचित स्तोत्रों का पाठ मन की शुद्धि और पापों के प्रभावों के निराकरण का सबसे प्रभावी उपायों में से एक है।

सामान्यता प्रत्येक स्तोत्र में उसके लाभ स्पष्ट रूप से बताए जाते हैं

अधिकांश स्तोत्रों में प्रारंभ या अंत में कुछ विशिष्ट संस्कृत श्लोक होते हैं जो स्पष्ट करते हैं कि

• स्तोत्र का पाठ कैसे करना है
• उससे कौन-से लाभ प्राप्त होते हैं
• वह किन समस्याओं को दूर करता है
• कौन-से वरदान प्रदान करता है
• उसका अभ्यास कितनी बार करना चाहिए इत्यादि।

प्रत्येक देवी-देवता के ऐसे विशिष्ट स्तोत्र हैं जो पापों के प्रभाव को कम करते हैं और पूर्व कर्मों की शुद्धि में सहायक होते हैं।

दैनिक उपयोग हेतु कुछ स्तोत्र 

हमारे डाउनलोड पृष्ठ पर शक्तिशाली संस्कृत स्तोत्रों का एक संग्रह उपलब्ध है, जिन्हें आप निःशुल्क डाउनलोड कर तुरंत उपयोग में ला सकते हैं।

नए स्तोत्र नियमित रूप से जोड़े जाते हैं, जिस से प्रत्येक साधक को प्रामाणिक और मूल वैदिक साधनों तक सुगम पहुँच मिल सके।

कौन-सा स्तोत्र पढ़ना चाहिए?

यह हमारी दीक्षा मार्गदर्शिका पुस्तिका बताएगी

भिन्न-भिन्न स्तोत्र भिन्न-भिन्न उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं

• मन की शुद्धि
• मानसिक दृढ़ता
• नकारात्मकता से संरक्षण
• बाधाओं का निवारण
• कार्य-सफलता
• रोगों का उपचार
• बुद्धि का रूपांतरण
• पूर्व एवं वर्तमान जन्मों के पापों के प्रभाव का क्षय तथा उनसे उत्पन्न अनेक समस्याओं का समाधान
• आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना
• और भी अनेक उद्देश्य

गुरु दीक्षा के माध्यम से आपको स्पष्ट मार्गदर्शन प्राप्त होता है

• प्रत्येक उद्देश्य के लिए उपयुक्त स्तोत्र कौन-सा है
• कितनी बार पाठ करना है
• सही समय क्या है
• दैनिक वैदिक साधनाओं में उसे कैसे सम्मिलित करना है

इससे यह सुनिश्चित होता है कि आपका स्तोत्र-पाठ सटीक, प्रभावी और आपके आध्यात्मिक लक्ष्यों के अनुरूप हो।

संस्कृत मंत्र या स्तोत्र का पाठ  करने से पाप कैसे दूर कर सकते हैं?

बहुत से लोग यह सोचते हैं कि केवल किसी
संस्कृत स्तोत्र का पाठ या
मंत्र का जाप
 करने से
पाप कैसे दूर हो सकते हैं या
जीवन में परिवर्तन कैसे आ सकता है?

  इसका उत्तर बुद्धि और आत्मा के उस विज्ञान में निहित है, जिसका वर्णन प्राचीन हिंदू शास्त्रों में किया गया है।

1. पाप मानव बुद्धि को दूषित और भ्रष्ट करते हैं

शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि पापों से होने वाली वास्तविक हानि बाहरी नहीं, अपितु मनुष्य के भीतर होती है।

पाप (धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध किए गए कर्म) बुद्धि में ऐसी छाप छोड़ते हैं, जो

• चिंतन को विकृत कर देती है
• स्पष्टता को कम कर देती है
• निर्णय-क्षमता को क्षीण कर देती है
• चेतना को आच्छादित कर देती है
• भावनात्मक संतुलन को बिगाड़ देती है

बुद्धि का यही दूषण आगे चलकर निम्न समस्याओं का मूल कारण बनता है

• गलत निर्णय
• गलत संबंध
• गलत प्राथमिकताएँ
• गलत कर्म
• गलत प्रतिक्रियाएँ
• दुर्घटनाएँ
• प्रतिकूल परिस्थितियाँ

और अंततः यही जीवन में दुःख का मूल कारण बन जाता है।

2. बुद्धि भौतिक शरीर का अंग नहीं

अपितु आत्मा में अन्तर्निहित होती है
आत्मा में वास करती है। 

वैदिक दर्शन के अनुसार

• शरीर नश्वर है
• परंतु आत्मा अजर अमर है और

आत्मा, मृत्यु पश्चात 

• बुद्धि
• संस्कार
• वर्तमान कर्म
• पूर्व कर्म
अपने साथ ले जाती है

अर्थात दूषित बुद्धि मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होती।

वह अगले जन्म में भी साथ चली जाती है और वर्तमान जीवन को प्रभावित करती है। इसी कारण कुछ लोग बार-बार

• भ्रम
• गलत निर्णय
• आत्म-संदेह
• भावनात्मक अस्थिरता
• दुःख के दोहराते हुए प्रतिमान का अनुभव करते हैं।

ये घटनाएँ संयोगवश नहीं होतीं— ये पूर्व जीवन की भूलों की प्रतिध्वनियाँ होती हैं।

3. संस्कृत स्तोत्र-पाठ
बुद्धि का शोधन करता है


संस्कृत स्तोत्र सामान्य काव्य नहीं होते।
वे 

• पवित्र मंत्रों का
• विशिष्ट वर्णों का
• मंत्रात्मक वर्णों का

एक अत्यंत सटीक संयोजन होते हैं

जब इनका शुद्ध उच्चारण के साथ नियमित पाठ किया जाता है, तो ये मन और आत्मा की सबसे गहरी परतों तक पहुँचते हैं।

यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी कंप्यूटर में
सुधारात्मक प्रोग्राम (Anti Virus Program) डाला जाए।

इनका प्रभाव इस प्रकार होता है

• बुद्धि पर जमी “धूल” को हटाने वाली शुद्धिकरण प्रक्रिया
• स्पष्टता को पुनः स्थापित करने वाली सुधारात्मक क्रिया
• पूर्व पापों के प्रभाव से बिगड़े हुए मानसिक प्रोग्राम को ठीक करने वाला शोधन • दिव्य चेतना के साथ पुनः संरेखण

समय के साथ मन की यह शुद्धि निम्न परिणाम उत्पन्न करती है

• अधिक सही और विवेकपूर्ण निर्णय
• गहन प्रज्ञा
• आंतरिक स्थिरता
• दुःख में कमी
• उच्चतर बुद्धि

संक्षेप में

पाप बुद्धि को विकृत करते हैं।
संस्कृत स्तोत्र और मंत्र बुद्धि को शुद्ध करते हैं।

शुद्ध बुद्धि सही निर्णय, उत्तम जीवन और वास्तविक सफलता की ओर ले जाती है।
4. शुद्ध बुद्धि पूर्व पापों के प्रभाव को क्षीण कर देती है

जब आपकी आंतरिक बुद्धि शुद्ध होने लगती है

• गलत निर्णयों की संख्या अत्यधिक कम हो जाती है
• भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ स्थिर हो जाती हैं
• अवसर अधिक स्पष्ट दिखने लगते हैं
• दिव्यता के साथ संरेखण होने पर बाधाएँ स्वयं क्षीण होने लगती हैं
• जीवन अधिक सहज और संतुलित हो जाता है

यही वह वास्तविक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से संस्कृत स्तोत्र-पाठ पापों के दुष्प्रभावों को दूर करता है।

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि आपको पाप कर्म करना भी बंद करना होगा। अन्यथा, पापों के प्रभाव पुनः उत्पन्न हो जाएँगे और स्तोत्र-पाठ के सकारात्मक परिणाम स्थायी नहीं रहेंगे।

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जब एक संस्कृत श्लोक का
उच्चारण करते हैं
तो वास्तविक रूप में क्या होता है?

संस्कृत श्लोकों का पाठ आपके मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर के लिए एक प्रोग्राम इनपुट के रूप में कार्य करता है।

  आधुनिक विज्ञान मानव मस्तिष्क से तारों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणो के माध्यम से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।

परंतु हिंदू शास्त्रों में निहित ज्ञान के सामने यह प्रयास अत्यंत सीमित और निष्फल प्रतीत होता है।

जिस कार्य को महंगे उपकरण भी नहीं कर पाते, वह कार्य संस्कृत श्लोकों का सरल पाठ स्वाभाविक रूप से कर देता है।

संस्कृत श्लोकों का पाठ उस श्लोक को आपके मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर में एक इनपुट के रूप में प्रविष्ट कर देता है।

बार-बार किया गया पाठ मस्तिष्क को पुनः प्रोग्राम करता है।

याद रखें— जिस प्रकार आधुनिक रोबोटों को भी बार-बार समान प्रकार की छवियाँ दिखाकर ही “सिखाया” जाता है।

उसी प्रकार, मानव बुद्धि को भी एक ही संस्कृत मंत्र या स्तोत्र बार-बार प्रदान किया जाता है, जिस से मानव बुद्धि का शोधन और परिष्कार हो सके।

अशुभ ग्रहों के प्रभावों का शमन एवं निष्प्रभावीकरण

ग्रह शक्तियाँ मन और निर्णयों को कैसे प्रभावित करती हैं

पूर्व कर्म जीवन को 
ग्रह शक्तियों  के माध्यम से,
घटनाओं व दुर्घटनाओं द्वारा प्रभावित करता है।

ये ग्रह शक्तियाँ मानव मन— अर्थात मस्तिष्क रूपी कंप्यूटर पर अत्यंत सूक्ष्म परंतु गहरे प्रभाव डालती हैं।

ये ग्रह प्रभाव

• आपके चिंतन को आकार देते हैं
• भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को परिवर्तित करते हैं
• निर्णय-क्षमता को सुदृढ़ या दुर्बल बनाते हैं
• अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं

जब ये ब्रह्मांडीय शक्तियाँ संतुलित और अनुकूल होती हैं, तो जीवन सहज रूप से प्रवाहित होता है।

परंतु जब ये शक्तियाँ अशुभ या असंतुलित हो जाती हैं, तो जीवन में

• भ्रम
• बाधाएँ
• असफलताएँ
• मानसिक कष्ट
• दुःख उत्पन्न होने लगते हैं।

यह बात आपको आश्चर्यजनक या अविश्वसनीय लग सकती है

परंतु यह शास्त्रसम्मत और वैज्ञानिक रूप से 
६०० से अधिक प्राचीन हिंदू ग्रंथों पर आधारित गहन अनुसंधान के माध्यम से प्रमाणित है।

उमा कैलाश फाउंडेशन ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों में विस्तृत शोध कार्य किया है

• ग्रह शक्तियाँ मानव मन से कैसे अंतःक्रिया करती हैं
• सूक्ष्म दिव्य ऊर्जाएँ बुद्धि को कैसे प्रभावित करती हैं
• ये शक्तियाँ व्यवहार, भावनाओं, निर्णयों और भविष्य की घटनाओं को कैसे रूप देती हैं

आधुनिक विज्ञान भी अब पुष्टि करने लगा है

आज आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन धीरे-धीरे यह स्वीकार कर रहे हैं

• वैदिक संस्कृत मंत्रों और स्तोत्रों के पाठ का मस्तिष्क पर मापनीय प्रभाव होता है
• ब्रह्मांडीय ऊर्जाएँ जैविक और मानसिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती हैं
• वैदिक मंत्रों का मानव मस्तिष्क पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ता है

इन विषयों पर विश्वभर में उपलब्ध अनेक अध्ययन और संदर्भ ऑनलाइन खोजे जा सकते हैं।

संस्कृत मंत्र एवं स्तोत्र:
सबसे प्रभावशाली वैदिक उपचार


वैदिक परंपरा ग्रह असंतुलन के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली समाधान प्रदान करती है

विशिष्ट संस्कृत मंत्र और स्तोत्र वैदिक प्रार्थनाएँ
सामान्य प्रार्थनाएँ नहीं होतीं।


वे अत्यंत सटीक सूत्र होती हैं, जिन्हें इस उद्देश्य से रचा गया है कि

• अशुभ ग्रह प्रभावों को निष्प्रभावी किया जा सके
• शुभ ग्रह शक्तियों को सुदृढ़ किया जा सके
• मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन बढ़ाया जा सके
• निर्णय-क्षमता को सुधार किया जा सके
• प्रतिकूल ग्रहों से उत्पन्न कष्ट को कम किया जा सके
• बुद्धि और आंतरिक संतुलन को उन्नत किया जा सके

जब इन मंत्रों और स्तोत्रों का सही विधि, सही उच्चारण और सही निरंतरता के साथ अभ्यास किया जाता है, तो वे मानव जीवन की दिशा को गहराई से रूपांतरित करते हैं।

यह शोधों द्वारा और व्यक्तिगत अनुभवों द्वारा प्रमाणित हो चुका है

प्रतिकूल समय के
दुष्प्रभावों को क्षीण करना

वैदिक संस्कृत मंत्र साधनाओं के प्रयोग से किसी भी व्यक्ति के जीवन में आने वाले प्रतिकूल समय के अशुभ प्रभावों को अधिक सीमा तक कम किया जा सकता है।

 साधनाएँ

जिस प्रकार संस्कृत स्तोत्र प्रभावशाली होते हैं, उसी प्रकार वैदिक संस्कृत मंत्र जीवन की चुनौतियों को कम करने और जीवन-स्तर को उन्नत करने में और भी अधिक शक्तिशाली होते हैं।

स्तोत्र और मंत्र
दोनों के दो प्रमुख उद्देश्य होते हैं

१. मानव बुद्धि का शोधन एवं सुदृढ़ीकरण करना और
२. दिव्य सत्ता के साथ प्रत्यक्ष संबंध की स्थापना करना


साधनाएँ विशिष्ट वैदिक प्रक्रियाएँ हैं, जिन्हें जीवन के निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भगवान शिव द्वारा निर्मित किया गया था।

ये प्राचीन विधियाँ निम्नलिखित क्षेत्रों में सहायक होती हैं

• आर्थिक स्थिरता और धन-वृद्धि
• करियर, व्यवसाय और नौकरी के उच्च्तर अवसर
• शिक्षा और बौद्धिक विकास
• विवाह और संबंधों से जुड़ी समस्याएँ
• संतान अथवा पारिवारिक जीवन से संबंधित विषय
• प्रतिकूल समय को दृढ़ता और स्पष्टता के साथ पार करना
• सुख, समृद्धि और भावनात्मक कल्याण में वृद्धि
• उच्च ज्ञान और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि की प्राप्ति
• शत्रुओं, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों पर विजय

प्रामाणिक वैदिक साधनाओं के माध्यम से व्यक्ति जीवन के प्रत्येक आयाम में शक्तिशाली और सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

आपके भविष्य की गुणवत्ता का उन्नयन

जब उपर्युक्त उद्देश्य सफलतापूर्वक प्राप्त हो जाते हैं, तो एक उच्च्तर, उज्ज्वल और स्थिर भविष्य केवल संभव ही नहीं रहता— अपितु निश्चित हो जाता है।

शताब्दियों तक यह ज्ञान-परंपरा गुप्त रूप से साधित होती रही, सीमित लोगों तक ही पहुँची और प्रायः गलत समझी जाती रही।

इस भ्रांति का मुख्य कारण यह था कि लोगों को विविध वैदिक विज्ञानों का सम्पूर्ण और समग्र ज्ञान उपलब्ध नहीं था, जिससे भ्रम और भय उत्पन्न हुआ।

परंतु आज— आधुनिक विज्ञान की तीव्र प्रगति और वर्तमान जीवनशैली की सीमाओं एवं दुष्प्रभावों की बढ़ती समझ के साथ— यह स्पष्ट होता जा रहा है कि प्राचीन हिंदू विज्ञान एक कहीं अधिक उन्नत, समग्र और प्रभावी मार्ग प्रदान करते हैं, जो सुखी, समृद्ध और पूर्ण जीवन की ओर ले जाता है।

हजारों वर्षों से प्रभावी सिद्ध कालातीत ज्ञान

लाखों साधकों के अनुभव— और वैदिक साधनाओं के साथ मेरे स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव— निरंतर यह सिद्ध करते हैं कि ये विधियाँ मानव जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान में अत्यंत प्रभावी हैं।

ये प्राचीन भारतीय विज्ञान कोई क्षणिक सिद्धांत नहीं हैं। ये शाश्वत और सार्वभौमिक सिद्धांत हैं, जो प्रत्येक युग में मानव जीवन पर समान रूप से लागू होते हैं।

उन्नत प्राचीन सभ्यताओं के प्रमाण

सभ्यताएँ आईं और चली गईं, परंतु उनके प्रमाण आज भी विद्यमान हैं। 
जैसे कि

• मिस्र के पिरामिड
• अंगकोर वाट के विशाल मंदिर परिसर
• भारत भर में फैले विशालकाय हिंदू मंदिर

ऐसे मंदिर केवल व केवल वहाँ तक ही हैं जहां तक प्राचीन भारतीय सभ्यता ने विस्तार किया। ऐसा क्यूँ है? 

इन संरचनाओं का आकार, सटीकता और स्थान यह दर्शाते हैं कि अतीत में अत्यंत उन्नत विज्ञान और उच्च विकसित ज्ञान-प्रणालियाँ विद्यमान थीं— जिन्हें आधुनिक विज्ञान भी आज तक पूर्ण रूप से समझ नहीं पाया है।

आज की समस्त तकनीकी प्रगति के होने पर भी, आधुनिक इंजीनियरिंग भी स्पष्ट रूप से यह नहीं बता पाती कि इतनी विशाल संरचनाएँ इतनी परिपूर्णता के साथ कैसे निर्मित की गईं।

यह तथ्य इस सत्य को और सुदृढ़ करता है कि प्राचीन वैदिक ज्ञान-प्रणाली अत्यंत उन्नत थी, और उसके सिद्धांत मानव जीवन की गुणवत्ता को उन्नत करने की कुंजी रखते हैं— चाहे वह दूर अतीत हो, वर्तमान समय हो या दूरस्थ भविष्य।

इन का रहस्य मंत्र साधनाओं से
उत्पन्न शक्तियों मे छिपा है।
इन का रहस्य दिव्य शक्तियों से
प्राप्त ज्ञान में छिपा है।


और यह सब मंत्र साधनाओं द्वारा प्राप्त असीमित बौद्धिक क्षमताओं द्वारा
वर्तमान समय में भी प्राप्त किया जा सकता है।

व्रत व उपवास

प्राचीन हिंदू शास्त्रों में उपलब्ध शक्तिशाली प्रक्रियायें

  व्रत और उपवास प्राचीन हिंदू शास्त्रों में वर्णित
अत्यंत शक्तिशाली आध्यात्मिक प्रक्रियायें हैं।

जो लोग संस्कृत सीखना या जटिल वैदिक साधनाओं में प्रवेश करना नहीं चाहते, उनके लिए ये सरल भक्ति-आधारित अनुशासन एक सुलभ और प्रभावी विकल्प प्रदान करते हैं।

भविष्य पुराण में सैकड़ों व्रतों और उपवासों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है, और प्रत्येक व्रत विशिष्ट आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक लाभों के लिए निर्धारित किया गया है।

समस्त व्रत उपवास नहीं होते
एक सामान्य भ्रांति


अधिकांश व्यक्ति यह समझते हैं कि हर व्रत में उपवास करना ही होता है।
यह धारणा गलत है।

• व्रत का अर्थ है— संकल्प, प्रतिज्ञा या किसी विशेष सिद्धांत अथवा आचरण का दृढ़ निश्चय
• उपवास का अर्थ है— भोजन से कुछ समय की निवृत्ति अथवा उपवास

कुछ व्रतों में उपवास सम्मिलित हो सकता है,
परंतु अधिकांश व्रत संकल्प होते हैं, उपवास नहीं।

उदाहरण के लिये श्री सत्यनारायण व्रत कथा वास्तव में 

• सत्य बोलने का
• सत्यपूर्ण जीवन जीने का
• कठिन परिस्थितियों में भी सत्य के साथ खड़े रहने का


एक संकल्प है।

न कि केवल एक दिन का उपवास

परंतु आज अनेक परिवारों में इस व्रत का वास्तविक अर्थ लुप्त हो चुका है।

लोग केवल उपवास करने या यांत्रिक रूप से कथा पढ़ने तक सीमित रह जाते हैं

और उसके बाद दैनिक जीवन में असत्य और छल को यथावत जारी रखते हैं।

जब किसी व्रत का तत्व भुला दिया जाता है, तो वह व्रत केवल एक कर्मकांड बन जाता है जो निष्फल होता है और अंततः व्यक्ति की आस्था को क्षीण कर देता है।

आज भी व्रत और उपवास क्यों महत्वपूर्ण हैं

व्रत और उपवास

• अनुशासन को सुदृढ़ करते हैं
• मन की शुद्धि करते हैं
• नकारात्मकता को कम करते हैं
• भक्ति को गहन बनाते हैं 
• आध्यात्मिक प्रगति में सहायक होते हैं
• ध्यान, मंत्र और अन्य वैदिक साधनाओं को पूरक रूप से समर्थ बनाते हैं
• मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं
• पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करते हैं

ये प्रक्रियायें आज भी सनातन धर्म के भीतर एक सरल, सुलभ और प्रभावी मार्ग खोजने वाले प्रत्येक साधक के लिए अत्यंत शक्तिशाली उपकरण बनी हुई हैं।

गुरु दीक्षा लेने पर महत्वपूर्ण व्रत व उपवासों का निरुपण उपल्ब्ध कराया जायेगा।

आवश्यक वार्षिक प्राक्रियायें

सर्वांगीण विकास एवं भौतिक समृद्धि के लिए

 यद्यपि स्तोत्र-पाठ और दैनिक ध्यान प्रतिदिन की साधना की आधारशिला हैं, सनातन धर्म कुछ ऐसी अत्यंत शक्तिशाली वार्षिक साधनाओं का भी निर्देश देता है, जिन्हें वर्ष में केवल एक बार विशिष्ट मुहूर्तों या शुभ कालों में किया जाता है।

यह वार्षिक प्रक्रियायें निम्न क्षेत्रों में विशेष रूप से सहायक होती हैं—

• सर्वांगीण समृद्धि
• मानसिक एवं भावनात्मक कल्याण
• आध्यात्मिक उन्नति
• नकारात्मक शक्तियों और प्रभावों से संरक्षण
• व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में सफलता

प्रभावी परिणामों के लिए आवश्यक 

वार्षिक साधनाएँ करने से पूर्व यह अत्यंत आवश्यक है कि इस पृष्ठ पर पहले वर्णित मूल आधारशिलाएँ स्थापित हों—

• आचरण-शुद्धि व पवित्रता (आचरण का शोधन)
• सच्ची भक्ति का विकास
• गहन श्रद्धा का निर्माण
• यम और नियम का पालन
• सात्त्विक जीवनशैली
• दैनिक ध्यान और मंत्र-जप का अभ्यास

इन आधारभूत शिलाओं के बिना वार्षिक साधनाओं का प्रभाव सीमित या आंशिक ही रह जाता है।

जैसे-जैसे आप इस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं और प्रारंभिक साधनाओं के अद्भुत प्रभावों को अपने जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, वैसे-वैसे भक्ति और श्रद्धा स्वाभाविक रूप से विकसित होने लगती हैं।

इसके लिए किसी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। जब ये पूर्व आवश्यकतायें पूर्ण हो जाती हैं, तब वार्षिक साधनाओं का प्रभाव वास्तव में रूपांतरणकारी हो जाता है।

नवरात्रों में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ

एक सर्वोच्च वैदिक साधना
श्री दुर्गा सप्तशती, जिसे चंडी पाठ भी कहा जाता है, वैदिक परंपरा के सबसे शक्तिशाली और पवित्र ग्रंथों में से एक है।

 मार्कण्डेय पुराण से उद्धृत, यह ग्रंथ 13 अध्यायों में विभक्त 700 रूपांतरणकारी श्लोकों से युक्त है और माता दुर्गा की दिव्य कृपा को आवाहित करने के लिए अत्यंत पूजनीय माना जाता है।

जो साधक श्रद्धा और अनुशासन के साथ श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, उन्हें—

• सर्वांगीण आशीर्वाद
• सर्वांगीण संरक्षण
• समृद्धि
• आंतरिक शक्ति
• तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

पूर्ण प्रभाव के लिए केवल संस्कृत भाषा में पाठ

श्री दुर्गा सप्तशती का वांछित फल प्राप्त करने के लिए इसका पाठ केवल संस्कृत में ही किया जाना आवश्यक है।

हिंदी या अन्य भाषाओं में किए गए अनुवाद मूल दिव्य शक्ति को वहन नहीं करते, अतः वे समान आध्यात्मिक परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकते।

शास्त्रानुसार न्यास, नार्वाण मंत्र जप, तथा अन्य कई विशिष्ट मंत्र-जप निर्धारित स्थानों पर अवश्य किए जाने चाहिए।

श्री दुर्गा सप्तशती के सही और विधिपूर्वक पाठ की चरणबद्ध मार्गदर्शिका के लिए डाउनलोड्स पृष्ठ पर जाएँ।

पाठ के लिए सर्वाधिक शुभ काल

यद्यपि श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ वर्ष के किसी भी समय शुभ मुहूर्त से प्रारंभ किया जा सकता है, परंतु विशेष रूप से निम्न कालों में इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है—

• चैत्र नवरात्रि
• शारदीय नवरात्रि
• दोनों गुप्त नवरात्रियाँ
• अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशी तिथियाँ

इन कालों में दिव्य ऊर्जा अत्यंत प्रबल होती है, जिससे साधना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

अवधि और विधि पूर्ण पाठ में समय लगता है, इसलिए अनेक साधक नवरात्रि के दौरान इसे सात दिनों में विभाजित करके करते हैं।

हालाँकि, इसे एक ही दिन में भी पूर्ण किया जा सकता है।

जो साधक संस्कृत पाठ में निपुण होते हैं, उनके लिए पूर्ण पाठ में लगभग 4.5 घंटे का समय लगता है।

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ पर
और जानकारी

पाठ की उन्नत विधियाँ:
शत् चंडी पाठ एवं
तंत्रोक्त श्री दुर्गा सप्तशती

 यह ग्रंथ इतना शक्तिशाली है कि समष्टिगत और अत्यधिक प्रभाव के लिए इसके कुछ उन्नत रूपों का अभ्यास भी शास्त्रों में बताया गया है

• शत् चंडी पाठ
101 आचार्यों द्वारा 101 बार सामूहिक पाठ— समाज और राष्ट्र के कल्याण हेतु किया जाता है।
• अनुलोम–विलोम पाठ सीधा एवं उल्टा (क्रम और विपरीत क्रम) पाठ
एक विशेष प्रकार की विधि, जो विशिष्ट परिस्थितियों में अपनाई जाती है।
• तंत्रोक्त सप्तशती जिसमें प्रत्येक श्लोक विशिष्ट विनियोग और न्यास के साथ 1000 बार जपा जाता है।

ये सभी साधनाएँ अत्यंत कठोर अनुशासन की मांग करती हैं और असाधारण रूप से प्रभावशाली मानी जाती हैं।

नकारात्मक ऊर्जाओं का शोधन

भूत-प्रेत बाधित स्थान एवं आसुरी शक्तियाँ


श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का एक कम ज्ञात, परंतु अत्यंत शक्तिशाली लाभ यह भी है कि यह स्थान-शुद्धि करता है और नकारात्मक शक्तियों को विघटित एवं नष्ट कर देता है।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ
विश्व के किसी भी स्थान पर प्रभावी है।


किसी एक स्थान पर नियमित पाठ करने से

• नकारात्मक आत्माओं से वातावरण शुद्ध होता है
• भूतबाधित अथवा अशांत ऊर्जाएँ समाप्त होती हैं
• दैत्य एवं समान नकारात्मक शक्तियाँ दूर चली जाती हैं
• माता दुर्गा की शक्तिशाली दिव्य सुरक्षा स्थापित होती है

यहाँ तक कि इस ग्रंथ के एक अंश— देवी कवच— को कंठस्थ कर नियमित जप करने मात्र से एक अत्यंत शक्तिशाली रक्षा-कवच निर्मित हो जाता है।

इस ग्रंथ के अन्य भी ऐसे अंश हैं जो अकेले ही असाधारण रूप से प्रभावी हैं। ऐसी नकारात्मक शक्तियाँ उस व्यक्ति से स्वाभाविक रूप से दूरी बनाए रखती हैं जिसने देवी कवच को कंठस्थ कर लिया हो।

वास्तव में समस्त वैदिक विधियाँ विश्व में किसी भी स्थान पर करी जायं। यह समस्त स्थानों पर पूर्ण रूप से प्रभावशाली हैं।

सैकड़ों ही नहीं सहस्त्रों
वैदिक साधनाएँ उपलब्ध हैं।

हम यहाँ पर कुछ ही बता रहे हैं।

गुरु दीक्षा लेने पर आपको अनेक अतिरिक्त वैदिक साधनाओं से परिचित कराया जाएगा।

इसके उपरांत आप स्वयं यह चुन सकेंगे कि आपके लिए कौन-सी साधना उपयुक्त है।

गुरु दीक्षा ग्रहण करते ही आप स्वतः ही एक मासिक ऑनलाइन पत्रिका के लिए पंजीकृत हो जाते हैं।

इस पत्रिका के माध्यम से आपको

• अनेक नई वैदिक साधनाओं का परिचय मिलेगा
• लघु एवं दीर्घ—दोनों प्रकार की साधनाएँ बताई जाएँगी
• प्रत्येक साधना अत्यंत शक्तिशाली होगी
• साथ ही सनातन धर्म की विविध साधनाओं और सिद्धांतों से संबंधित गहन और प्रामाणिक ज्ञान भी प्रदान किया जाएगा

इस प्रकार, गुरु दीक्षा आपके लिए सनातन धर्म की विस्तृत और सुव्यवस्थित साधना-परंपरा के द्वार खोल देती है।

दीपावली पूजन की विस्तृत प्रणाली

शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन से लेकर दीपावली की अमावस्या तक का काल देवी–देवताओं को समर्पित सभी प्रकार की पूजाओं, अनुष्ठानों और वैदिक साधनाओं के लिए वर्ष का सबसे शक्तिशाली और शुभ समय माना गया है।

यह पावन काल वर्ष में केवल एक बार आता है और आध्यात्मिक उन्नति तथा सर्वांगीण समृद्धि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

सर्वांगीण विकास और दिव्य कृपा के लिए इस शुभ अवधि में— विशेष रूप से धनतेरस से दीपावली तक के तीन दिनों में— निम्नलिखित वार्षिक पूजाओं का संपादन अत्यंत लाभकारी माना गया है

• कलश स्थापना
• गौरी–गणेश पूजन
• नवग्रह पूजन
• मातृका पूजन
• महालक्ष्मी पूजन

इन पूजाओं से जीवन में

• समृद्धि
• स्थिरता
• संरक्षण
• तथा देवी–देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

इन सभी पूजाओं की पूर्ण एवं चरणबद्ध पूजन-विधि इस वेबसाइट पर निःशुल्क डाउनलोड के लिए उपलब्ध है।

डाउनलोड्स पृष्ठ पर जाएँ।

महा शिवरात्री पर
शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी का पाठ तथा रुद्राभिषेक

 भगवान शिव की सर्वांगीण कृपा प्राप्त करने हेतु महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी का पाठ अत्यंत अनुशंसित माना गया है।

यह पवित्र ग्रंथ वेदों के कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंत्रों को समाहित करता है और इसे भगवान शिव को अर्पित की जाने वाली सबसे शक्तिशाली वैदिक उपासनाओं में से एक माना जाता है।

रुद्राष्टाध्यायी पाठ में क्या-क्या सम्मिलित होता है?

 पूर्ण विधि में निम्नलिखित क्रम सम्मिलित है

• शिव पूजन विधि
• स्वस्तिवाचन
• संकल्प
• गणेश एवं अम्बिका पूजन
• महाभिषेक
• षडंग न्यास
• रुद्राष्टाध्यायी के आठ अध्यायों का पाठ
• शान्त्यध्याय
• स्वस्ति प्रार्थना

यह संपूर्ण संरचना अत्यंत शुद्धिकरणकारी, आध्यात्मिक रूप से उन्नत करने वाली और भगवान शिव के साथ प्रत्यक्ष दिव्य संपर्क प्रदान करने वाली मानी जाती है।

महाशिवरात्रि पर अनुशंसित अतिरिक्त अनुष्ठान पाठ और अभिषेक के उपरांत भक्त निम्नलिखित अनुष्ठान भी कर सकते हैं

• रुद्र यज्ञ •
महा रुद्र यज्ञ
• शिव सहस्रनाम स्वाहाकार (हवन अथवा होम)

ये अनुष्ठान भगवान शिव की कृपा को और अधिक प्रबल करते हैं तथा साधक और दिव्यता के बीच एक गहन आध्यात्मिक संबंध स्थापित करते हैं।

समय एवं तैयारी

चूँकि इन सभी साधनाओं में लगभग पूरा दिन लग जाता है, अतः पूर्ण विधि को उचित रूप से संपन्न करने के लिए प्रातःकाल शीघ्र आरंभ करना आवश्यक है।

अभिषेक एवं पूजन के लिए निम्न में से किसी एक का प्रयोग किया जा सकता है

• पारद शिवलिंग, या
• बाणलिंग

जहाँ-जहाँ शास्त्रों में निर्देशित हो, वहाँ शुद्ध गौ-दुग्ध का ही प्रयोग करें— जैसा कि पारंपरिक वैदिक विधानों में निर्दिष्ट है।

पारद शिवलिंग साधना

श्रावण मास के समयकाल में पारद शिवलिंग साधना भगवान शिव को समर्पित शक्तिशाली आध्यात्मिक साधनाओं में से एक मानी जाती है।

श्रावण (सावन) मास के पावन चारों सोमवारों को यह साधना की जाती है। यह साधना भगवान शिव के भक्तों के लिए दिव्य कृपा, संरक्षण, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखने वालों हेतु अत्यंत अनुशंसित मानी जाती है।

श्रावण मास जैसे अत्यधिक आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण समय में प्रत्येक सोमवार यह साधना लगभग डेढ़ घंटे में संपन्न होती है और इसे अत्यंत शुभ माना गया है।

पारद शिवलिंग पर साधना पारद शिवलिंग पारे (Mercury) से निर्मित होता है।

प्राचीन ग्रंथों में इसे बनाने की स्पष्ट विधियाँ उपलब्ध हैं। अनेक लोग यह सोचकर आश्चर्य करते हैं कि पारे का तरल धातु होने पर भी पारा ठोस कैसे बन सकता है।

हाँ—यह पूर्णतः संभव है।

पारे में धीरे-धीरे ताँबे का अमलगम (मिश्रण) किया जाता है, जिससे पारा क्रमशः ठोस होने लगता है। यह एक विशेष प्रक्रिया है और अत्यधिक कठिन भी नहीं है।

उत्तम पारद शिवलिंग में स्वर्ण (सोना) भी अमलगम के रूप में सम्मिलित किया जाता है।

पारा पहले अर्द्ध-ठोस अवस्था में आता है, फिर उसे इच्छित आकार में ढाला जाता है। कुछ समय पश्चात वह उसी आकार में पूर्णतः ठोस हो जाता है। 

सावधान रहें— कुछ असामाजिक तत्व सीसे (Lead) से बने शिवलिंग को पारद शिवलिंग बताकर बेचते हैं।

पारद शिवलिंग साधना का महत्व

यह साधना पारद शिवलिंग पर की जाती है, जो आज के समय में ऑनलाइन अथवा स्थानीय आध्यात्मिक दुकानों से सहज रूप से प्राप्त किया जा सकता है।

एक पारद शिवलिंग

• उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है
• भगवान शिव की कृपा को आकर्षित करता है
• वातावरण को शुद्ध करता है
• मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है

महादेव के भक्तों के लिए श्रावण मास में इस साधना का संपादन अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य माना गया है।

वर्तमान समय में हिन्दु समाज सनातन धर्म के विषय ज्ञान से पूर्ण रूप से भटक चुका है।

हिंदू समाज आज एक अधर स्थिति में लटका हुआ है

उसे यह स्पष्ट नहीं है कि क्या किया जाए और कहाँ से आरंभ किया जाए।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक साधनाओं के विषय में समुचित और व्यवस्थित जानकारी कहीं भी सहज रूप से उपलब्ध नहीं है।

जो जानकारी उपलब्ध है, वह भी खंडित, अपूर्ण और बिखरी हुई अवस्था में है।

जो लोग वास्तव में सनातन धर्म को समझना और अपनाना चाहते हैं, वे यह तय नहीं कर पाते कि आरंभ कहाँ से करें, क्योंकि शास्त्रों की संख्या अत्यंत विशाल है और कोई स्पष्ट, क्रमबद्ध मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं है।

यह वेबसाइट आपको सनातन धर्म का
एक संपूर्ण, समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
प्रस्तुत करती है


सबसे मूल सिद्धांतों से लेकर सबसे उन्नत साधनाओं तक।

यह पृष्ठ सनातन धर्म की साधनाओं के पूर्ण मार्ग को स्पष्ट करता है

वह शाश्वत व्यवस्था जो जीवन के प्रत्येक आयाम को रूपांतरित करती है।

कुछ लोगों को केवल भाग्यवश धन या दीर्घायु मिल सकती है, परंतु

• वृद्धावस्था
• कष्ट
• तथा अनपेक्षित चुनौतियों से कोई भी बच नहीं सकता।

कठिन समय आने की प्रतीक्षा करना अप्रभावी है। या यह सोचना कि हमारे जीवन मे प्रतिकूल समय नहीं आयेगा, व्यर्थ है। इस पृथ्वि पर कोई ऐसा मनुष्य नहीं जिस के जीवन मे कठिन समय न आया हो।

आध्यात्मिक प्रगति का आरंभ समय रहते होना चाहिए, चाहे आप किसी भी आय-वर्ग में क्यों न हों।

आप यह कभी नहीं जानते कि कल क्या होने वाला है। परंतु यदि आप जीवनशैली में परिवर्तन करें और साधनाओं का अभ्यास प्रारंभ करें, तो आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि भविष्य में परिस्थितियाँ कैसी भी हों, आपकी स्थिति स्थिर और संतुलित बनी रहे।

इस मार्ग पर 25 वर्ष, या फिर 35 अथवा 40 वर्ष की आयु में आरंभ करना भी दीर्घकालिक रूप से अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।

परंतु वृद्धावस्था में इस मार्ग पर चलना प्रारंभ करना पूर्णतया लाभकारी नहीं। 

जैसा कि आप इस वेबसाइट से भली-भाँति समझ पाएँगे। कुछ महत्वपूर्ण जीवनशैलीगत परिवर्तन अनिवार्य हैं। इनके बिना सभी वैदिक साधनाएँ अप्रभावी हो जाती हैं। वृद्धावस्था में जीवनशैली बदलने का कोई विशेष लाभ नहीं होता, क्योंकि तब तक

• पाप कर्म
• कर्म-संचय
• और आत्मा पर पड़े प्रभाव पहले ही अत्यधिक संचित हो चुके होते हैं, और स्वयं का शोधन लगभग असंभव हो जाता है।

जीवन का मूल्यांकन समग्र दृष्टि से किया जाना चाहिए,
न कि तात्कालिक उपायों और अल्पदृष्टि निर्णयों के आधार पर।


वास्तविक प्रगति तभी स्पष्ट होती है जब आप

• पिछले 5–10 वर्षों की आर्थिक स्थिति
• संबंधों की गुणवत्ता
• मानसिक, भावनात्मक और समग्र कल्याण का निष्पक्ष मूल्यांकन करते हैं— और यह देखते हैं कि किन क्षेत्रों में प्रगति हुई है और किन क्षेत्रों में समस्याएँ बढ़ी हैं।

सजगता और अनुशासन के साथ इस मार्ग का अनुसरण करें, और एक ऐसा सशक्त आधार निर्मित करें जो आपको

• समृद्ध
• अर्थपूर्ण
• स्थिर • और पूर्ण जीवन

की ओर निश्चित रूप से अग्रसर करे।

Step 5
Higher Vedic Practices
पाँचवां पग
उच्च्तर वैदिक प्रक्रियायें

जीवन में सर्वांगीण सामंजस्य के लिए

आज एक ऐसी संस्कृति विकसित हो गई है जिसमें किसी भी कार्य को तब ही मूल्यवान माना जाता है जब वह सीधे अधिक धन कमाने का माध्यम बने।

यह मानसिकता इसलिए बनी है क्योंकि यह सामान्य रूप से मान लिया गया है कि समय केवल उन्हीं कार्यों में समय लगाया जाना चाहिए जो धन उत्पन्न करें।

परोपकारी कार्य या दूसरों के कल्याण से जुड़े कर्म अधिकांशतः स्वार्थपूर्ण, कानूनी, या औपचारिक उद्देश्यों से किए जाते हैं— न कि दूसरों के प्रति विकसित संवेदना या गहरी सामाजिक जिम्मेदारी की भावना से।

सनातन धर्म का मार्ग कोई तात्कालिक कोर्स नहीं है सनातन धर्म का मार्ग कोई सीमित अवधि का पाठ्यक्रम नहीं है।

यह एक क्रमिक और चरणबद्ध यात्रा है। आपको—

• एक-एक कदम आगे बढ़ना होता है
• प्रत्येक चरण के परिणामों को देखना होता है
• उन प्रक्रियाओं को निरंतर अपनाना होता है

यह सोचकर नहीं चलना चाहिए कि छह महीने या एक वर्ष में आप आर्थिक रूप से अत्यंत ऊँचे स्तर पर पहुँच जाएँगे।

हाँ, यह सत्य है कि कुछ साधनाएँ आर्थिक स्थिरता और सामर्थ्य अवश्य प्रदान करती हैं। परंतु पिछले चरणों में बताए गए सिद्धांत स्वयं में अत्यंत शक्तिशाली हैं और समय के साथ निश्चित रूप से सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।

कुछ लोगों को शीघ्र परिणाम मिल सकते हैं, कुछ को देर से— यह स्वाभाविक है।

मुख्य कुंजी: निरंतरता और गहन चिंतन

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परिणामों की गति की परवाह किए बिना निरंतर आगे बढ़ते रहना।

• अपनी साधना को सुधारते रहना
• अपनी विधियों को परिष्कृत करना
• अपने उठाए गए कदमों पर गहराई से चिंतन करना

यही वास्तविक प्रगति का मार्ग है।

उन्नत साधनाएँ

केवल शुद्ध भक्ति से उन्नत साधनाएँ से की जाती हैं— न कि दिखावे के लिए, या यह प्रदर्शित करने के लिए कि आप कितना जानते हैं।

इन साधनाओं को—

• निजी रूप से
• परिवार के साथ
• शांत वातावरण में करना चाहिए— न कि लाउडस्पीकर लगाकर या बड़े समारोह आयोजित करके।

कुछ साधनाएँ बड़े आयोजनों में भी की जाती हैं, परंतु—

• वे राजाओं, शासकों या शासन-प्रणालियों के लिए होती हैं
• या फिर समाज के सामूहिक कल्याण हेतु न कि व्यक्तिगत प्रदर्शन के लिए।

सनातन धर्म का मार्ग आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है— दिखावे का नहीं।

उच्च्तर वैदिक प्रक्रियायें
यंत्रों को समझें १

उन्नत वैदिक साधनाओं के लिए समय और कुछ धन—दोनों का निवेश आवश्यक होता है।

 दैनिक अथवा उच्चतम् वैदिक प्रक्रियाओं को कभी भी जल्दबाज़ी में हड़बड़ाहट में नहीं करना चाहिए। इसके लिए संस्कृत भाषा के पठन में एक निश्चित स्तर की प्रवाहशीलता और समझ आवश्यक होती है।

कुछ साधनाएँ कुछ दिनों या कई सप्ताहों में क्रमशः संपन्न की जाती हैं।

यंत्र का विज्ञान समझना

शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि—
मंत्र, यंत्र और देवता—
इन तीनों में कोई भेद नहीं है।

यह तथ्य आपके मन में गहराई से स्थापित होना चाहिए। जिस यंत्र को आप अपने घर में स्थापित करते हैं, वह उसी प्रकार है जैसे उस देवता का स्वयं आपके घर में निवास करना।

अतः

• यंत्र बनाते समय
• यंत्र को अंकित (Etching) करते समय
• साधना के दौरान
• तथा यंत्र की स्थापना के बाद (मंदिर, घर या कार्यालय में) यंत्र को पूर्ण सम्मान दिया जाना अनिवार्य है।

इस सम्मान में सम्मिलित है

• यंत्र की नियमित स्वच्छता
• धूप–दीप द्वारा पूजन
• पुष्प अर्पण
• तथा अन्य निर्धारित उपासना-विधियाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यंत्र का सम्मान कभी भी कम नहीं होना चाहिए।

यंत्र = देवता का मंदिर यंत्र किसी विशिष्ट देवता का मंदिर स्थापित करने के समान होता है। अधिकांश देवता अन्य सहायक देवताओं के साथ अस्तित्व में रहते हैं। जब आप अपने घर या कार्य-स्थल पर किसी यंत्र की स्थापना करते हैं, तो वह

• उस विशिष्ट देवी या देवता की स्थापना होती है
• तथा उनके साथ संबंधित सभी देवताओं की भी इस क्षण के बाद वह देवता आपके घर या कार्य-स्थल में निवास करने लगते हैं और अपनी कृपा प्रदान करते हैं।

परंतु यदि

• यंत्र की उपेक्षा की जाए
• उसका सम्मान न किया जाए

तो यह संभव है कि स्थापित देवता उस स्थान को त्याग दें।

प्राचीन मंदिर और यंत्र विज्ञान यदि आप प्राचीन हिंदू मंदिरों की वास्तुकला का अध्ययन करें, तो पाएँगे कि लगभग सम्स्त प्राचीन मंदिरों की संरचना यंत्र के स्वरूप में की गई है।

उदाहरण के लिए

• थाईलैंड का प्रसिद्ध अंगकोर वाट मंदिर
• इंडोनेशिया का बोरोबुदुर मंदिर
• भारत के लगभग सभी प्राचीन मंदिर इन सभी का आकृतिक विन्यास किसी न किसी विशिष्ट देवता के यंत्र पर आधारित है।


यह समस्त देश एक समय भारत के ही अंग थे।
यंत्र का केंद्र हमेशा मुख्य देवता का स्थान होता है, और अन्य देवता यंत्र के भीतर और बाहर निर्धारित स्थानों पर स्थित होते हैं।

प्रत्येक देवता का अपना विशिष्ट यंत्र

हर देवी–देवता का अपना एक विशिष्ट यंत्र होता है। इन यंत्रों की रचना शास्त्रों में संस्कृत श्लोकों के रूप में स्पष्ट रूप से वर्णित है।

अतः

• कोई भी व्यक्ति अपनी कल्पना से यंत्र नहीं बना सकता
• स्वयं डिजाइन किए गए यंत्र शास्त्रसम्मत नहीं होते कुछ लोगों द्वारा मनमाने ढंग से यंत्र बनाने और प्रचारित करने की प्रवृत्ति पूर्णतः गलत है।

यंत्र—शास्त्र से जन्मा विज्ञान है, कल्पना से नहीं।

उच्च्तर वैदिक प्रक्रियायें
यंत्रों को समझें २

बाज़ार में उपलब्ध प्लास्टिक, पीतल या अन्य अपवित्र पदार्थों से बने यंत्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यंत्र के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की शुद्धता सर्वप्रथम और सर्वोच्च विचारणीय विषय है।

यंत्र

• किस प्रकार अंकित किया जाए
• किन पदार्थों पर बनाया जाए
• किस माध्यम या स्याही का प्रयोग हो
• कौन-सी धातु या सामग्री उपयुक्त है

इन सभी विषयों की सटीक, शास्त्रसम्मत जानकारी गुरु दीक्षा मैनुअल में विस्तारपूर्वक प्रदान की जाएगी।

यंत्र निर्माण में अनुशासन और सौंदर्य मैंने बौद्ध भिक्षुओं को मंडल बनाते हुए देखा है जो मूलतः यंत्र ही होते हैं। वे

• यंत्र को अत्यंत सौंदर्यपूर्ण बनाने में
• रंगों के चयन में
• अनुपात और सटीकता में अत्यधिक परिश्रम करते हैं।

यह दर्शाता है कि यंत्र केवल एक आकृति नहीं, अपितु एक जीवंत दिव्य संरचना है जिसमें पूर्ण एकाग्रता, श्रद्धा और अनुशासन आवश्यक है।

यंत्र किन पदार्थों पर बनाए जा सकते हैं

यंत्रों को निम्न शुद्ध पदार्थों पर उकेरा (Etched / Engraved) या अंकित किया जा सकता है

• पत्थर
• स्फटिक (स्फटिक शिला)
• ताँबा
• चाँदी
• सोना

प्लास्टिक, लकड़ी या अन्य कृत्रिम पदार्थ यंत्र निर्माण के लिए अनुशंसित नहीं हैं।
प्राचीन मंदिर: यंत्र विज्ञान का जीवंत उदाहरण प्राचीन काल में यंत्र को आधार बनाकर निर्मित मंदिर


• केवल पत्थर से बनाए जाते थे
• उनमें गारे (मोर्टार) का प्रयोग बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता था

भारत के सभी प्राचीन मंदिर उत्कृष्ट शिल्पकला, रचनात्मकता और पत्थर-जोड़ तकनीक (Stone Interlocking Techniques) के अद्भुत उदाहरण हैं।

यह मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण हैं कि यंत्र विज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं, अपितु उच्च स्तरीय वैज्ञानिक और स्थापत्य ज्ञान पर आधारित था।

अधिक विवरण

यंत्र

• लिखने
• अंकित करने
• उकेरने
• स्थापना करने से

संबंधित और भी अनेक महत्वपूर्ण एवं सूक्ष्म विवरण दीक्षा मैनुअल में प्रदान किए जाएँगे।

यंत्र कोई सजावटी वस्तु नहीं है वह देवता की सजीव स्थापना है।

उच्चतर वैदिक प्रक्रियाओं में
देवी देवता

नीचे मैं कुछ देवी–देवताओं के लिए की जाने वाली उन्नत वैदिक साधनाओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

श्री गणपति

जीवन में बाधाओं का निवारण

आपने यह अवश्य अनुभव किया होगा कि साधारण व्यक्ति के जीवन में— सम्पूर्ण धन-संपत्ति होने के उपरांत भी— अनेक छोटी-छोटी अथवा कभी-कभी बड़ी बाधाएँ बार-बार उत्पन्न होती रहती हैं।

ये बाधाएँ जीवन की स्वाभाविक गति को बाधित करती हैं और व्यक्ति जीवन को सहज एवं सुचारु रूप से जी नहीं पाता।

प्राचीन काल से ही भारतवर्ष अत्यंत गहन आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। आध्यात्मिक बल और भौतिक समृद्धि— दोनों की प्राप्ति के लिए हमारे प्राचीन शास्त्रों ने अनेक प्रभावशाली उपाय बताए हैं।

प्रत्येक देवी–देवता अपने-अपने विशिष्ट अधिकार और शक्ति से युक्त होते हैं। इन सभी में एक अत्यंत विशिष्ट और विलक्षण देवता हैं— श्री गणपति।

भारत में श्री गणपति की उपासना अत्यंत प्राचीन काल से होती चली आ रही है, क्योंकि पाँच आगमों की परंपरा में—

• शिव
• विष्णु
• सूर्य
• शक्ति
• और गणपति

इन पाँचों को प्रधान साधना-देवता माना गया है।

इनमें श्री गणपति का महत्व अत्यंत विशिष्ट और सर्वप्रथम है।

किसी भी देवी-देवता की उपासना का आरंभ हो, किसी भी शुभ अनुष्ठान के प्रारम्भ हो, या फिर किसी भी लौकिक अथवा अलौकिक कार्य का प्रारंभ— सबसे पहले श्री गणपति का पूजन अनिवार्य माना गया है।

उनकी उपासना और आवाहन के बिना कार्य में बार-बार विघ्न उत्पन्न हो सकते हैं। शास्त्रों में यह भी स्पष्ट कहा गया है कि श्री गणपति की उपासना जीवन के प्रत्येक चरण में आने वाली विविध बाधाओं को दूर करती है। इस विशेष पूजन में आपके घर अथवा कार्य-स्थल पर श्री गणपति यंत्र की स्थापना की जाती है।

यह साधना पूर्व जन्मों एवं वर्तमान जीवन में किए गए पाप कर्मों के कारण उत्पन्न अनेक प्रकार की बाधाओं को दूर करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। यह विशेष रूप से अनुशंसित है कि— अन्य उन्नत वैदिक साधनाएँ आरंभ करने से पूर्व यदि आपके घर में श्री गणपति की स्थापना हो, तो आगे की सभी साधनाएँ निरविघ्न और सफल रूप से संपन्न होती हैं।

श्रीविद्या

मानव जीवन में धन की स्थिरता अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

सनातन धर्म का जो आज स्वरूप बन गया है उस में यह माना जाने लगा है कि गरीब रहना ही अच्छा है।

यह केवल सनातन धर्म में चलचित्रों मूवीज़ के द्वारा बनाई गई गलत धारणा है।
 
सनातन धर्म में व्यवसाय यानि आपके धन उपार्जन को अति महत्वपूर्ण माना गया है। इसी कारण भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में व्यावसात्मिक बुद्धिमता का विस्तार से विवरण किया है।

जीवन में धन की स्थिरता अति महत्वपूर्ण है। और इस के लिये सनातन मार्ग में धन की स्थिरता के लिये अनेक साधनायें बताई गई हैं।

यह भी महत्वपूर्ण है कि धन की स्थिरता के लिये आपका आचरण शुद्ध हो व मन में एकाग्रता हो। केवल धन के पीछे भागने से धन की स्थिरता नही आती।

इस कारण अब से पहले बताये गये समस्त पग महत्वपूर्ण ही नहीं अनिवार्य हैं।

श्रीविद्या सपर्या पद्धति में कहा गया है

“जब इस ज्ञान की प्राप्ति के साधनों की जाँच की जाती है, तब छांदोग्य आदि उपनिषद उद्गीथ-विद्या, प्राण-विद्या, अग्निहोत्र-संबंधी ज्ञान, दहर-विद्या तथा पंचाग्नि-विद्या जैसी अनेक प्रारंभिक साधनाओं का उपदेश करते हैं— जिन्हें ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए आवश्यक पूर्व-शर्तों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।”

“इन्हीं विषयों का आगे विस्तार ब्रह्मसूत्रों तथा उनके भाष्यों में किया गया है।”

परंतु प्रश्न यह है कि— आज के समय में इस ज्ञान का योग्य आचार्य कौन है? अनेक वर्षों तक शास्त्रों के उस विशाल और गहन वन का अध्ययन करने के बाद भी इस संसार में ऐसा कौन है जो निःसंकोच यह कह सके— “जो प्राप्त करना था, वह मैंने प्राप्त कर लिया,” “जो जानना था, वह मैंने जान लिया।”

क्योंकि सत्य अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ है— “शास्त्रों का अध्ययन एक विषय है, और प्रत्यक्ष अनुभूति सर्वथा भिन्न विषय है।”

वेदांत के अनेक उपदेशक अवश्य हैं, परंतु वास्तविक अनुभूति से युक्त आचार्य अत्यंत दुर्लभ हैं। और जिसने स्वयं सत्य का अनुभव नहीं किया— वह दूसरों को उस अनुभव तक कैसे पहुँचा सकता है?

तो क्या ब्रह्म-ज्ञान की ऐसी कोई सरल विधि है जो प्रत्यक्ष अनुभूति में परिणत होती हो?

हाँ—ऐसी विधि निश्चय ही है। निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि श्रीविद्या ही ब्रह्मविद्या है।

आज भी ऐसे महान आचार्य विद्यमान हैं जिन्होंने स्वयं परम सत्य का साक्षात्कार किया है और जो इस संसार में जीवन्मुक्तों की भाँति विचरण करते हैं— तथा जिनमें दूसरों को भी उस सत्य का अनुभव कराने की शक्ति है।

अनुभवी साधक

• ग्रह-दोषों को शांत कर सकते हैं
• रोगों का निवारण कर सकते हैं
• अलौकिक सिद्धियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं

यद्यपि ये सभी गौण फल हैं— और जिनका मन वास्तव में शांत हो चुका है, वे इन पर आश्रित नहीं होते।

यह गहन श्रीविद्या तंत्र, जो भोग और मोक्ष—दोनों प्रदान करता है, सदैव से वैदिक परंपरा के विद्वानों द्वारा अत्यंत सम्मानित रहा है। क्योंकि यह तंत्र स्वयं परशिव—आदि परमेश्वर द्वारा श्रीदेवी को उपदिष्ट किया गया था।

इस साधना पर— जो मनुष्य के चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में समर्थ है— वैदिक परंपरा के रत्न

• कालिदास
• मूककवि
• तथा उत्तरकालीन आचार्य नीलकंठ दीक्षित माता के कमल-चरणों के अनन्य उपासक रहे हैं

यह तथ्य मंदिर-घंटा-नाद की भाँति घोषित है।

अद्वैत के महान आचार्य विद्यारण्य भी इसी विद्या के उपासक थे

यह तथ्य अब पूर्णतः सिद्ध है। विद्यारण्य ने महान मंत्र-ग्रंथ विद्यार्णव की रचना की, और श्री अप्पय्य दीक्षित ने मंत्र-शास्त्र ग्रंथ परिमल की रचना की

ऐसा परंपरा में सर्वत्र कहा जाता है, यद्यपि ये ग्रंथ आज प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध न भी हों।

आदि शंकराचार्य से प्रारंभ हुई अविच्छिन्न परंपरा में

• शंकर मठों में संपन्न होने वाली श्रीचक्र पूजा
• पंचदशाक्षरी विद्या की परंपरा

ये सभी वैदिक मूल से ही उत्पन्न मानी जाती हैं। इससे किसी भी प्रकार का संदेह नहीं रहता कि श्रीविद्या ही परम देवी की उपासना है। काशी क्षेत्र को प्रकाशित करने वाली दिव्य शक्ति— कामाक्षी, राजराजेश्वरी— वही श्रीविद्या की परम अधिष्ठात्री देवी हैं।

श्री यंत्र सपर्या पद्धति श्रीचक्र और श्रीयंत्र

दोनों की साधनाओं में

• मंत्र समान हैं
• देवता समान हैं
• प्रतिष्ठा मंत्र भी समान हैं

भिन्नता केवल यंत्र की आकृति में है।

मुझे मंत्र महोदधि में श्रीचक्र प्रतिष्ठा-विधि प्राप्त हुई, जबकि श्रीविद्या सपर्या पद्धति में श्रीयंत्र की विस्तृत विधि वर्णित है। इन साधनाओं में

• घर या कार्य-स्थल पर श्रीचक्र अथवा श्रीयंत्र की स्थापना की जाती है
• और इससे ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग खुलता है एक सामान्य गृहस्थ के लिए

यह साधना

• आजीवन आर्थिक स्थिरता
• धन का निरंतर प्रवाह सुनिश्चित करती है।

जब मैंने इन साधनाओं का अभ्यास दशकों पूर्व किया था, तब मेरा उद्देश्य केवल आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करना था। परंतु वास्तविक जीवन में यही साधना और ज्ञान मुझे अत्यंत सूक्ष्म रूप से ब्रह्म-ज्ञान (ब्रह्मविद्या) की दिशा में ले गया

और यही इस विद्या की सबसे महान और गूढ़ कृपा है।

श्रीचक्र और श्रीविद्या की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये पहले उक्त पगों का मार्ग अपनायें व उमा कैलाश फाउंडेशन से सम्पर्क करें

response@umakailash.org

श्री दक्षिण कालिका

सर्वागीण विकास व संरक्षित जीवन हेतु

श्री दक्षिण कालिका सपर्या पद्धति के अनुसार— “कलियुग में केवल चण्डिका ही एकमात्र रक्षिका हैं। दुष्ट प्रवृत्तियों से ग्रस्त इस संसार में आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का एकमात्र साधन केवल कालिका ही हैं।”

“दस महाविद्याओं में महामाया—दिव्य माता श्री काली— आदि और परम शक्ति हैं। वही महाकाल शिव की कलाना-शक्ति हैं और उनका स्थान सर्वोच्च है। वे त्रिलोकी की अधिष्ठात्री, सृष्टि की सर्जक, पालक और संहारक, समस्त कामनाओं की पूर्तिकर्त्री श्री त्रिभुवनेश्वरी हैं— और सर्वोपास्य देवी हैं। यद्यपि वे अनादि, अनंत, सूक्ष्म और सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म हैं, फिर भी ये सभी गुण उनमें विशेष रूप से प्रकाशित होते हैं।”

“यद्यपि माता काली निराकार हैं, भक्तों और उपासकों के लिए उनके स्वरूप, गुण, वाहन और लीलाएँ वर्णित की गई हैं।”

यदि आप SRS वीडियो श्रृंखला तथा ब्रह्मज्ञान–आत्मज्ञान विषयक मेरे वीडियो देखें, तो आप पाएँगे कि देवी महाकाली, देवी महालक्ष्मी और देवी महासरस्वती के विषय में जो मैंने कहा है— वही तथ्य श्रीविद्या सपर्या के ग्रंथों में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।

“काली के अनेक स्वरूप होते हुए भी, उन सभी में दक्षिण-कालिका प्रधान स्वरूप के रूप में विद्यमान हैं।”

“सभी तंत्रों का यह सिद्धांत है कि स्वयं श्री कालिका देवी परम ब्रह्म का स्वरूप— विद्या—हैं। जो उनकी शरण में जाता है, चाहे वह कितना ही पतित क्यों न हो, वह भी निर्वाण—मोक्ष— प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। समस्त आगम-शास्त्र यह उद्घोष करते हैं कि श्री काली के समान न कोई विद्या है, न कोई फल, न कोई ज्ञान, और न कोई तप। कलियुग में वही एकमात्र सच्ची सिद्धि प्रदान करने वाली हैं।”

“सभी देवताओं का सार, शीघ्र फल प्रदान करने वाली, समस्त गुणों से युक्त, समस्त देवताओं द्वारा पूजिता देवी दक्षिणा-कालिका ही हैं। महाब्रह्मस्वरूपिणी, महाकाल-महिषी महाकालिका की उपासना ही सर्वोच्च तांत्रिक साधना है।”

योग का शुद्ध मार्ग

“योग का शुद्ध प्रवाह दो मुख्य रूपों में निरंतर बहता है— सगर्भ और निर्गर्भ। यही शीघ्र फल देने वाला सरल साधन है। सगर्भ क्रिया-योग और निर्गर्भ क्रिया-योग के भेद से साधना की धारा दो प्रवाहों में विभक्त होती है। यही संसार-बंधन उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों से निवृत्ति का मार्ग है।”

“इस विधि में समस्त लोकों, समस्त जगतों और संपूर्ण ब्रह्मांड की उपासना निहित है। उनकी उपासना करने से चर और अचर— दोनों प्रकार के समस्त देवी–देवताओं की उपासना हो जाती है। इस साधना से संपूर्ण सृष्टि संतुष्ट होती है।”

शिवत्व की प्राप्ति

“इस मार्ग की शरण लेने से साधक मुक्त हो जाता है और भैरव बन जाता है। आध्यात्मिक साधना की दिव्य पृष्ठभूमि पर परम आनंद का अनुभव करता हुआ वह जीवन्मुक्त हो जाता है। वह शिवस्वरूप हो जाता है, परम मोक्ष—केवल्य— को प्राप्त करता है।”

“देहधारी जीवात्मा अज्ञान-सागर में भटकती रहती है। जब वही जीवात्मा— जो वास्तव में शिव ही है— शक्ति से एकाकार होती है, तब अज्ञान से मुक्त होकर ज्ञानस्वरूप बन जाती है और स्वयं ब्रह्म हो जाती है।”

“इसी विधि में जीव को शिव बनाने की सबसे सरल और वैज्ञानिक प्रक्रिया निहित है। इसी की शरण लेकर साधक पशु-सदृश संकोचों का त्याग करता है और शिवत्व को प्राप्त करता है। वह अपनी कुल-शक्ति को जाग्रत कर परम आत्मा में लीन कर देता है, जिससे वह पूर्ण ब्रह्म के सभी ऐश्वर्यों को प्राप्त करता है और श्री—समृद्धि— को प्राप्त करता है।”

सिद्धियाँ और समृद्धि

“वह धन्य हो जाता है। उसे सभी प्रकार की संपत्ति और समृद्धि प्राप्त होती है। पूर्ण दैवी ऐश्वर्य से युक्त होकर वह तृप्त होकर स्वतंत्र विचरण करता है। इतना ही नहीं— सभी सिद्धियाँ उसके स्मरण मात्र से उसके समक्ष उपस्थित हो जाती हैं, बिना किसी विशेष आवाहन के। यहाँ तक कि बाहरी लोग भी काली-भक्त के सेवक बन जाते हैं।”

“अष्टमी तिथि को कालिका के उपासक पूर्ण चंद्र, आठ चंद्र और आठ सूर्य तक प्रकट कर सकते हैं। अणिमा आदि सिद्धियाँ, आकाश-गमन, चर-अचर लोकों में निर्बाध विचरण, दिव्य वस्तुओं का प्राकट्य, समस्त ब्रह्मांड की घटनाओं का ज्ञान, मृत-संजीवनी, रसायन, उड़ान, साठ सिद्धियों का आधिपत्य, तथा सर्वाधिकार— ये सभी शक्तियाँ उसके अधीन हो जाती हैं।”

“वह साधक लोगों के सामने सैकड़ों–हज़ारों रूपों में प्रकट हो सकता है। समस्त आपदाओं और दुर्भाग्यों को वह क्षणमात्र में दूर कर देता है। भूत, प्रेत, ग्रह-दोष, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, भैरव, विनायक, स्कन्द— ऐसे सभी प्राणियों के कष्टों का वह तत्काल नाश कर देता है।”

“जो साधक कालिका-विद्या का नित्य जप करता है, वह समस्त सिद्धियों का स्वामी, अनुपम आनंद से युक्त और सर्वज्ञान-संपन्न हो जाता है। वह बिना प्रयास के आध्यात्मिक सिद्धि, धन, अन्न और सर्व प्रकार की समृद्धि प्राप्त कर लेता है।”

निष्कर्ष

श्री दक्षिण कालिका सपर्या पद्धति अतः

• जीवनभर माता महाकाली की कृपा
• सर्वांगीण विकास
• आध्यात्मिक उन्नति
• भौतिक समृद्धि
• तथा परम लक्ष्य

शिवत्व और मोक्ष प्रदान करने वाली एक अत्यंत शक्तिशाली और विस्मयकारी साधना है। यह साधना महाकाली साधना के साथ संयुक्त रूप से की जानी चाहिए।

श्रीदक्षिण कालिका सपर्या के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये पहले पाँच पगों का मार्ग अपनायें व उमा कैलाश फाउंडेशन से सम्पर्क करें response@umakailash.org

सनातन हिन्दु वैदिक ज्ञान व प्रक्रियाओं के विषय में सर्वांगीण जानकारी हेतु 

यह पृष्ठ अति लघु रूप में प्रस्तुत किया गया है। सनातन मार्ग ज्ञान की वास्तव में समस्त जानकारी अनेको ग्रंथों में भी समाहित नहीं की जा सकती।

उच्च्तर प्रक्रियायें भी सेकड़ों नही सहस्त्रों हैं।

साधक के स्वयं के परिश्रम व ज्ञान अर्जित करने की अभिलाषा पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। हमारा आग्रह है कि साधक स्वयं भी प्रयत्नशील रहें व अनेक से अनेक अधिक ग्रंथों का अध्ययन करने का प्रयत्न करें।

सनातन हिन्दु ग्रंथों मे असीमित शोध कार्यों की संभावना है। वर्तमान समय तक हमारे ग्रंथों की इस आधार पर उपेक्षा की गई कि भगवान के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। 

परन्तु हमारे शोधों ने पूर्ण रूप से सिद्ध किया है कि सनातन ज्ञान न केवल तार्किक है अपितु वर्तमान समय के विज्ञान से कहीं अधिक विस्तृत व सर्वांग है। तथा मानव जीवन को पूर्णतया विस्तार से उल्लेखित कर के मानव जीवन को एक सही दिशा प्रदान करने का विश्व में एकमात्र साधन है।

इस विषय पर उमा कैलाश फाउंडेशन के संस्थापक भारत व विश्व के किसी भी बड़े से बड़े वैज्ञानिक अथवा दार्शनिक से किसी भी प्रकार व स्तर का तर्क करने के लिये उनका स्वागत करते हैं। दोनो हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी भाषाओं में।

वर्तमान समय में जब कि विश्व में संघर्ष अनिश्चितता व संकट की परिस्थितियाँ व्याप्त हैं, ऐसी अवस्था में यदि मानव के लिये कोई एक मार्गदर्शन का साधन है तो वह सनातन हिन्दु ज्ञान ही है जैसा कि पाठकगण इस वेबसाईट को पढ कर समझ ही गये होंगे।

भारत में भी अनेकों संस्थान हैं जो कि सनातन ग्रंथों में वैज्ञानिक शोधकार्य कर रहे हैं। परन्तु वे अपने को केवल उस ज्ञान तक सीमित रख रहे हैं जितनी वर्तमान पाश्चात्य वैज्ञानिक सोच है।

भारतीय वैज्ञानिक पाश्चात्य सोच से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। 

जब कि वेदों व अन्य ग्रंथों में अनेकों ऐसे तथ्य हैं जिन के विषय में वर्तमान वैज्ञानिक समाज ने सोचा तक नहीं है। इन तथ्यों में से हमने कुछ ही तथ्यों का विष्लेशण किया है। परन्तु ग्रंथों में अन्तहीन ज्ञान समाहित है।

भारतीय विशेषकर युवा पीढ़ी से हमारा आग्रह है कि यदि कोई विज्ञान अथवा इंजीनियरिंग के छात्र ग्र्ंथों में शोधकार्य करने के इच्छुक हों वे निम्न ईमेल पर सम्पर्क स्थापित करें। 

हमारे अनुमानुसार यदि सहस्त्रों की संख्या में शोधकर्ता हमारी संस्था से जुड़ें तो दशकों का समय भी कम पड़ सकता है। हमारे शोध पूर्ण रूप से अत्याधुनिक तकनीकों, जिस में AI सम्मिलित है, उपयोग करते हैं।

मैं बताना चाहुंगा कि आधुनिक AI  का उपयोग अत्यन्त लाभकारी है परन्तु वर्तमान AI में हिन्दु ग्रंथों के विषय में बहुत ही सीमित जानकारी उपलब्ध है। परन्तु अन्य कई कार्य समूहों के लिये AI का उपयोग उत्तम रूप से किया जा सकता है। 

शोधकार्य वर्क फ्रौम होम रूप में भी किये जा सकते हैं। 

response@umakailash.org