Guru Diksha
गुरु गोबिन्द दोनो खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपके गोबिन्द दियो मिलाय॥
यदि गुरु और परमेश्वर दोनों मेरे सामने खड़े हों,
तो मैं सबसे पहले किसके चरण स्पर्श करूँ?
मैं गुरु के चरण पहले स्पर्श करूँगा,
क्योंकि गुरु ही मुझे परमेश्वर तक ले गए हैं।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर्साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही देव महेश्वर हैं।
गुरु ही वह सर्वव्यापी परब्रह्म हैं, जो सर्वत्र विद्यमान है।
हे परम ब्रह्म स्वरूप गुरु,
मैं आपको नमन करता हूँ।
पूज्य गुरुदेव
श्री नारायण दत्त श्रीमाली जी
गुरू दीक्षा एक शिक्षा संस्थान में प्रवेश लेने समान है।
जिस प्रकार किसी भी क्षेत्र या गतिविधि में संगठित और सुव्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्यक्ति स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रवेश करता है, उसी प्रकार गुरु दीक्षा भी एक विद्यालय में प्रवेश करने के समान है।
विशेष रूप से वर्तमान जीवन शैली में की सामान्य शिक्षा के साथ-साथ प्राचीन हिंदू आध्यात्मिक विज्ञानों में शिक्षित होने के लिए गुरू दीक्षा अनिवार्य है।
मैं इस ज्ञान को विज्ञान इसलिए कहता हूँ, क्योंकि विज्ञान मूलतः किसी विषय को ज्ञान, तर्क और प्रयोग के माध्यम से समझने की प्रक्रिया है।
सनातन हिंदू धर्म का मार्ग भी अपने ही जीवन के बारे में परम ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग है
वह भी तार्किक सिद्धांतों को समझकर और ऐसी विशिष्ट साधनाएँ करके, जो मन और बुद्धि को प्रशिक्षित करती हैं।
यही प्रक्रियायें व्यक्ति को उन सर्वोच्च शक्तियों से जोड़ने की दिशा में भी ले जाती हैं, जो इस ब्रह्मांड का संचालन करती हैं, और इस प्रकार जीवन की समस्याओं के समाधान में सहायक होती हैं।
इससे उच्च्तर साधन क्या हो सकता है कि स्वयं प्रयोग करके और परखकर यह देखा जाए कि यह वैदिक प्रक्रियायें वास्तव में कार्य करती हैं अथवा नहीं।
जैसे कि आधुनिक विज्ञान में, जबकि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के पास असंख्य क्षेत्रों में उन्नत ज्ञान है, फिर भी जब कोई विद्यार्थी हाई स्कूल में पहुँचता है, तो वह भौतिकी, रसायन और जीवविज्ञान के सबसे मूलभूत प्रयोगों से ही आरंभ करता है।
मूल सिद्धांतों में दक्ष होने के बाद ही विद्यार्थी स्नातक, परास्नातक और डॉक्टरेट जैसे उच्च स्तरों की ओर बढ़ता है।
इसी प्रकार, गुरु दीक्षा आपको एक संरचित और सुव्यवस्थित मार्ग पर ले जाती है जहाँ आप ज्ञान को आत्मसात करते हैं, तर्क को समझते हैं, व्यावहारिक प्रयोगों से प्रारम्भ करते हैं और फिर धीरे-धीरे उच्चतर ज्ञान तथा उन्नत साधनाओं की ओर बढ़ते हैं।
हिंदू आध्यात्मिक दर्शन और चिंतन के मूल सिद्धांत
आध्यात्मिकता जीवन का वास्तविक विज्ञान है।
प्राचीन हिंदू शास्त्र न केवल मानव जीवन, अपितु समस्त जीव-जगत को संचालित करने वाले मूल सिद्धांतों का अत्यंत विस्तृत वर्णन करते हैं
• जीवन क्यों अस्तित्व में है?
• जीवन का उद्देश्य क्या है?
• हमारा जन्म क्यों होता है?
• जीवन-प्रणाली कैसे कार्य करती है?
• सृष्टि की प्रक्रिया क्या है? इत्यादि।
इन सभी विषयों पर हमारी YouTube वीडियो श्रृंखला
Self Realization Simplified (SRS 1 से SRS 42)
में गहन चर्चा की गई है।
हमारे चैनल पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें।
ये सभी वीडियो पूर्णतः हिंदू शास्त्रों पर आधारित हैं।
किसी भी वैज्ञानिक अनुशासन की तरह यह क्षेत्र भी अत्यंत विशाल है और इसमें अपार ज्ञान निहित है।
अतः विद्यार्थी को क्रमिक, मार्गदर्शित पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।
यह सहज ही समझा जा सकता है कि सीधे उन्नत साधनाओं में कूदना, मिडिल स्कूल या हाई स्कूल पूरे किए बिना पीएचडी करने का प्रयास करने जैसा है।
इच्छुक विद्यार्थियों की सुविधा के लिए, हमने उपर्युक्त सबसे मूलभूत सिद्धांतों को समाहित करने वाली वीडियो YouTube पर उपलब्ध कराई हैं।
ये पूर्णतः निःशुल्क हैं।
अतः सभी इच्छुक व्यक्ति—विशेषकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाली युवा पीढ़ी—इन वीडियो को ध्यानपूर्वक देखें।
प्रश्न पूछें। मनन करें।
और फिर पथ के दूसरे स्तर की ओर अग्रसर हों।
response@umakailash.org
गुरू दीक्षा
यह प्रक्रिया गुरु दीक्षा से प्रारंभ होती है।
यह आपेक्षित है कि जो इच्छुक गुरु दीक्षा लें, उन्होंने ऊपर वर्णित वीडियो श्रृंखला SRS Series
में जो कुछ बताया गया है, उसे समझ लिया है और आत्मसात कर लिया है।
उपरोक्त वीडियो श्रृंखला में जो भी बताया गया है, वह प्रत्यक्ष रूप से शास्त्रों के संदर्भों पर आधारित है और सम्पूर्ण ज्ञान को एक सुव्यवस्थित ढाँचे में प्रस्तुत किया गया है।
दीक्षा, सनातन हिंदू धर्म में वह पारंपरिक विधि है जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान के पथ तथा उच्चतर उपलब्धियों की साधना की यात्रा पर प्रवृत्त किया जाता है।
यह प्रक्रिया किसी व्यक्ति को अपना शिक्षक, मार्गदर्शक और मेंटर स्वीकार करने का प्रतीक होती है।
सनातन हिंदू धर्म के मार्ग में कोई भी सिद्धांत बाध्यकारी नहीं होता।
सभी अनुशंसित सिद्धांत और साधनाएँ पूर्णतः वैकल्पिक हैं।
गुरु केवल मार्ग का ज्ञान प्रदान करता है;
उन शिक्षाओं का पालन करना या न करना पूर्णतः शिष्य का निर्णय होता है।
जब कोई विद्यार्थी इन सिद्धांतों और साधनाओं को अपनाने का निर्णय करता है, तो वह अपने जीवन में अधिक पूर्णता, आनंद और ऊँचे स्तर की चेतना की संभावनाओं के द्वार खोल देता है।
इसके विपरीत, यदि कोई विद्यार्थी इन शिक्षाओं का अनुसरण न करने का निर्णय लेता है, तो वह एक सामान्य मानव के समान जीवन व्यतीत करता है।
अंतिम चुनाव सदैव शिष्य के हाथ में होता है।
यह व्यावसायिक अर्थों में कोई उत्पाद नहीं है।
यह शास्त्रीय समझ का एक संरचित संप्रेषण है, जो दशकों के अध्ययन, अभ्यास और मूल ग्रंथों से सत्यापन के माध्यम से परिष्कृत किया गया है।
प्रत्येक किट से संबद्ध योगदान का उद्देश्य इस कार्य की निरंतरता, शुद्धता और उत्तरदायित्व को बनाए रखना है — न कि इसका व्यवसायीकरण करना।
गुरु दीक्षा में क्या सम्मिलित होता है?
गुरु दीक्षा लेने पर क्या प्राप्त होता है?
जब आप गुरु दीक्षा लेने का निर्णय करते हैं, तो आपको एक दीक्षा पैकेट भेजा जाएगा, जिसमें निम्नलिखित वस्तुएँ सम्मिलित होंगी—
दीक्षा पैकेट में सम्मिलित सामग्री
1. गुरु का चित्र एवं तीन संस्कृत मंत्र
इन्हें जप या अन्य अनुशंसित साधनाओं के समय सामने स्थापित करना होता है।
2. गुरु चादर
इसे प्रतिदिन की साधना-क्रम के समय तथा अन्य किसी भी साधना के समय धारण करना होता है।
3. जनेऊ (यज्ञोपवीत)
यह पवित्र सूत्र है, जिसे शिष्य द्वारा दीक्षा स्वीकार करने के बाद धारण किया जाता है।
4. जप माला (Rosary)
यह 108 मनकों की माला होती है, जो मंत्र-जप के दौरान गिनती में मन को भटकाए बिना साधना को मापने में सहायक होती है।
5. गुरु दीक्षा पुस्तिका यह मैनुअल सभी आवश्यक पूर्व-शर्तों तथा प्रतिदिन की साधना-पद्धति का विस्तृत विवरण प्रदान करता है। (PDF File)
इसमें निम्नलिखित विषयों पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया गया है
१. स्तोत्र पाठ
२. मंत्र जप
३. दैनिक ध्यान (ध्यान की विस्तृत विधि सहित)
४. यंत्र का निर्माण
५. साधनाओं का विधिवत् प्रदर्शन
६. उन्नत साधनाओं का परिचय
यह पुस्तिका शिष्य को क्रमबद्ध, सुरक्षित और प्रभावी रूप से आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने हेतु पूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।
उमा कैलाश फाउंडेशन के सण्स्थापक ने
पूज्य गुरुदेव श्री नारायण दत्त श्रीमाली जी से
गुरु दीक्षा ग्रहण की है
गुरु दीक्षा
पूज्य गुरुदेव जी महाराज के दिव्य आशीर्वाद और संरक्षण में प्रदान की जाएगी।
यद्यपि पूज्य श्री गुरुदेव जी अब भौतिक रूप से हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं,
फिर भी वे सदैव हमारे मार्गदर्शक प्रकाश और दिव्य गुरु बने रहेंगे।
प्रमोटर ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ों पर ही नहीं, अपितु सामान्य दैनिक जीवन में भी
उनकी उपस्थिति और मार्गदर्शन का प्रत्यक्ष अनुभव किया है।
उनके प्रवचनों तथा उनके द्वारा किए गए व्यापक शोध कार्य—
जिसमें असंख्य साधनाओं से संबंधित ज्ञान का संकलन, अध्ययन और अभ्यास सम्मिलित है—
आपके समक्ष एक सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
प्रमोटर कहते हैं:
“यह केवल उनके दिव्य आशीर्वाद के कारण ही संभव हो पाया है कि मैं प्राचीन हिंदू शास्त्रों से ऐसा ज्ञान संकलित कर सका हूँ, जो आज भी मानवता—विशेषकर हिंदुओं—से ओझल है।”
“जब मैंने वर्ष 2006 में गुरु दीक्षा ली, उस समय मेरे पास पर्याप्त धन था, फिर भी मैं एक पूर्णतः भटका हुआ व्यक्ति था। मेरे जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही थीं, जो मुझे भ्रमित कर रही थीं। मैं नहीं जानता था कि उनसे कैसे निपटूँ। फिर भी मेरे मन के किसी कोने में यह स्पष्ट था कि मुझे एक गुरु की आवश्यकता है।”
“मैं अत्यंत धार्मिक था—नियमित रूप से मंदिर जाता था, तीर्थ यात्राएँ करता था और सभी कर्मकांड श्रद्धा से करता था—फिर भी मेरे जीवन में गंभीर समस्याएँ बनी रहीं और मुझे यह समझ नहीं था कि मुझे क्या करना चाहिए। कुछ कड़ियाँ थीं, जिनका अभाव मुझे स्पष्ट रूप से अनुभव होता था।”
“तभी माता भगवती की प्रार्थना करते समय, माता ने मुझे गुरु खोजने की प्रेरणा दी। मैंने तुरंत इंटरनेट पर खोज की और अपने गुरु—पूज्य श्री गुरुदेव जी—को पाया। उसी दिन मैं दिल्ली स्थित उनके आश्रम पहुँचा। जिस पहली दीक्षा को मैंने चुना, वह गुरु दीक्षा थी। उस समय मुझे यह ज्ञात नहीं था कि गुरुदेव भौतिक रूप से इस संसार में नहीं थे। मैंने गुरु दीक्षा उनके सुपुत्र से ग्रहण की।”
“इसके पश्चात् मैंने श्रद्धा और निरंतरता के साथ वे सभी दैनिक ध्यान प्रक्रियायें करना प्रारंभ किया, जिनका मुझे निर्देश दिया गया था। साथ ही, आश्रम द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं का मैंने गहन अध्ययन और संग्रह किया।”
“फिर मैंने उन पत्रिकाओं में वर्णित साधनाओं का विधिपूर्वक अभ्यास प्रारंभ किया।”
“लगभग छह महीनों के भीतर ही मुझे अपने वास्तविक जीवन में स्पष्ट और प्रत्यक्ष परिणाम दिखाई देने लगे। मेरा जीवन परिवर्तित होने लगा। ऐसे अद्भुत परिवर्तनों को देखकर, उसी समय मैंने पूज्य श्री गुरुदेव जी महाराज से यह संकल्प लिया कि मैं इस सम्पूर्ण ज्ञान को संसार तक पहुँचाऊँगा।”
“मुझे यह बोध हुआ कि जीवन में केवल धन होना निरर्थक और अपर्याप्त है। धन से कहीं अधिक कुछ और भी है। केवल धन से जीवन के वास्तविक उद्देश्य कभी पूरे नहीं हो सकते। किंतु दिव्य समर्थन चमत्कार कर सकता है, और साधक के लिये असंभव भी संभव हो जाता है।”
“इन पंक्तियों को लिखते समय मेरी आँखों से आँसू बह निकलते हैं। उस दिन के बाद मुझे कभी पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यद्यपि भाग्य के अनुसार समस्याएँ आती रहीं, परंतु पूज्य श्री गुरुदेव जी के चरणों को दृढ़ता से थामे रखकर मैं हर चुनौती से सफलता पूर्वक निकल सका।”
“पूज्य श्री गुरुदेव जी महाराज की दिव्य कृपा के कारण ही आज मैं इस स्थिति में हूँ कि इस सम्पूर्ण, विराट और दिव्य ज्ञान को एकत्र कर संसार के समक्ष प्रस्तुत कर पा रहा हूँ।”
“मैं पूर्ण निश्चय के साथ कह सकता हूँ कि दिव्य समर्थन के बिना जीवन जीना जंगल में भटकने के समान है—एक अधूरा जीवन, सारहीन जीवन। बहुत कुछ और लिखा जा सकता है, किंतु उसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।”
मेरे द्वारा की गई
साधनाओं का क्रम
जीवन में वास्तव में जीवन की गुणवत्ता ही सबसे अधिक अर्थ रखती है।
आपके पास अपार धन-संपत्ति हो सकती है, शक्ति हो सकती है, प्रभावशाली संपर्क हो सकते हैं, अधिकार और पद हो सकता है—
परन्तु यदि जीवन में गुणवत्ता नहीं है, तो यह सब निरर्थक है।
निश्चय ही, मेरे द्वारा की गई सबसे पहली साधनाएँ
मेरे जीवन में वित्तीय स्थिरता और निरंतरता लाने के लिए ही थीं।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि
अधिक से अधिक धन और संपत्ति होना
वित्तीय स्थिरता और निरंतरता की कोई गारंटी नहीं है।
जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं
जिनकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होती।
वित्तीय स्थिरता और निरंतरता
केवल आपकी आय या आपके द्वारा संचित धन से कहीं अधिक है।
यह एक दीर्घकालिक, समग्र दृष्टिकोण है,
जिसके अंतर्गत धन का वास्तविक और सतत विकास होता है।
कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझें
मान लीजिए आप दिन-रात मेहनत करते हैं,
वर्षों तक बचत करते हैं,
और उस धन से बहुत महँगी संपत्ति खरीदते हैं।
आप बहुत प्रसन्न और गर्वित होते हैं।
लेकिन विश्व-प्रणालियों में होने वाली परिस्थितियाँ
आपके नियंत्रण में नहीं होतीं।
यदि किसी कारणवश—जो आपके वश में नहीं है—
उस क्षेत्र में संपत्ति के दाम गिर जाएँ,
और आपकी संपत्ति का मूल्य
आपके क्रय मूल्य से बहुत कम हो जाए—
तो आप किस स्थिति में होंगे?
या मान लीजिए,
आपके पास बहुत मूल्यवान संपत्ति है,
लेकिन आय का कोई साधन नहीं है।
आप उसे इसलिए नहीं छोड़ते क्योंकि
वह आपके पूर्वजों की मेहनत से बनी है।
आप गरीबी में जीवन जीते हैं,
यहाँ तक कि भोजन के लिए भी धन नहीं होता—
तो क्या वह संपत्ति, चाहे अरबों की क्यों न हो,
आपके लिए वास्तव में किसी काम की है?
एक और उदाहरण—
आपने किसी कारण से एक संपत्ति खरीदी।
बाद में आप उसे बेचना चाहते हैं,
लेकिन वर्षों तक भी वह उचित मूल्य पर नहीं बिकती।
परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि
आप वहीं घर बनाकर रहने लगते हैं।
और अचानक, बिना किसी प्रयास के,
संपत्ति के दाम आसमान छूने लगते हैं।
अनुकूल परिस्थितियाँ अपने-आप बन जाती हैं।
ऐसे सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं।
वर्तमान धारणा यह है कि
आपके पास जो धन और संपत्ति है,
वह पूरी तरह आपकी मेहनत का परिणाम है।
परंतु वास्तविकता यह है कि
आपकी समग्र वित्तीय स्थिति
पूरी तरह आपके नियंत्रण में नहीं होती।
विश्व में अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जहां व्यक्ति ने अपने व्यावहारिक काल में बहुत अधिक धन कमाया, बहुत अधिक सम्पत्ति एकत्र की, बहुत मान सम्मान प्राप्त हुआ, बहुत ख्याति मिली परन्तु वृद्धावस्था आते आते वह सब धीरे धीरे समाप्त हो गया, धन खर्च हो गया, सम्पत्तियां बिक गईं और व्यक्ति सड़क पर आ गया।
आप इंटरनेट पर ऐसे अनेकों सेलेब्रिटीज़ देख सकते हैं जो आज गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं।
सनातन ग्रंथों के अनुसार धन अर्जन के अतिरिक्त आपको अनेकों ऐसे तथ्यों का जीवन पर्यन्त ध्यान रखना पड़ता है जिन्हे आप वर्तमान समय में अनदेखा कर रहे हैं। भाग्य कोई परिवर्तित नहीं कर सकता परन्तु भाग्य के प्रभाव को अवश्य ही नियंत्रित किया जा सकता है। इस मार्ग का निरूपण ही सनातन धर्म का मार्ग है जो कि इस वेबसाईट पर विस्तार से बताया गया है।
प्राचीन हिंदू शास्त्रों के अनुसार,
आपके पास जो धन और संपत्ति है,
वह पूरी तरह आपके पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम है।
यह इस बात पर भी निर्भर नहीं करता
कि ईश्वर चाहता है या नहीं—
यह केवल और केवल आपके अपने कर्मों पर आधारित है।
आपके नियंत्रण में क्या है?
आपके नियंत्रण में केवल यह है कि
• आप कौन-सा कर्म करते हैं
• आप उसे कैसे करते हैं
• आप उसे कितनी ईमानदारी और निष्ठा से करते हैं
और कर्म का अर्थ केवल
आपका पेशेवर कार्य नहीं है।
कर्म में सम्मिलित हैं
• आपका स्वास्थ्य
• आपके व्यक्तिगत संबंध
• दूसरों के साथ आपका व्यवहार
• दान और परोपकार
• जीवन के प्रति आपकी मूल दृष्टि
इन कर्मों की शुद्धता और अशुद्धता
मुख्यतः उन पाँच मूल मानवीय सिद्धांतों से निर्धारित होती है
जिनका विस्तार से वर्णन
यम और नियम के पृष्ठ पर किया गया है।
वर्तमान संदर्भ में—
वित्तीय स्थिति के विषय में—
यह सब अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सच्चा मनुष्य बनना
आपकी वर्तमान और भविष्य की वित्तीय स्थिति में
अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एक और महत्वपूर्ण गुण है
जीवन को समग्र रूप से समझने की क्षमता।
जब यह समझ विकसित हो जाती है,
तो ईश्वर के प्रति समझ अपने-आप विकसित हो जाती है।
इसके लिए किसी को सिखाने की आवश्यकता नहीं होती।
और जब यह समझ आती है,
तो व्यक्ति वे सभी आवश्यक कर्म करने लगता है
जो वैदिक ग्रंथों में वर्णित
जीवन-परिस्थितिकी (Ecosystem)
को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
वेद केवल “धार्मिक” ग्रंथ नहीं हैं।
मैं यहाँ यह भी कहना चाहूँगा कि
वेदों को केवल ‘धार्मिक ग्रंथ’ नहीं समझना चाहिए।
वे समस्त मानव जाति के लिए
जीवन के मार्गदर्शक ग्रंथ हैं।
आधुनिक विश्व ने
ईश्वर की विभिन्न छवियों के आधार पर
समाजों को अलग-अलग खाँचों में बाँट दिया है।
परंतु प्राचीन वैदिक ग्रंथ
मोक्ष के मार्ग के साथ-साथ
मानव के कर्तव्यों का भी स्पष्ट वर्णन करते हैं।
हिंदू ग्रंथ
ईश्वर के अस्तित्व का
वैज्ञानिक रूप से सत्यापन योग्य प्रमाण भी देते हैं।
योग, ध्यान और आयुर्वेद—
ये सभी प्रणालियाँ आज
विश्व भर में,
सीमाओं, जातियों और विश्वासों से परे
स्वीकृत हो रही हैं।
जब ये प्रणालियाँ
सभी मनुष्यों पर लागू होती हैं,
तो प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अन्य सिद्धांत भी
सभी मनुष्यों पर लागू होते हैं।
अतः ध्यान और साधनाएँ
भी सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से उपयोगी हैं।
हमें अपने दृष्टिकोण को
केवल “विश्वास” या
आधुनिक वैज्ञानिक सीमाओं तक सीमित नहीं करना चाहिए।
अब मेरी की गई साधनाओं के क्रम पर लौटते हैं
वित्तीय स्थिरता के लिए
मैंने एक प्रयोग के रूप में
कुछ एक-दिवसीय, छोटी साधनाओं से प्रारम्भ किया।
1. भैरव साधना - मैं एक अत्यंत विचित्र स्थिति में था।
मुझे किसी से बड़ी राशि प्राप्त होनी थी,
और वह राशि मैंने आगे किसी और को देनी थी।
यदि वह राशि समय पर न मिलती,
तो उस व्यक्ति को कुछ संपत्ति-खरीद में भारी नुकसान होता।
वह अंतिम दिन मंगलवार था।
जिस व्यक्ति को मुझे भुगतान करना था,
वह ईमानदार था,
परंतु उसे भी अपने स्रोतों से धन नहीं मिल रहा था।
मैंने एक मंगलवार की भैरव साधना के बारे में पढ़ा,
जो ऐसी कठिन परिस्थितियों के लिए थी।
मैंने उसी रात साधना की।
और आश्चर्य—
अगली सुबह बुधवार को
मुझे फोन आया कि आकर चेक ले जाएँ।
2. चूहों की समस्या
जिस घर में मैं रहता था,
वहाँ चूहों की अत्यंत गंभीर समस्या थी।
मैंने एक दिन की साधना की।
उसके अगले दिन से
मेरे घर में कभी चूहे नहीं आए।
यह सुनने में तुच्छ लग सकता है,
पर यह सत्य है।
आज तक, जहाँ-जहाँ मैं रहा हूँ,
वहाँ यह चूहों की समस्या कभी नहीं आई।
3. इसके बाद मैंने नियमित साधनाएँ प्रारंभ कीं
जिनका प्रारम्भ गणपति साधना से हुआ।
कुछ अन्य साधनाएँ भी थीं
जिन्होंने मेरे मन में
साधनाओं की शक्ति के प्रति
अटूट विश्वास पैदा किया।
उसके बाद से
साधनाएँ मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गईं।
ध्यान रहे कि साधनाएँ आरंभ करने से पहले भी मैं अत्यंत श्रद्धालु और गहराई से धार्मिक व्यक्ति था, फिर भी मेरे जीवन में समस्याएँ आती रहीं, और तब मुझे यह बिल्कुल भी समझ नहीं थी कि उनसे कैसे निपटूँ या क्या करना चाहिए।
लेकिन अब मुझे यह स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि विभिन्न परिस्थितियों में क्या करना आवश्यक है। और यह एक मानसिक सोच का विकास होना है।
अब ऐसा नहीं है कि मुझे हर एक छोटी बड़ी समस्या के लिये साधनायें करनी पड़ें।
यह एक दैविय रक्षा छत्र अथवा मानसिक विकास के रूप में भी समझा जा सकता है।
मैंने अपनी साधनाएँ निम्नलिखित रूप में जारी रखीं
आप यह सोच सकते हैं कि यदि मैं यह सब कर रहा था, तो फिर अपने व्यावसायिक कार्यों के लिए समय कहाँ से निकालता था?
वास्तविकता यह है कि आध्यात्मिक गतिविधियाँ सुनने में भले ही लंबी और थकाने वाली लगें, परंतु मुख्य आवश्यकता दृढ़ संकल्प (Determination) की होती है।
जब संकल्प होता है, तो समय अपने-आप निकल आता है और समय-प्रबंधन भी सहज रूप से हो जाता है।
वर्तमान समय में हर व्यक्ति प्रतिदिन कई घंटे सोशल मीडिया पर व्यतीत करता है।
दिन के अंत में यदि आप ईमानदारी से यह विश्लेषण करें कि सोशल मीडिया पर आपने कितना समय बिताया, तो पाएँगे कि उसका 99% समय पूर्णतः व्यर्थ गया।
इस पर विचार करते रहने के स्थान पर तुरंत इस पथ पर चलना प्रारंभ करें।
विश्व में ऐसा कोई अन्य आध्यात्मिक तंत्र नहीं है जो वैदिक साधनाओं के समान लाभ प्रदान कर सके।
वैदिक साधनाएँ ठोस और सकारात्मक परिणाम देती हैं—यह मेरा आश्वासन है।
मैंने निम्नलिखित साधनाएँ नियमित रूप से कीं
(केवल संस्कृत भाषा में):
श्री सूक्त,
लक्ष्मी सूक्त और
पुरुष सूक्त का वर्षों तक प्रतिदिन पाठ
कनकधारा स्तोत्र का पाठ
लक्ष्मी साधना
अष्ट लक्ष्मी साधना
कनकधारा साधना
कुबेर साधना
श्री चक्र साधना
श्री विद्या सपर्या
तांत्रोक्त श्री दुर्गा सप्तशती साधना
श्री सूक्त साधना
इसके साथ-साथ, वर्ष में दो बार किए जाने वाले पाठ—
वर्ष 1998 से अब तक संस्कृत में श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ
लगभग 2010 से प्रतिवर्ष शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी का पाठ
लगभग
पिछले दस वर्षों से श्रावण मास में प्रतिवर्ष पारद शिवलिंग अभिषेक
अशुभ ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए मैंने अपने तथा अपने परिवार की कुंडलियों में विद्यमान प्रतिकूल ग्रहों हेतु भी साधनाएँ कीं।
इन साधनाओं को करना मेरे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक रहा है।
इनमें से कुछ साधनाएँ मैंने प्रसिद्ध पंडित समूहों से भी करवाईं, जो सामूहिक रूप से दूसरों के लिए ये साधनाएँ करते हैं।
उदाहरण के लिए—यदि 1,00,000 मन्त्र जप करने हों, तो 10 पंडित 10,000–10,000 जप करते हैं और उसके बाद सामूहिक हवन किया जाता है।
इस प्रकार पंडितों द्वारा करवाई गई साधनाएँ भी लाभकारी होती हैं, क्योंकि वे शास्त्रोक्त विधि से इन्हें संपन्न करते हैं।
इनमें सम्मिलित थीं
शनि साधना
केतु साधना
मंगल साधना
राहु साधना
उपरोक्त ग्रह-साधनाएँ लगभग 10 से 12 वर्षों की अवधि में, एक-एक बार ही की गईं।
किन्तु केवल इन्हीं का प्रभाव अत्यंत शक्तिशाली रहा।
मैं प्रत्येक शिष्य और उनके परिवारजनों को ग्रह-साधनाएँ करने की अनुशंसा करूँगा।
वे किसी ज्ञानी ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखाकर प्रतिकूल ग्रहों की पहचान करें और उनके लिए साधना करें।
यह एक बार किया गया कार्य भी परिवार के स्वास्थ्य और सर्वांगीण समृद्धि के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध होता है।
इसके अतिरिक्त, मुझे समय-समय पर अज्ञात शत्रुओं से निरंतर संकट का सामना भी करना पड़ा, जो मेरे और मेरे परिवार के विरुद्ध विभिन्न प्रकार की तांत्रिक क्रियाएँ कर रहे थे।
इसके संकेत मुझे अनेक घटनाओं से मिले—
जैसे सुबह घर के सामने फूल और अन्य सामग्री मिलना,
नई खरीदी कार के विंडस्क्रीन पर गेहूँ के आटे से क्रॉस-रेखाएँ बनाना,
बिना किसी दोष के न्यायालयी मामलों में फँसाया जाना, आदि।
इन प्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिए मैंने निम्न साधनाएँ कीं
बगलामुखी साधना
शरभ साधनाएँ
महाकाल साधना
और सत्य यह है कि इन सभी साधनाओं ने मुझे अत्यंत सहायता प्रदान की।
जीवन में अनेक नकारात्मक घटनाएँ घटित होने पर भी,
जो भी परिस्थितियाँ बनीं,
अंततः वे मेरे पक्ष में ही परिणत हुईं।
वास्तव में गुरूदेव जी द्वारा यह बताया गया है कि जो साधनायें किसी भी व्यक्ति द्वारा की जायें उस के विषय में उस समय अन्य व्यक्तियों से चर्चा नहीं की जानी चाहिये, बताना नहीं चाहिये। परन्तु वर्तमान संदर्भ में गुरुदेव की अप्रत्यक्ष आज्ञानुसार मैं यह कर रहा हूँ। इस का भी लक्ष्य केवल जनमानस का लाभ है जिस से वे वैदिक प्रक्रियाओं व साधनाओं का महत्व समझ सकें।
उच्चतर साधनायें
इन साधनाओं का प्रारम्भ मेरे इस पथ पर आने और गुरु दीक्षा ग्रहण करने के कई वर्षों बाद हुआ।
गुरु दीक्षा लेने के पश्चात प्रारंभिक वर्षों में मैंने मूलभूत साधनाएँ, दैनिक ध्यान, मंत्र-जप और जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन किए।
जब इनका प्रभाव स्पष्ट रूप से जीवन में दिखाई देने लगा—बुद्धि में स्थिरता, निर्णयों में स्पष्टता और परिस्थितियों से जूझने की क्षमता विकसित हुई—तभी क्रमशः उन्नत साधनाओं की ओर बढ़ना स्वाभाविक रूप से संभव हुआ।
यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि:
उन्नत साधनाएँ आरंभिक चरण में नहीं की जातीं। पहले आधार बनाया जाता है
गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर अनुशासन और धैर्य के साथ चला जाता है।
गुरु दीक्षा के बिना और आधारभूत साधनाओं के बिना उन्नत साधनाओं में प्रवेश न तो सुरक्षित होता है, न ही फलदायी।
इसी क्रम और परिपक्वता के साथ ये साधनाएँ मेरे जीवन में आईं—
और तभी उन्होंने गहरा, स्थायी और सकारात्मक प्रभाव दिया।
सर्वांगीण सुरक्षा,
स्वास्थ्य और समृद्धि हेतु
वैदिक साधनाएँ
जीवन में पूर्ण सुरक्षा, स्थिरता और सर्वांगीण समृद्धि के लिए मैंने निम्नलिखित शक्तिशाली वैदिक साधनाएँ भी कीं
श्री महाकाली साधना
श्री दक्षिणा कालिका सपर्या
श्री महाकाली सहस्रनाम यज्ञ
यह लिखते समय भी मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं।
केवल माँ महाकाली की अनंत कृपा से ही मैं जीवन की कुछ अत्यंत कठिन, पीड़ादायक और प्राणघातक परिस्थितियों से बाहर निकल सका—विशेष रूप से अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य से संबंधित स्थितियों से।
इन साधनाओं ने मुझे निम्न गंभीर परिस्थितियों से उबरने में निर्णायक भूमिका निभाई—
जीभ का कैंसर (Carcinoma of Tongue)
गंभीर हृदयाघात (Heart Attack)
तीव्र फूड पॉइजनिंग
LVEF का 25% तक गिर जाना
निमोनिया के बाद स्ट्रोक और फिर उससे उबरना
वास्तव में, किसी एक साधना को किसी एक परिणाम से जोड़कर देखना सही नहीं है।
वैदिक साधनाएँ सामूहिक और समग्र रूप से कार्य करती हैं।
ये जीवन, स्वास्थ्य, बुद्धि, भाग्य और परिस्थितियों के चारों ओर एक अनुकूल, रक्षक और सुधारात्मक वातावरण निर्मित करती हैं।
सभी साधनाएँ मिलकर ऐसे सतत् प्रभावी दिव्य तत्त्व उत्पन्न करती हैं, जो जीवन को निरंतर संरक्षण प्रदान करते हैं।
अन्य सपर्याएँ जो मैंने कीं
उपरोक्त के अतिरिक्त, मैंने निम्न सपर्याएँ भी कीं
श्री सरस्वती सपर्या
श्री शिव सपर्या
श्री गणेश सपर्या
प्रत्येक सपर्या जीवन के भिन्न-भिन्न आयामों को सशक्त करती है—
बुद्धि, स्थिरता, विघ्नों का नाश, विचारों की स्पष्टता और आध्यात्मिक आधार।
कार्यरत एवं सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिए संदेश
आज मैं देखता हूँ कि अनेक कार्यरत एवं सेवानिवृत्त व्यक्ति, जिनके पास धन और समय की कोई कमी नहीं है, अपना जीवन केवल घूमने-फिरने और समय काटने में व्यतीत कर रहे हैं।
जीवन यह कभी पूर्व सूचना नहीं देता कि कब प्रतिकूल परिस्थितियाँ आएँगी—
चाहे वे स्वास्थ्य, वित्त, पारिवारिक, कानूनी या अदृश्य कर्मजन्य हों।
परन्तु यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि जीवन की परिस्थितियाँ उसके पक्ष में नियंत्रित रहें, चाहे संसार में कुछ भी हो रहा हो, तो उसे बिना विलंब वैदिक साधनाओं का मार्ग अपनाना चाहिए।
विशेष रूप से सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिए
सेवानिवृत्ति जड़ता का काल नहीं होनी चाहिए।
जो लोग यह सोचते हैं कि “अब क्या करें?”, उनके लिए समय का सबसे श्रेष्ठ उपयोग है—
प्रतिदिन ध्यान
नियमित मंत्र और स्तोत्र पाठ
क्रमशः साधनाओं का अभ्यास
इससे
पारिवारिक मामलों में प्रज्ञा बढ़ती है
भावनात्मक स्थिरता आती है
निर्णय क्षमता सुदृढ़ होती है
पूरे परिवार की दीर्घकालीन समृद्धि सुनिश्चित होती है
यह बात स्पष्ट रूप से स्मरण रखें—
समस्याएँ आ सकती हैं, परंतु समय के साथ वही प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी आपके पक्ष में परिणाम देने लगेंगी।
आध्यात्मिक साधनायें और सांसारिक कार्य साथ-साथ चल सकते हैं
मैंने ये सभी साधनाएँ अपने व्यावसायिक जीवन के साथ-साथ कीं, जिसमें—
अनुसंधान एवं विकास, उत्पाद डिज़ाइन एवं निर्माण, विपणन और व्यवसाय प्रबंधन
साथ ही, प्राचीन हिंदू ग्रंथों का अध्ययन और अनुसंधान भी निरंतर चलता रहा।
वैदिक मार्ग जीवन से पलायन नहीं सिखाता—
यह
जीवन का बुद्धिमत्तापूर्ण संगठन सिखाता है।
गोपनीयता पर एक महत्वपूर्ण बात
गुरुदेव सदैव कहते थे कि अपनी साधनाओं का प्रचार नहीं करना चाहिए।
मैं यह सब केवल उनकी अनुमति से, और केवल जिज्ञासु साधकों के हित में साझा कर रहा हूँ, जिस से जनमानस प्रामाणिक वैदिक साधनाओं की वास्तविक और प्रत्यक्ष शक्ति को समझ सकें।
साधना भी कर्म है
साधनाएँ जीवन से अलग नहीं हैं—
वे स्वयं कर्म हैं।
परंतु एक सत्य बिना किसी अपवाद के स्मरण रखना चाहिए
यम और नियम के पालन के बिना साधनाएँ पूर्ण फल नहीं देतीं।
नैतिक आचरण, अनुशासन, संयम, विचारों की शुद्धता और मानवीय उत्तरदायित्व—
ये सभी अनिवार्य आधार हैं।
हिंदू जीवन पद्धति
वैदिक साधनाओं में लगाया गया समय कभी व्यर्थ नहीं जाता।
यह सनातन हिंदू जीवन पद्धति है—
जिसका उद्देश्य है—
बुद्धि का विकास
जीवन की रक्षा
समृद्धि
और परिस्थितियों पर आंतरिक नियंत्रण
जो इस मार्ग पर निष्ठा से चलता है, वह समस्याओं से भागता नहीं— व्यक्ति समस्याओं से आगे कदम बढाता जाता है।
पंथ और अखाड़े
अखाड़े और विभिन्न संप्रदाय संभवतः वे संस्थाएँ रही हैं जिन्होंने पिछले कई शताब्दियों के दौरान सनातन धर्म के ज्ञान, साधनाओं और प्रणालियों को मौन रूप से जीवित रखने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उनका अपार योगदान किसी भी प्रकार से आँकड़ों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
दोनों ने सनातन विरासत के विशिष्ट क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
सनातन हिंदू ग्रंथों में निहित ज्ञान इतना विशाल है कि उसे एकत्र करना, आत्मसात करना और बड़े पैमाने पर जनसाधारण तक पहुँचाना सदैव एक अत्यंत कठिन कार्य रहा है।
लगभग 800 वर्ष पूर्व तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों के विनाश के बाद, केवल अखाड़े और संप्रदाय ही ऐसे संस्थान रहे जिन्होंने शास्त्रों में निहित इस अपार ज्ञान को वास्तविक मानव जीवन में उसके व्यावहारिक उपयोग सहित आगे बढ़ाया।
ज्ञान की जटिलता और व्यापकता के कारण, उन्होंने उदाहरण के लिए कुछ चुनिंदा साधनाओं और कुछ विशेष प्रथाओं पर ही ध्यान केंद्रित किया।
हालाँकि, मूलभूत शिक्षाएँ प्राचीन ग्रंथों में वर्णित रूप में निरंतर चलती रहीं।
बौद्ध धर्म ने भी साधनाओं का एक सीमित समूह अपनाया, किंतु उन्होने भी वही मूलभूत सिद्धांत अपनाए जो सनातन हिंदू ग्रंथों में वर्णित हैं, यद्यपि कुछ हद तक सीमित रूप में।
पिछली कुछ शताब्दियों में, विशेषकर समकालीन भारत में, संप्रदायों और अखाड़ों द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोणों में मूलभूत परिवर्तन आए हैं और उनके मत अधिक कठोर हो गए हैं। फिर भी, इनके अनुयायियों की संख्या आज भी अत्यंत विशाल है।
सनातन हिंदू ग्रंथों में वर्णित साधनाएँ और अन्य अभ्यास इतने शक्तिशाली हैं कि जीवनकाल में उनमें से कुछ ही कर लेने पर भी व्यक्ति के जीवन में गहन और सकारात्मक परिवर्तन आ जाते हैं।
सभी साधनाएँ समान रूप से शक्तिशाली हैं।
कोई भी देवी या देवता बड़ा या छोटा, ऊँचा या नीचा नहीं है। उनकी साधनाओं की शक्ति समान है।
और स्मरण रखें—सभी देवी-देवताओं की की गई साधनाएँ अंततः परम पुरुष परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण तक ही पहुँचती हैं। यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है।
हिंदू शास्त्रों में पाँच आगम माने गए हैं, ये हैं
गणपत्य
शाक्त
शैव
वैष्णव और
सौर
श्री देवी भागवत पुराण इन आगमों के अनुसार साधनाएँ करने की संस्तुति करता है।
मैंने प्राचीन ग्रंथ जैस महा इंद्रजाल इत्यादि का भी अध्ययन किया है। किंतु यह ग्रंथ मुख्यतः विभिन्न अन्य ग्रंथों—जैसे मंत्र महार्णव, शाबर तंत्र तथा कुछ तथाकथित “ब्लैक मैजिक तंत्र” ग्रंथों—की साधनाओं का मिश्रण है।
वर्तमान में उपलब्ध कुछ पुस्तकें/ग्रंथ
ब्लैक मैजिक तंत्र भी वास्तव में वाम मार्गीय ग्रंथ-संग्रहों से विकृत रूप में ली गई साधनाओं का मिश्रण है। परंतु जैसा कि श्री देवी भागवत पुराण में कहा गया है, वाम साधनाओं में नहीं पड़ना चाहिए और जीवन की उन्नति हेतु उपर्युक्त आगम साधनाओं पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
ऐसी साधनाओं का एक उत्कृष्ट स्रोत मंत्र महोदधि है। कुछ महत्वपूर्ण और उपयोगी ग्रंथ निम्नलिखित हैं
मंत्र महोदधि:
यह महत्वपूर्ण ग्रंथ गणेश साधनाएँ, काली सुमुखी, तारा साधना, छिन्नमस्ता साधना, यक्षिणी साधनाएँ, अन्नपूर्णा मंत्र, बगलामुखी साधना, श्रीविद्या, त्रिपुर सुंदरी, गोपाल सुंदरी, हनुमंत साधनाएँ, विष्णु-गरुड़ मंत्र, सूर्य, शिवादि, कालरात्रि चंडी मंत्र आदि के साथ-साथ अत्यंत विस्तृत ज्ञान प्रदान करता है।
तंत्रराज तंत्र:
यह ग्रंथ दो खंडों में उपलब्ध है और इसमें श्रीयंत्र, उसके अंकन तथा साधना विधि का विस्तृत वर्णन है। इसके साथ ललिता, षोडशी, भगमालिनी, भैरुंड आदि अनेक साधनाओं का पूर्ण विवरण भी मिलता है।
रुद्रयामलम्
यह भी दो खंडों में उपलब्ध है और इसमें कुलाचार विधि, षट्चक्र भेदन, योग विद्या आदि का अत्यंत विस्तार से वर्णन किया गया है। इसका संक्षिप्त वर्णन यहाँ संभव नहीं है।
सांख्यायन तंत्रम्:
यह ग्रंथ श्री बगलामुखी विद्या से संबंधित है, जो शत्रु विनाश हेतु एक अत्यंत महत्वपूर्ण ज्ञान-क्षेत्र है।
जिन पाठकों ने रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिकों में विभिन्न प्रकार के बाणों का वर्णन देखा होगा, उन्होंने सामूहिक शत्रु विनाश हेतु प्रयुक्त कुछ रहस्यमय और शक्तिशाली बाणों का भी उल्लेख देखा होगा। वास्तव में ये बाण नहीं, बल्कि मंत्र हैं।
इन मंत्रों की सिद्धि इतनी शक्तिशाली होती है कि वे शत्रुओं के समूह का नाश कर सकती हैं।
किन्तु गुरु के उचित मार्गदर्शन के बिना इन मंत्रों का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। यदि ये मंत्र विधिवत न किए जाएँ तो साधक स्वयं के विनाश का कारण बन सकते हैं। अतः इनके प्रयोग में अत्यंत सावधानी आवश्यक है।
ऐसे सैकड़ों अन्य ग्रंथ भी उपलब्ध हैं।
परंतु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि साधक का आचरण शुद्ध नहीं है—अर्थात वह मानव होने के पाँच मूल सिद्धांतों का पालन नहीं करता—तो ये सभी साधनाएँ फलदायी नहीं होंगी।
तंत्र प्रणाली को बदनाम इसलिए किया गया क्योंकि जब ज्ञान का सुव्यवस्थित प्रसार नहीं रहा, तब लोगों ने इनका अंधाधुंध प्रयोग शुरू कर दिया।
कुछ गिने-चुने लोगों को कुछ परिणाम अवश्य मिले, परंतु समग्र रूप से इससे इस महान ज्ञान को ही बदनामी मिली।
पुस्तक प्रदर्शनियों में भी अवश्य जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ विविध प्रकार की पुस्तकों को देखने और प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
परन्तु प्रारम्भ करने के लिये एक निश्चित स्थान अनिवार्य है। गुरू दीक्षा के पश्चात कुछ आगे बढ़ने पर आप को यह मार्ग स्वतः ही स्पष्ट होने लगेगा। इस कारण बिना विलम्ब गुरू दीक्षा लें।