सनातन धर्म का वैज्ञानिक आधार
विश्व के समस्त मानव समाजों ने सदैव अपने संचालन के लिये अतीत के कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित किया है।
आधुनिक समाज विश्वभर में मुख्यतः कार्ल मार्क्स द्वारा स्थापित आधारों तथा बाद में डार्विन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत व विचारों का अनुसरण कर रहे हैं।
वैश्विक समाज इन्हीं सिद्धांतों के भीतर और इनसे विकसित हुए हैं तथा उनके आधारभूत अवधारणाओं की समझ से निकाले गए निष्कर्षों और व्युत्पत्तियों के अनुसार अपने व्यवहार और कार्यप्रणाली को अपनाया है।
इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिन समाजों ने कार्ल मार्क्स या डार्विन के सिद्धांतों का अनुसरण किया, उनके पास प्राचीन सिद्धांतों या ग्रंथों का कोई विस्तृत आधार नहीं था। केवल एक बाइबल के तथा कुछ अन्य ऐसे ग्रंथों के जो लगभग दो हजार वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं हैं उनको ही आधार बनाया गया।
आधुनिक विज्ञान द्वारा व्यापक रूप से प्रचारित विचार यह है कि मानव सभ्यता विभिन्न युगों जैसे पाषाण युग, हिम युग, लौह युग आदि से होकर विकसित हुई है और सहस्राब्दियों में विकसित होकर वर्तमान उन्नति के स्तर तक पहुँची है। अतः आधुनिक विज्ञान के अनुसार आज की आधुनिक समाज-व्यवस्था इस पृथ्वी पर अब तक अस्तित्व में रही सबसे उन्नत सभ्यता है।
इन अवधारणाओं पर विश्वास करते हुए और इन विचारों की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए, आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान का बड़ा भाग भी इन्हीं सिद्धांतों की प्रामाणिकता सिद्ध करने में केंद्रित रहा है, जो कार्ल मार्क्स और डार्विन द्वारा प्रस्तुत किए गए थे।
भौतिक रूप से अधिक शक्तिशाली आधुनिक समाज, जिनमें औपनिवेशिक मानसिकता विद्यमान है और जो इन अवधारणाओं में विश्वास रखते हैं, वे गुप्त रूप से और कभी-कभी कठोरता से भी अपनी श्रेष्ठता को अन्य राष्ट्रों और समुदायों पर थोपने का प्रयास करते रहे हैं — नए-नए हथियारों के विकास और उपयोग, छल, रिश्वत या सीधे असत्य के माध्यम से।
यह जबरन श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास वर्तमान समय तक चल रहा है।
हिन्दू सनातन संस्कृति, दर्शन और ज्ञान
पिछले लगभग एक हज़ार से अधिक वर्षों के समयकाल में, अन्य संस्कृतियों के साथ-साथ हिन्दू संस्कृति, उसका दर्शन और ज्ञान भी अत्यधिक रूप से दमन का शिकार हुआ है। सनातन हिन्दू विचारधारा को दबाने के लिए अनेक उपाय अपनाए गए, जैसे — सामूहिक नरसंहार, धर्मांतरण, प्राचीन ग्रंथों का विनाश, भारत का विभाजन, प्राचीन हिन्दू ग्रंथों का अवमूल्यन, प्राचीन हिन्दू भाषाओं का स्तर गिराना, पारंपरिक शिक्षण संस्थानों को बंद कराना, तथा नई पाश्चात्य मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रणालियों की स्थापना इत्यादि।
किन्तु प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में निहित ज्ञान की शक्ति तथा हिन्दू समाजों के कार्य-व्यवहार और संस्कृति में उसके मूलभूत सिद्धांतों के स्वाभाविक समावेश के कारण सनातन हिन्दू दर्शन, संस्कृति और ज्ञान का अस्तित्व बना रहा है।
परन्तु हिन्दू समाज इस कारण इस प्राचीन हिन्दु ज्ञान के एक बड़े और महत्वपूर्ण भाग से वंचित हो गया, जो कि वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत उन्नत है, और जो औपनिवेशिक शासन तथा मुस्लिम आक्रमणकारियों की समझ से परे रहा।
हिन्दु विद्वान
अधिकांश हिन्दू विद्वान जिन्होंने प्राचीन हिन्दु ग्रंथों का अध्ययन किया, वे मुख्यतः संस्कृत या हिन्दी भाषा के विद्वान थे, जिनके पास विज्ञान विशेषकर आधुनिक विज्ञान के अनुसंधान और विकास का सीमित अथवा कोई ज्ञान नहीं था। इसलिए उनका आंकलन भाषा अथवा भक्ति पर केंद्रित रहा।
प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में निहित उन्नत विज्ञान या तो उनके द्वारा समझा नहीं गया या फिर उसका त्रुटिपूर्ण अनुवाद किया गया। अनेक विद्वानों ने इन ग्रंथों का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टिकोण से किया, जिससे उनकी समझ कुछ विशेष साधनाओं और ईश्वर-पूजन तक ही सीमित रही। हिन्दू ग्रंथों में अनेक देवी-देवताओं की उपस्थिति ने इस भ्रम को और बढ़ा दिया।
पाश्चात्य विद्वानों ने भी हिन्दू ग्रंथों का अध्ययन पूर्वनिर्धारित धारणाओं के साथ किया और भाषा, देवताओं तथा धर्म से आगे जाकर अन्वेषण नहीं किया। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि केवल कुछ ही पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने इन ग्रंथों का अध्ययन किया। फिर भी, जिन वैज्ञानिकों ने भी इनका अध्ययन किया, वे इनमें निहित ज्ञान की अल्प समझ से ही अत्यंत प्रभावित और आश्चर्यचकित हुए।
समकालीन भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिक्रिया भी इसी प्रकार रही है।
हिन्दू ग्रंथों में निहित ज्ञान इतना व्यापक और वैज्ञानिक रूप से उन्नत है कि केवल एक-दो ग्रंथों के पढ़ने से समग्र समझ प्राप्त नहीं होती। अनेक ग्रंथों का व्यापक अध्ययन आवश्यक है। अधिकांश हिन्दू वैज्ञानिक विद्वानों ने भी इन ग्रंथों के व्यापक अध्ययन को वृद्धावस्था के लिए टाल दिया, यह मानते हुए कि ये ग्रंथ धार्मिक प्रकृति के हैं, और इस कारण वे कुछ सीमित ग्रंथों से आगे नहीं बढ़ सके।
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि क्युँकि किसी भी समकालीन विद्वान द्वारा व्यापक ज्ञान प्राप्त नहीं किया गया, इसलिए भारत की स्वतंत्रता के पश्चात भी सनातन शिक्षा का एक समग्र, संगठित तंत्र विकसित नहीं हो सका।
स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात अनेक संप्रदाय उभरे, जिन्होंने सनातन ज्ञान के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। किन्तु उन्होंने भी अपने ध्यान को कुछ सीमित अवधारणाओं और वैदिक अनुष्ठानों तक ही केंद्रित रखा और सनातन दर्शन की व्यापकता को प्रस्तुत नहीं कर सके।
वर्तमान स्थिति
औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा निर्मित ढाँचे और मैकाले द्वारा निर्धारित मार्ग के अनुसार, अंग्रेज़ बड़े पैमाने पर हिन्दू समाज के मानसिक ढाँचे को परिवर्तित करने में सफल रहे। तथापि उनका व्यापक लक्ष्य, सनातन हिन्दू दर्शन और चिंतन के पूर्ण क्षरण का, सनातन ज्ञान की अपार शक्ति के कारण पूर्णतः सफल नहीं हो सका।
एक ओर पश्चिमी जगत की धन-संपन्नता और भौतिक प्रगति का आकर्षण, और दूसरी ओर हिन्दू संस्कृति के गहन और शक्तिशाली मूल सिद्धांत — इन दोनों के बीच वर्तमान हिन्दु समाज और उसकी सोच फँसी हुई हैं, मानो मध्य में लटकी हुई हों, और यह निर्णय करने में असमर्थ हैं कि किस मार्ग का अनुसरण किया जाए। क्या पश्चिम का अनुसरण उसके धन और भौतिक चमक के कारण किया जाए, अथवा हिन्दू विचारधारा को अपनाया जाए?
अपार विस्तृत हिन्दू ज्ञान अब वर्ष में कुछ सीमित कर्मकाण्डों तक सिमटकर रह गया है। अधिकांश लोग कथा-वाचकों को सुनते हैं, या शिक्षित वर्ग वेदांत जैसे विषयों पर उच्च स्तरीय आध्यात्मिक प्रवचनों में भाग लेते हैं। किन्तु घर लौटने पर अधिकांश लोग वहीं के वहीं रहते हैं , न तो उनके ज्ञान में विस्तार होता है और न ही उनकी मानसिकता में कोई परिवर्तन आता है न ही उन्हे अनुष्ठानों इत्यादि का महत्व समझ आता है।
हिन्दू ग्रंथों में निहित ज्ञान और वास्तविक दैनिक जीवन के बीच कोई स्पष्ट संबंध दिखाई नहीं देता।
लोग प्रवचनों से अत्यधिक प्रभावित हो जाते हैं, क्योंकि वक्ता जटिल संस्कृत श्लोकों का प्रयोग करते हैं या अपने बाह्य वेश-भूषा से प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इंटरनेट पर लगभग प्रत्येक दूसरा व्यक्ति थोड़ा-बहुत ज्ञान प्राप्त कर दाढ़ी बढ़ा लेता है, तिलक लगा लेता है, केसरिया वस्त्र धारण कर लेता है और उपदेश देना प्रारंभ कर देता है। सरल-स्वभाव का जनमानस, जो स्वयं भी अधिक ज्ञान नहीं रखता इन व्यक्तियों को लाखों यूट्यूब दर्शनों से पुरस्कृत करती है।
सनातन धर्म के वैज्ञानिक आधार
जब हम उन्हीं प्राचीन हिन्दू ग्रंथों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करते हैं, तो एक बिल्कुल भिन्न चित्रण सामने आता है। सनातन ज्ञान के इन मूलभूत वैज्ञानिक सत्य को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यदि इन्हें नहीं समझा गया, तो लोग भले ही व्यापक रूप से शास्त्रों का अध्ययन करें, फिर भी सम्पूर्ण सनातन हिन्दू विज्ञान उनकी समझ से परे ही रहेगा।
नीचे जो सार प्रस्तुत किया गया है, वह किसी एक ग्रंथ से नहीं, अपितु 600 से अधिक ग्रंथों के अध्ययन और शोध का निष्कर्ष है। यहाँ वर्णित प्रत्येक तथ्य के लिए विभिन्न महत्वपूर्ण शास्त्रों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संदर्भ उपलब्ध हैं। साथ ही ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए हैं जिन्हें वर्तमान समय में कोई भी खंडित नहीं कर सकता।
जब तक हम सनातन ग्रंथों में बताई गई अपनी मूलभूत सृष्टि से अवगत नहीं होते, तब तक हमें न तो सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों का महत्व समझ में आ सकता है और न ही हम वैदिक प्रक्रियाओं व अनुष्ठानो का महत्व समझ सकते हैं।
तो सब से पहले हमें अपनी मूलभूत सृष्टि को समझने की आवश्यकता है। यही सनातन ग्रंथों में विस्तार से बताई गई है।
यह ग्रंथों में बताई गई सृष्टि रचना आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रस्तावित डार्विन इत्यादि के सिद्धांतों से कहीं अधिक उन्नत व वैज्ञानिक है। इस को समझ कर आपके जीवन सम्बंधित समस्याओं सम्बंधित अनेकों प्रश्नों के उत्तर स्वतः ही प्राप्त हो जायेंगे।
मूलभूत प्रश्न
१. भौतिक संसार से भी पहले क्या था?
सनातन ज्ञान के मूल सिद्धांत भौतिक संसार से आरम्भ नहीं होते। ये सिद्धांत भौतिक जगत से पहले, यहाँ तक कि ऊर्जा और प्रकाश से भी पूर्व के स्तर से प्रारम्भ होते हैं। आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रस्तावित “बिग बैंग” जैसी अवधारणा हिन्दू ग्रंथों में भी वर्णित है। अण्ड विभाजन अवश्य आता है। इन अवधारणाओं को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये “जीवन का आधार और उद्देश्य” जैसे मूल प्रश्नों को निर्धारित करती हैं।
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२. एक परम ईश्वर का वैज्ञानिक प्रमाण क्या है?
ये सिद्धांत सनातन ग्रंथों में वर्णित “एक परम ईश्वर” की अवधारणा को भी परिभाषित करते हैं, और यह पूर्णतः वैज्ञानिक है तथा आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की नवीनतम प्रगति के अनुरूप है। अतः ईश्वर के अस्तित्व के विषय में जो अनिश्चितता है, वह समाप्त हो जाती है।
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३. चेतना का मूलभूत प्रश्न व इस का समाधान क्या है?
एक अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक समस्या, जिसे पाश्चात्य विचारधारा अभी तक सुलझा नहीं पाई है, वह है चेतना का प्रश्न। किन्तु प्राचीन हिन्दू अवधारणाएँ स्पष्ट और वैज्ञानिक रूप से यह बताती हैं कि चेतना केवल मनुष्यों में ही नहीं, अपितु समस्त जीवों में किस प्रकार विद्यमान है।
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समय की अवधारणा।
वास्तव में समय क्या है?
हिन्दू ग्रंथ समय की अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं, जो आधुनिक विज्ञान के लिए अभी भी जटिल बनी हुई है। हिन्दु ग्रंथों में समय को बहुआयामी रूप में समझाया गया है।
प्राचीन शास्त्र लगभग 38 लाख वर्षों के हिन्दू इतिहास का भी वर्णन करते हैं। यह आश्चर्यजनक लग सकता है, किन्तु ग्रंथों के अनुसार भगवान राम का जन्म लगभग 21 लाख वर्ष पूर्व हुआ और भगवान कृष्ण का जन्म लगभग 1 लाख वर्ष पूर्व हुआ। यह कोई कल्पना नहीं है। यह पूर्णतया हमारे भारतीय ग्रंथों में दिये गये संपूर्ण इतिहास, राजाओं के नाम, उनके जीवनकाल और उत्तराधिकार के विवरण सहित वर्णित है व उसी के आधार पर है जिसे समकालीन वैज्ञानिकों ने कहांनियाँ बता दिया।
हिन्दू ग्रंथ आदम और हव्वा से लेकर उनकी दस पीढ़ियों तक का इतिहास भी वर्णित करते हैं। इसके पश्चात न्यूह (नोह) और उनके जलप्रलय की संपूर्ण कथा, जहाज़ के ठहरने का स्थान, उनके साथ और कौन-कौन बचा, और जलप्रलय के बाद क्या हुआ — इन सबका विवरण मिलता है।
इन्हीं ग्रंथों में ईसा मसीह के भारत आगमन तथा महामद के वास्तविक इतिहास का भी वर्णन मिलता है।
इन वैदिक अवधारणाओं को समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ये सृष्टि के वास्तविक प्रारंभ को परिभाषित करती हैं। आप यह सोच सकते हैं कि इसे समझने की आवश्यकता क्यों है?
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वर्तमान समझ
क्या आप जानते हैं कि आज जिस आधार पर संपूर्ण विश्व चल रहा है और जिनके कारण गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं जैसे कि “जीवन एक संघर्ष है”, “जीवन एक दौड़ है”, और “जो इस दौड़ में जीतता है वही जीवित रहता है” ये सभी सिद्धांत डार्विन के विकासवाद से उत्पन्न हुए हैं।
वर्तमान आधुनिक वैज्ञानिक धारणायें वैज्ञानिक रूप से अप्रमाणित सिद्ध हो चुकि हैं और अब यह सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से असत्य सिद्ध हो चुका है, फिर भी यह सिद्धांत आज भी विश्वभर के चिकित्सा पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है।
पृथ्वी की लगभग पूरी जनसंख्या इस सिद्धांत को जीवन के मूल आधार के रूप में मानती है। परंतु जब यह सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से असत्य सिद्ध हो चुका है, तो अब आधुनिक विज्ञान और विश्व के अरबों लोगों की समझ कहाँ खड़ी है?
क्या इसका कोई वैकल्पिक सिद्धांत है?
सृष्टि का एकमात्र वैकल्पिक सिद्धांत वही है जो प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में वर्णित है।
यह ज्ञान ऐसा है जो ईश्वर, मानव जीवन, पुनर्जन्म, भाग्य आदि से संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर देता है और उन सभी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करता है जिन्हें आधुनिक विज्ञान अभी तक सुलझा नहीं पाया है।
हिन्दु ग्रंथों की सबसे मूलभूत अवधारणा
वैज्ञानिकों ने भौतिक पदार्थ को उसके सबसे सूक्ष्म कणों तक विभाजित किया है। पहले वे अणुओं तक पहुँचे, फिर परमाणुओं तक, फिर न्यूट्रॉन, प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन तक, और अब उनसे भी छोटे कणों — क्वार्क और लेप्टॉन तक। इसके अतिरिक्त बोसॉन नामक कणों का एक पृथक समूह है, जो बल-वाहक होते हैं। इन सभी का विस्तृत अध्ययन कण भौतिकी के मानक मॉडल (Standard Model of Particle Physics) में किया जा सकता है।
ये सभी एक सार्वभौमिक क्षेत्र से उत्पन्न होते हैं। बिग बैंग के पश्चात भार रहित कणों की उत्पत्ती हुई। एक अन्य क्षेत्र जिसे “हिग्स क्षेत्र” कहा जाता है उसने इन कणों को भार प्रदान किया। इस क्षेत्र की खोज तक पहुँचने में वैज्ञानिकों को लगभग सत्तर वर्षों का समय लगा, और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण 2012 में प्राप्त हुआ।
हिन्दु ग्रंथों में एक सार्वभौमिक क्षेत्र जिस से समस्त जीवन उत्पन्न हुआ
प्राचीन हिन्दू ग्रंथ भी एक ऐसे सार्वभौमिक क्षेत्र का विस्तृत वर्णन करते हैं, जिससे सम्पूर्ण भौतिक जगत — आप और हम — उत्पन्न हुए हैं। इस क्षेत्र को “ब्रह्म का क्षेत्र” कहा गया है।
ब्रह्म ही परम पुरुष पिता परमेश्वर
ब्रह्म को ही भारतीय हिन्दु ग्रंथों में परम ईश्वर बताया गया है। क्युंकि आधुनिक विज्ञान भी समस्त भौतिक पदार्थ यानि इस जगत की सृष्टि एक सार्वभौमिक क्षेत्र द्वारा बताता है, तो यह दोनो क्षेत्र सम्भवता एक ही हुये। इसी क्षेत्र को हिन्दु ग्रंथों में ईश्वर बताया गया है। तो क्या इस प्रकार वैज्ञानिक रूप से ईश्वर का आस्तित्व सिद्ध नहीं हुआ? कदाचित आधुनिक विज्ञान ने भगवान का आस्तित्व सिद्ध कर दिया है? हिन्दु ग्रंथों में इस विषय का अति विस्तार से वर्णन है।
ब्रह्म का अत्यन्त विस्तार से वर्णन
हिन्दू शास्त्रीय ज्ञान इस क्षेत्र को और भी गहराई से समझाता है। इस प्रकार का विवरण केवल हिन्दु ग्रन्थों में विस्तार से मिलता है। और यह इस प्रकार हैः
यह क्षेत्र आगे दो भागों में विभाजित है
१. एक प्राथमिक क्षेत्र, जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थ का निर्माण करता है,
२. और दूसरा क्षेत्र, जो सभी जीवों में चेतना प्रदान करता है।
यह चेतना का क्षेत्र आगे तीन भागों में विभाजित होता है
(२क) पहला, जो चेतना प्रदान करता है,
(२ख) दूसरा, जो बुद्धि प्रदान करता है,
(२ग) और तीसरा, ज्ञान का क्षेत्र है जो कि कर्मों का लेखा जोखा रखता है
यह ज्ञान का क्षेत्र, ब्रह्म के प्राथमिक क्षेत्र और तीन गुणों के साथ अंतःक्रिया करके बुद्धि का क्षेत्र उत्पन्न करता है। ज्ञान के क्षेत्र में ही समस्त विश्व के मानवों के कर्मों का लेखा जोखा अनादिकाल से समाहित है।
यह बुद्धि का क्षेत्र भी तीन प्रकार की बुद्धि से बना होता है:
• वैकारिक बुद्धि
• तैजस बुद्धि
• तामस बुद्धि
१. वैकारिक बुद्धि ज्ञान उत्पन्न करने की शक्ति प्रदान करती है।
२. तैजस बुद्धि क्रिया की शक्ति प्रदान करती है।
३. तमस बुद्धि भौतिक पदार्थ व भौतिक जगत का निर्माण करती है, जैसा कि ऊपर वर्णित है।
भौतिक पदार्थ की सृष्टि
ग्रंथों के अनुसार भौतिक पदार्थ केवल अपने आप उत्पन्न नहीं होता, अपितु इसके साथ दो अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण सृजनात्मक तत्व भी उत्पन्न होते हैं।स्मरण रखें कि संपूर्ण सृष्टि का कोई अर्थ नहीं है यदि इन्द्रियाँ और वाणी न हों। और वाणी के लिए भाषा आवश्यक है।
अतः ये दोनों महत्वपूर्ण सृजनात्मक तत्व भौतिक पदार्थों के साथ ही उत्पन्न होते हैं।
भौतिक पदार्थ स्वयं भी पाँच चरणों में उत्पन्न होता है। इस प्रकार भौतिक पदार्थों के पाँच अत्यंत महत्वपूर्ण घटक होते हैं।
भौतिक पदार्थ का प्रथम घटक ऐसा है जिसे आधुनिक विज्ञान ने किसी भी तत्व का स्वाभाविक गुण नहीं माना है। इसका निकटतम उदाहरण किसी पदार्थ का विशिष्ट गुरुत्व (Specific Gravity) हो सकता है। किन्तु हिन्दू शास्त्रों में वर्णित यह पहला गुण है — आकाश यानि कि Volume। कोई भी इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकता कि बिना Volume के कोई पदार्थ अस्तित्व में नहीं आ सकता। बिना Volume के भौतिक पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। प्राचीन हिन्दू ग्रंथ भौतिक पदार्थ की सृष्टि के प्रथम चरण के रूप में आकाश यानि Volume का वर्णन करते हैं।
और आकाश भी अकेले उत्पन्न नहीं होता। इन्द्रियों और इन्द्रियों के गुणों की सृष्टि भी भौतिक पदार्थ के साथ ही आरम्भ होती है। आकाश के साथ उत्पन्न होने वाली पहली “इन्द्रिय” है वाणी और वाणी बनती है शब्द से यानि (अक्षर) यानि भाषा से।
यह सृष्टि की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है शब्द — अक्षर। अक्षर भाषा का मूल आधार है, जिससे वाणी उत्पन्न होती है।
स्मरण रखें कि ये सभी घटक किसी भी भौतिक जीवन के लिए अनिवार्य हैं, और हिन्दू शास्त्र इसे ‘भौतिक शक्ति’ (Material Power) के रूप में परिभाषित करते हैं, जो तमस बुद्धि से उत्पन्न होती है।
दूसरा चरण भौतिक पदार्थ की सृष्टि का है — वायुरूप (गैसीय) पदार्थ। इसके साथ ही स्पर्श की इन्द्रिय उत्पन्न होती है। यह कल्पना करना कठिन है कि जीवित शरीर के बिना स्पर्श की इन्द्रिय कैसे हो सकती है, किन्तु पहले हमें सृष्टि के इन पाँच चरणों को समझना चाहिए। गैसीय पदार्थ के गुणों को अक्षर और स्पर्श के रूप में वर्णित किया गया है।
तीसरा चरण है — तेज (प्रकाश)। इसके साथ ही दृष्टि (रूप देखने की क्षमता) उत्पन्न होती है। दृष्टि, आकाश और स्पर्श के माध्यम से ही किसी वस्तु के रूप को जाना जा सकता है। रूप के गुणों को अक्षर + स्पर्श + रूप के रूप में बताया गया है। यह भी नोट करें कि बिना प्रकाश के कुछ भी दृष्टय नहीं हो सकता।
चौथा चरण है — जल यानि कि द्रव (तरल पदार्थ)। इसके साथ ही रस (स्वाद) की इन्द्रिय उत्पन्न होती है। ध्यान रखें कि बिना द्रव के किसी वस्तु का स्वाद लेना संभव नहीं है। तरल पदार्थ के गुण हैं — अक्षर + स्पर्श + रूप + रस।
पाँचवाँ चरण है — ठोस पदार्थ की सृष्टि। इसके साथ ही गंध (सुगंध/दुर्गंध) की इन्द्रिय उत्पन्न होती है। ठोस पदार्थ के गुण हैं — अक्षर + स्पर्श + रूप + रस + गंध।
इस प्रकार हिन्दू शास्त्रों में भौतिक पदार्थ की सृष्टि को अत्यंत जटिल और सूक्ष्म रूप से वर्णित किया गया है। यह आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों से भी आगे के अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक विचार हैं। स्मरण रखें कि यहाँ हम ‘भौतिक शक्ति’ की सृष्टि की चर्चा कर रहे हैं, जो तामस बुद्धि से उत्पन्न होती है।
आधुनिक विज्ञान अभी भी यह मानता है कि किसी भी माध्यम से अणु एकत्र होकर किसी प्रकार से जीवित प्राणी बन गए। हिन्दू ग्रंथों में ऐसा कोई कथन नहीं है।
पृथ्वी पर जीवन का आगमन
पृथ्वी पर जीवन के आगमन के विषय में हिन्दू शास्त्रों का दृष्टिकोण अत्यंत अद्भुत है — रूपकात्मक भी और शास्त्रीय संकेतों के माध्यम से भी।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में संकेत दिया है कि वे ही पृथ्वी पर जीवन का “बीज” प्रदान करते हैं। अन्य स्थानों पर उन्होंने यह भी कहा है कि ‘भौतिक जीवन’ की उत्पत्ति अज्ञात है। अनादि काल से असंख्य ब्रह्माण्डों में जीवन चलता आ रहा है। यह किसी को भी नहीं ज्ञात कि जीवन किस प्रकार उत्पन्न हुआ। किन्तु सभी जीवन का बीज वे, भगवान कृष्ण ही प्रदान करते हैं।
यह अद्भुत है।
जब कि आधुनिक विज्ञान ने अपनी सारी शक्ति इस शोध में लगा दी कि जीवन किस प्रकार उत्पन्न हुआ, हिन्दु ग्रंथ जीवन की उत्पत्ति की बात ही नहीं करते, अपितु जीवन के आगमन की चर्चा करते हैं।
तो पृथ्वि पर यह जीवन के आगमन की प्रक्रिया कैसे होती है?
हिन्दू शास्त्रों में यह कहीं नहीं कहा गया कि पृथ्वी पर जीवन “सृजित” किया गया। किन्तु श्रीकृष्ण द्वारा जीवन के “बीज” प्रदान करने का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।
इसे समझने के लिए हमें पृथ्वी पर जीवन के “प्रवेश” (Introduction) की प्रक्रिया को पूर्णतः समझना होगा।
पृथ्वी पर जीवन का प्रवेश
इसके विपरीत, पृथ्वी पर जीवन के प्रारम्भिक प्रवेश का वर्णन हिन्दू शास्त्रों में दस चरणों में किया गया है। यह कोई सरल प्रक्रिया नहीं है कि किसी प्रकार जटिल जीव स्वतः बन गए और उनसे उच्च जीवन विकसित हो गया। हिन्दू ग्रंथों में जो वर्णन मिलता है, वह अत्यंत जटिल है और उसे केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा समग्र समझ के साथ ही समझा जा सकता है।
नीचे दिया गया आरेख पृथ्वी पर जीवन के प्रवेश की इस संपूर्ण प्रक्रिया को स्पष्ट करेगा।
पृथ्वी पर जीवन का प्रवेश (Introduction of Life on Earth)
जब जीवन की भौतिक संरचना पूर्ण रूप से निर्मित हो जाती है, तब पृथ्वी पर जीवन का “प्रवेश” कराया जाता है। यहाँ मैं “सृजन (Creation)” शब्द के स्थान पर “प्रवेश (Introduction)” शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण हैं।
सृजन की प्रक्रिया केवल भौतिक पदार्थों के सभी रूपों तक ही सीमित बताई गई है। उसके बाद जीवन को कभी “सृजित” नहीं कहा गया, अपितु हिन्दु ग्रंथों के अनुसार उसे “प्रविष्ट” किया गया बताया गया है।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं जब वे कहते हैं कि वे ही पृथ्वी पर जीवन का “बीज” प्रदान करते हैं।
यद्यपि प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में अनेक स्थानों पर विमानों या शक्तिशाली आकाशीय यानों द्वारा यात्रा का उल्लेख मिलता है, किन्तु यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि भगवान श्रीकृष्ण जीवन का “बीज” पृथ्वी पर कैसे प्रदान करते हैं।
किन्तु उपर्युक्त सृष्टि-क्रम को देखें तो स्पष्ट होता है कि प्रारम्भिक चरण में केवल वनस्पति का प्रवेश कराया जाता है। इसके पश्चात सभी पशु-पक्षियों का प्रवेश होता है। और जब संपूर्ण भौतिक आधारभूत संरचना तैयार हो जाती है, तब अंततः मनुष्यों का पृथ्वी पर “प्रवेश” कराया जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी कहा है कि जीवन अनादि काल से ब्रह्माण्ड में निरंतर चलता आ रहा है। जीवन का सृजन कब हुआ यह ज्ञात ही नहीं।
तो फिर भगवान कृष्ण पृथ्वि पर जीवन का “बीज” कैसे प्रदान करते हैं?
यह केवल तभी संभव प्रतीत होता है कि जीवन के बीज अन्य ब्रह्माण्डों से लाकर पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए जाते हों। ऐसा होने की एकमात्र संभावना यही है कि विमानों या प्राचीन आकाशीय यानों के माध्यम से इन बीजों को अन्य लोकों या ब्रह्माण्डों से लाया गया हो।
यह बीज वनस्पतियों पेड़ों पौधों के बीज हम समझ सकते हैं। परन्तु समस्त पशु, पक्षी, कीट- पतंग इत्यादि व मानव। इन के बीज वास्तविक शरीर रूपी माध्यम ही हो सकते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तो वास्तविक रूप से विमान द्वारा यात्रा देवी लोक इत्यादि में स्पष्ट रूप से बताई गई है।
आकाशीय यानों (स्पेसशिप) के दर्शन या उल्लेख लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में किसी न किसी रूप में पाए जाते हैं, जिन्हें आधुनिक काल में भी मानवों के शोधों व खोजों द्वारा प्रमाणित किया गया है संज्ञान में लाया गया है।
प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में अन्य लोकों और ब्रह्माण्डों की यात्राओं का विस्तृत वर्णन मिलता है, देवताओं के अन्य लोकों से आगमन का भी उल्लेख है, और यह सब श्रीरामायण तथा महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों में भी वर्णित है। महाभारत में भी वर्णन मिलता है कि अर्जुन दिव्य शक्तियाँ प्राप्त करने हेतु अन्य लोकों की यात्रा करते हैं।
अतः संक्षेप में इस पृथ्वी पर जीवन के प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन है न कि सृजन का। यह व्याख्या अधिक वैज्ञानिक प्रतीत होती है, क्योंकि हिन्दू ग्रंथों में “किसी प्रकार” (somehow) जैसा शब्द प्रयोग नहीं किया गया है, जबकि डार्विन के सिद्धांत में इस प्रकार की अस्पष्टता देखी जाती है।
इस प्रकार का अद्भुत विवरण केवल भारतीय हिन्दु ग्रंथों में ही उपलब्ध है और यह आधुनिक विज्ञान की समस्त सीमाओं व ज्ञान से कहीं अधिक विकसित है व वैज्ञानिक है।
पृथ्वि का पूर्ण इतिहास
जब कि आधुनिक विज्ञान सभ्य मानव जीवन को केवल लगभग २०० वर्ष का बताता है, हिन्दु प्राचीन ग्रंथ मानव जीवन वर्तमान मानव जीवन का संदर्भ अरबों वर्षों का बताते हैं।
इस की भी सटीक गणना के अनुसार वर्तमान पृथ्वि की सृष्टि के अभी १,९६,०८,५३,०६८ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। जब की ब्रह्मा की कुल आयु ३१,१०,४०० करोड़ वर्ष की बताई गयी है।
वर्तमान चतुर्युग के भी ३८,९३,०६८ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं व ४,२६,९३२ वर्ष शेष हैं। इस के पश्चात प्रलय होगी व पृथ्वि पर जीवन का समापन होगा।
इन तथ्यों का विस्तार से वर्णन इन विडियो में देखें
जब यह तथ्य हिन्दुओं को भी बताये जाते हैं तो वर्तमान में हिन्दु पाश्चात्य जगत की चकाचौंध में इतने भ्रमित हो चुके हैं, वर्तमान समय में एक हिन्दु सामान्य व्यक्ति का मन इतना विचलित हो चुका है, कि वे भी इन समस्त विज्ञान को कहानियां समझते हैं, कवितायें समझते हैं।
ध्यान दें कि कवितायें सरल भाव प्रदर्शित करती हैं गहन विज्ञान व गणित नहीं।
दूसरा यदि एक सामन्य व्यक्ति यह तथ्य जान भी ले तो उस के जीवन में क्या बदलाव आ जायेगा?
इस प्रकार के तथ्यों की केवल जानकारी यह बताने के लिये है कि हिन्दु ग्रंथों का ज्ञान अत्यधिक गहन है व हिन्दु शास्त्रों में जो सरल तथ्य भी बताये गये हैं, कि जैसे सत्य का पालन करो इत्यादि, वे कितने महत्वपूर्ण हैं व उनको जीवन में उतारना कितना आवश्यक है। और यह भी कि सनातन हिन्दु ग्रंथों का ज्ञान वास्तव में आपका जीवन पूर्ण रूप से परिवर्तित करके सम्पन्नता की ओर ले जाने में पूर्णतया सक्षम है।
इसी प्रकार सनातन हिन्दु ग्रंथों में पृथ्वि का पूर्ण वास्तविक इतिहास विस्तार से बताया गया है। जो सत्य भी है। यह पृथ्वि का इतिहास अरबों खरबों वर्षों का है। जो कि हिन्दुओं से शताब्दियों से छुपाया गया है व मिथ्या बता दिया गया है।
हमारा दूसरा लेख अवश्य पढ़ें जो कि समस्त वैदिक हिन्दु प्रार्थनाओं, साधनाओं, व अन्य प्रक्रियाओं का आधार है