सनातन धर्म व बौद्ध धर्म

आधुनिक काल के अनेक बौद्ध धर्म के विद्वान बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म या सनातन धर्म से पूर्णतः भिन्न विचारधारा और दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।

परंतु इन अवधारणाओं को प्राचीन हिंदू ग्रंथों के परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।

आज हम केवल वर्तमान आधुनिक युग को ही सबसे विकसित युग मानते हैं, क्योंकि आधुनिक पाश्चात्य सिद्धांतकारों के अनुसार इसी काल में मानव ‘सभ्य’ हुआ।

आधुनिक विज्ञान अपने विभिन्न युगों—जैसे पाषाण युग, हिम युग आदि—के सिद्धांतों को अंतिम सत्य मानता है।

इसके विपरीत, प्राचीन भारतीय ग्रंथ पृथ्वी पर मानव सभ्यता का एक पूर्णतया भिन्न चित्रण प्रस्तुत करते हैं।

प्राचीन हिंदू ग्रंथों में वर्तमान पृथ्वी-चक्र के समय काल में विभिन्न राजाओं और सभ्यताओं का ऐतिहासिक विवरण लगभग 38 लाख वर्ष पूर्व तक उपलब्ध है।

ब्रह्मा की कुल आयु 100 वर्ष मानी गई है यानि कि लगभग ब्रह्मा के 36500 दिन।
ब्रह्मा का एक दिन लगभग 1000 चतुर्युगों का होता है।
एक चतुर्युग 43,20,000 पृथ्वि के सौर वर्षों का होता है।

पृथ्वी का वर्तमान जीवन-चक्र ब्रह्मा के 51वें वर्ष के तृतीय दिवस का 28वाँ चक्र है। जी हाँ, हमारे भारतीय प्राचीन ग्रंथों में इतना सटीक विवरण उपलब्ध है।

समय की यह बहुआयामी प्रणाली प्राचीन भारतीय ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है।

इस प्रणालि को समझने के लिये 

यहाँ क्लिक करें

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि वेद और पुराण दोनों की रचना इस सृष्टि के आरंभ में हुई मानी जाती है। यद्यपि इन ग्रंथों को ॠषियों ने कुछ हज़ार वर्ष पूर्व लिपिबद्ध किया होगा, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वेद और पुराणों की उत्पत्ति उसी समय हुई।

कुंडलिनी जागरण की पद्ध्यति में एक अवस्था ऐसी प्राप्त होती है जिस में पूर्ण वैदिक ज्ञान स्वतः ही मस्तिष्क में उतर जाता है। यह एक गहन विज्ञान है जो कि मानव शरीर, मानव बुद्धि, ब्रह्म व चेतना से जुड़ा है।

तो यदि समस्त लिखित ज्ञान सामग्री लुप्त भी हो जाये तो भी समस्त ज्ञान का जागरण सम्भव है।

वेदों को शब्द ब्रह्म भी कहा गया है—अर्थात् स्वयं ब्रह्म या परमेश्वर का शब्द-स्वरूप।

परंतु वेद सामान्य व्यक्ति के लिए सीधे समझना कठिन हैं। इसी कारण पुराणों की रचना की गई, जिस से वेदों की विषय-वस्तु को जीवन से जुड़े उदाहरणों और कथाओं के माध्यम से सरल रूप में समझाया जा सके, तथा साथ ही वेदों के प्रत्यक्ष संदर्भ भी दिए जा सकें।

इसी पृष्ठभूमि में भगवान बुद्ध का उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 1, अध्याय 3, श्लोक 24 में मिलता है—

ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्।
बुद्धो नाम्नाजनसुतः कीकटेषु भविष्यति॥१.३.२४॥


“कलियुग के प्रवर्तन होने पर, देवताओं से द्वेष रखने वालों को मोहित करने के लिए, बुद्ध नाम से अंजन का पुत्र कीकट देश में अवतरित होगा।” (1.3.24)

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि श्रीमद्भागवत पुराण की रचना भगवान बुद्ध के जन्म से बहुत पहले हो चुकी थी, क्योंकि यहाँ भगवान बुद्ध का उल्लेख भविष्य काल में किया गया है।

अग्नि पुराण में भगवान बुद्ध को भगवान कृष्ण का नवम अवतार बताया गया है। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध का उल्लेख मत्स्य पुराण, वराह पुराण, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और पद्म पुराण में भी मिलता है।

इसे और स्पष्ट करने के लिए भगवान कृष्ण के संदर्भ में संक्षिप्त व्याख्या आवश्यक है।

इन पुराणों के अनुसार, उस काल में पशु-बलि अत्यधिक प्रचलित हो गई थी। जनमानस को हिंसा से दूर ले जाने के लिए भगवान कृष्ण ने भगवान बुद्ध के रूप में अवतार लिया।

कुछ लोगों ने नारायण और विराट पुरुष की गलत व्याख्या करके उन्हें भगवान विष्णु मान लिया। जबकि सभी संस्कृत ग्रंथों में विराट पुरुष को स्पष्ट रूप से एकमात्र परमेश्वर—भगवान कृष्ण के रूप में वर्णित किया गया है।

सभी प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अनुसार एक ही परम, शाश्वत, सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं—भगवान कृष्ण। हमारी जैसी अरबों सृष्टियों के लिए पृथक-पृथक ब्रह्मा, विष्णु और महेश होते हैं।

इस प्रकार, बौद्ध धर्म मूलतः सनातन धर्म की एक शाखा के रूप में उत्पन्न हुआ, जिसमें सनातन धर्म के सिद्धांत ही आधार रहे।

भविश्य पुराण के अनुसार भगवान बुद्ध का अवतार लोगों को हिंसक यज्ञ-बलियों से विमुख करने के लिए हुआ। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक मूल अत्यंत गहरे रूप से जुड़े हुए हैं, क्योंकि बौद्ध धर्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में, हिंदू चिंतन की व्यापक परंपरा के भीतर ही विकसित हुआ।

सनातन धर्म व बौद्ध धर्म में मुख्य समानताएँ

• दोनों ही मानव जीवन का परम लक्ष्य मुक्ति को मानते हैं—हिंदू धर्म में मोक्ष और बौद्ध धर्म में निर्वाण।
• दोनों का मूल सिद्धांत कर्म है—कर्म के अनुसार पुनर्जन्म।
• दोनों दुःख-निवारण और मुक्ति के लिए आत्मसंयम, ध्यान, नैतिक जीवन और वैराग्य पर बल देते हैं।
• बौद्ध धर्म ने ध्यान की परंपरा उपनिषदों और योग से ग्रहण की।
• दोनों आत्म-साक्षात्कार और मन की एकाग्रता पर बल देते हैं।
• अहिंसा दोनों में केंद्रीय है। प्राचीन हिंदू ग्रंथों में अहिंसा का अर्थ निर्दोष जीवों की हत्या या पीड़ा न देना है—यह नहीं कि अधर्म के विरुद्ध अंतिम उपाय के रूप में हिंसा कभी न की जाए।
• इसी कारण दोनों परंपराएँ शाकाहार को प्रोत्साहित करती हैं।
• बौद्ध धर्म के पंचशील हिंदू यम-नियमों के समान हैं—हत्या, चोरी, असत्य, व्यभिचार और नशे से दूर रहना।
• दोनों में संन्यास की परंपरा है—संन्यासी, भिक्षु, योगी।
• महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म में अनेक देवता हिंदू देवताओं से मिलते-जुलते हैं—अवलोकितेश्वर (शिव), तारा (देवी)। तारा साधना की उत्पत्ति भी हिंदू ग्रंथों में है।
• मंत्र, यंत्र (बौद्ध धर्म में मंडल), और ॐ—दोनों में समान हैं।
• कुंडलिनी जागरण दोनों परंपराओं में समान रूप से वर्णित है।
• पुनर्जन्म के विभिन्न लोक, स्वर्ग और नरक—दोनों में समान अवधारणाएँ हैं।

प्राचीन सनातन ग्रंथ स्पष्ट करते हैं कि देवता नश्वर हैं; केवल एक ही शाश्वत परमेश्वर हैं—भगवान कृष्ण। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवी-देवताओं की आयु भी ब्रह्मा के सौ वर्षों तक सीमित है।

इस प्रकार बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत और साधनाएँ सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों और साधनाओं से ही उत्पन्न हैं।

सनातन धर्म की मूल साधनाओं में सम्मिलित हैं—

मानव के रूप में जन्म लेकर पहले मानव बनना।
ध्यान का अभ्यास।
मंत्र और यंत्र सहित साधनाएँ (बौद्ध धर्म में इन्हें मंडल कहा गया)।
बौद्ध धर्म के देवता भी वही हैं जो प्राचीन हिंदू ग्रंथों में वर्णित हैं।

आज सनातन धर्म में इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। अंगकोरवाट और दक्षिण-पूर्व एशिया के सैकड़ों मंदिर मूलतः हिंदू मंदिर थे—ब्रह्मा, विष्णु या महेश को समर्पित—जो बाद में बौद्ध विहारों में परिवर्तित हो गए।

बौद्ध या तिब्बती लिपि भी देवनागरी/संस्कृत लिपि से अत्यंत मिलती-जुलती है—ध्वन्यात्मक रूप से भी। तिब्बती स्वर और व्यंजन संस्कृत से लगभग समान हैं। वास्तव में संस्कृत वर्णमाला तिब्बती से अधिक विस्तृत है।

आज पश्चिमी इंडोलॉजी विद्वान संस्कृत को मृत भाषा कहते हैं, जबकि हिंदू परंपरा में स्तोत्र और मंत्र-पाठ आज भी संस्कृत में ही होता है।

संस्कृत के 16 स्वर और 35 व्यंजन—कुल 51 मूल अक्षर—तथा उनकी वैज्ञानिक ध्वनि-रचना तिब्बती लिपि से अत्यंत साम्य रखती है। इतिहास बताता है कि तिब्बती भिक्षु नालंदा, तक्षशिला जैसी हिंदू विश्वविद्यालयों में अध्ययन हेतु आते थे।

बौद्ध या तिब्बती लिपि देवनागरी लिपि से भी निकटता रखती है, अर्थात् संस्कृत से, और निकट से देखने पर इनके फ़ॉन्ट्स में बहुत अधिक समानता दिखाई देती है।

ध्वन्यात्मक रूप से भी अधिकांश अक्षर समान हैं।

स्वर (4 मुख्य स्वतंत्र स्वर + अंतर्निहित “a”): ཨ (a, अंतर्निहित स्वर), ཨི (i), ཨུ (u), ཨེ (e), ཨོ (o)

व्यंजन (30 मूल अक्षर): ཀ ka ཁ kha ག ga ང nga ཅ ca ཆ cha ཇ ja ཉ nya ཏ ta ཐ tha ད da ན na པ pa ཕ pha བ ba མ ma ཙ tsa ཚ tsha ཛ dza ཝ wa ཞ zha ཟ za འ ’a ཡ ya ར ra ལ la ཤ sha ས sa ཧ ha ཨ a

अतिरिक्त अक्षर (बौद्ध ग्रंथों में संस्कृत लिप्यंतरण के लिए प्रयुक्त): ཊ ṭa ཋ ṭha ཌ ḍa ཎ ṇa ཥ ṣa

ध्वन्यात्मक रूप से, स्वर और व्यंजन दोनों ही संस्कृत के स्वरों और व्यंजनों के समान या उनके अत्यंत निकट हैं।

वास्तव में, संस्कृत के स्वरों और व्यंजनों का समूह तिब्बती वर्णमाला की तुलना में अधिक विस्तृत है।

संस्कृत भाषा को आज कई पश्चिमी इंडोलॉजिस्ट विद्वानों द्वारा एक मृत भाषा माना जाता है। तथापि, हिंदू परंपराओं में स्तोत्र-पाठ और मंत्र-पाठ की अधिकांश साधनाएँ आज भी संस्कृत भाषा में ही की जाती हैं।

महत्वपूर्ण ग्रंथ भी सभी संस्कृत भाषा में ही हैं।

पश्चिमी इंडोलॉजिस्ट विद्वानों ने कभी भी इन दोनों भाषाओं की मूल संरचनाओं पर विचार नहीं किया है।

संस्कृत भाषा के स्वर और व्यंजन निम्नलिखित प्रकार से वर्णित हैं। पाठक संस्कृत और तिब्बती लिपियों के बीच अत्यधिक समानताएँ पाएँगे।

1. स्वर (स्वर / svara) कुल 16 स्वर हैं। ह्रस्व स्वर: अ (a) इ (i) उ (u) ऋ (ṛ) ऌ (ḷ) दीर्घ स्वर: आ (ā) ई (ī) ऊ (ū) ॠ (ṝ) ॡ (ḹ)

संयुक्त स्वर (द्विस्वर): ए (e) ऐ (ai) ओ (o) औ (au) अँ (am) अः (aaa)

2. व्यंजन (व्यंजन / vyañjana) कुल 35 मुख्य व्यंजन हैं, जिन्हें उच्चारण-स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। (a) कण्ठ्य (gutturals): क (ka) ख (kha) ग (ga) घ (gha) ङ (ṅa) (b) तालव्य: च (ca) छ (cha) ज (ja) झ (jha) ञ (ña) (c) मूर्धन्य: ट (ṭa) ठ (ṭha) ड (ḍa) ढ (ḍha) ण (ṇa) (d) दन्त्य: त (ta) थ (tha) द (da) ध (dha) न (na) (e) ओष्ठ्य: प (pa) फ (pha) ब (ba) भ (bha) म (ma)

3. अन्तःस्थ (Semi-vowels): य (ya) र (ra) ल (la) व (va)

4. ऊष्म (Sibilants): श (śa) ष (ṣa) स (sa) ळ (ldy) क्ष (ksh)

5. महाप्राण (Aspirate): ह (ha)

6. विशेष चिह्न: अनुस्वार (ं) – नासिक्य ध्वनि विसर्ग (ः) – उच्चारण में श्वास अवग्रह (ऽ) – लोप सूचक चन्द्रबिन्दु (ँ) – स्वर पर नासिक्य ध्वनि कुल मिलाकर: 16 स्वर + 35 व्यंजन = 51 मूल अक्षर।

सौभाग्य से, उन्होंने अनेक ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ बनाकर तिब्बत ले गए, जो आज भी ल्हासा और अन्य मठों में सुरक्षित हैं। इन पांडुलिपियों पर व्यापक शोध की आवश्यकता है, क्योंकि आक्रमणों के कारण नष्ट हुए भारतीय विश्वविद्यालयों का बहुत सा ज्ञान इन्हीं में सुरक्षित है।

वर्तमान काल में, दुर्भाग्यवश, सनातन धर्म और बौद्ध धर्म—दोनों ही—अपने मूल मार्ग से अत्यधिक सीमा तक विचलित हो चुके हैं।

सनातन धर्म व सनातन वैदिक प्रक्रियाओं को पूर्ण रूप से समझने के लिये निम्न पृष्ठ पर जायें।