सनातन धर्म में धर्म क्या है?

सनातन धर्म में धर्म को कार्य-सिद्धांतों के एक समुच्चय के रूप में परिभाषित किया गया है, न कि किसी विशेष ईश्वर में आस्था या उसकी उपासना के रूप में।

पंथ, आस्था और अनुसरण

धर्म, पंथ, आस्था और अनुसरण के बीच अन्तर समझें

 धर्म, पंथ, आस्था और अनुसरण - इन शब्दों का प्रयोग सामान्यता एक-दूसरे के स्थान पर कर लिया जाता है, जबकि वास्तव में ये मानव के आध्यात्मिक जीवन के तीन भिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इनका भ्रम न केवल आध्यात्मिकता को, अपितु स्वयं धर्म को भी त्रुटिपूर्ण समझने का कारण बनता है। 

पंथ (Religion) क्या है?

पंथ एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें विश्वास, कर्मकांड, सिद्धांत और आचरण सम्मिलित होते हैं, जो किसी समुदाय के आध्यात्मिक और नैतिक जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। यह अस्तित्व, ईश्वर, नैतिकता और मृत्यु के बाद के जीवन के विषय में संरचित व्याख्याएँ प्रदान करता है।

इसके उदाहरण हैं—ईसाई धर्म, इस्लाम, बौद्ध धर्म और यहूदी धर्म।

पंथ संरचना, समुदाय और परंपरा प्रदान करता है—परंतु केवल संरचना ही आंतरिक आत्मसाक्षात्कार को परिभाषित नहीं करती।

आस्था (Faith) क्या है?

आस्था अत्यंत व्यक्तिगत होती है। यह किसी स्वयं से श्रेष्ठ तत्व में आंतरिक विश्वास, भरोसा और तादात्म्य है।

आस्था किसी धर्म के भीतर भी हो सकती है और उसके बाहर भी। इसके लिए कर्मकांडों या संस्थाओं की आवश्यकता नहीं होती—इसके लिए केवल भीतर की स्वीकृति और विश्वास आवश्यक होता है।

कोई व्यक्ति धर्म का पालन कर सकता है, फिर भी उसमें आस्था न हो; और कोई अन्य व्यक्ति हो सकता है गहन आस्था रख सकता है, बिना किसी संगठित धर्म से जुड़े हुए।

अनुसरण / पालन (Following) क्या है?

अनुसरण कर्म है। यह उन शिक्षाओं, अनुशासनों और नैतिक सिद्धांतों को जीवन में उतारने की सजग प्रक्रिया है, जिन्हें समय-समय पर महापुरुषों ने स्थापित किया है।

अनुसरण का अर्थ केवल मानना नहीं, अपितु जीकर दिखाना है। इसकी गहराई साधारण आचरण से लेकर गुरु के मार्गदर्शन में पूर्ण समर्पण तक हो सकती है। सार रूप में

पंथ — ढाँचा प्रदान करता है
आस्था — आंतरिक संबंध प्रदान करती है
अनुसरण — उस संबंध की जीवन में अभिव्यक्ति करता है


धर्म, पंथ (Religion) नहीं है

आधुनिक समय की सबसे बड़ी भ्रांतियों में से एक है—पंथ (Religion) और धर्म (Dharma) को एक मान लेना।

ये दोनों समान नहीं हैं।

पंथ (Religion) — विश्वास पर आधारित है।
धर्म (Dharma) — कर्तव्य पर आधारित है।


अपने मूल और वास्तविक अर्थ में, धर्म उन कर्तव्यों का समुच्चय है जो एक मनुष्य के होते हैं—

• स्वयं के प्रति
• परिवार के प्रति
• समाज के प्रति
• राष्ट्र के प्रति
• समस्त अस्तित्व के प्रति

यह भ्रम केवल विश्व स्तर तक सीमित नहीं है—भारत में भी अधिकांश जनमानस, यहाँ तक कि हिंदू समाज ने भी, धर्म को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित कर दिया है।

धर्म पूजा-पाठ के विषय में नहीं है। धर्म इस विषय में है कि मनुष्य को किस प्रकार जीवन व्यतीत करना चाहिये जिस से वह जीवन पर्यन्त सुखी रहे, और लक्ष्य हेतु कर्म किस प्रकार सम्पादित करे।

धर्म - कर्तव्य सिद्धांतों का समुच्चय है।

प्राचीन भारतीय शास्त्रों में धर्म को मानव जीवन के लिए कार्य-सिद्धांतों का समुच्चय कहा गया है— ऐसे सिद्धांत जो सार्वभौमिक हैं और जिनका —

• पंथ
• जाति
• नस्ल
• समुदाय
• राष्ट्र
• भूगोल

से कोई संबध नहीं है

ये कर्तव्य वैकल्पिक नैतिक विचार नहीं हैं। ये मनुष्य होने की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं।

सनातन धर्म में प्रत्येक मानव का प्रथम धर्म 

समस्त मनुष्यों के लिए प्रथम धर्म पाँच सार्वभौमिक कर्तव्यों के रूप में परिभाषित किया गया है। ये सिद्धांत एक सभ्य और जागरूक मानव जीवन की आधारशिला हैं—
1. सत्यवादिता — सदैव सत्य बोलना और अपने कर्मों को सत्य के अनुरूप रखना।
2. निर्दोषों के प्रति अहिंसा — निर्दोष जीवों की हत्या न करना और पीड़ा न देना; इसमें मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, वनस्पति और समस्त जीव-जगत सम्मिलित है। (यहाँ “निर्दोष” शब्द पर विशेष बल है।)
3. अस्तेय (चोरी न करना)— किसी अन्य की वस्तु या संपत्ति का, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, ग्रहण न करना।
4. यौन संयम — विवाह से पूर्व यौन संबंध न बनाना और विवाह के पश्चात अपने जीवनसाथी के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहना।
5. अपरिग्रह — दूसरों की वस्तुओं या संपत्ति को छल, बल या अन्यायपूर्ण तरीकों से न हथियाना।

ये कोई धार्मिक आज्ञाएँ नहीं हैं। ये मनुष्य होने के मूल सिद्धांत हैं। आगे इस पृष्ठ पर इन सभी कर्तव्यों की विस्तार से व्याख्या की जाएगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि धर्म कोई विश्वास-प्रणाली नहीं, अपितु जीवन व्यतीत करने की कार्य-प्रणाली  है।

द्वितीय धर्म

द्वितीय धर्म के रूप में मनुष्य को अपनी जन्मजात चार प्रमुख बुद्धियों में से किसी एक का अनुसरण करना बताया गया है, जैसा कि

वर्ण एवं जाति

के पृष्ठ पर वर्णित है।

ये चार बुद्धियाँ हैं— ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

इन्हें व्यक्ति की मूल प्राथमिक बुद्धि तथा उसी के अनुरूप उसका धर्म, अर्थात् कर्तव्य, माना गया है। मनुष्य को आजीविका के लिए इन चारों में से अपनी स्वाभाविक अंतर्निहित प्रवृत्ति के अनुसार मार्ग अपनाना चाहिए।

यद्यपि व्यक्ति किसी भी मार्ग को चुनने के लिए स्वतंत्र है, परंतु यदि वह उसकी अंतःप्रवृत्ति से मेल नहीं खाता, तो उसे जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

अपनी स्वाभाविक मानसिक प्रवृत्ति का अनुसरण करना ही व्यक्ति का धर्म है।

शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वर्ण माता-पिता से नहीं, अपितु जन्मजात बुद्धि से निर्धारित होता है।

तृतीय धर्म

तृतीय धर्म को स्वधर्म, अर्थात् व्यक्ति का अपना व्यक्तिगत धर्म कहा गया है।

प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही किसी एक प्रमुख कौशल से युक्त होता है, जिसके माध्यम से वह आजीविका अर्जित कर सकता है।

इस विषय का विस्तार से वर्णन संबंधित पृष्ठों पर किया गया है। यही वह कौशल है जिसके द्वारा व्यक्ति जीवनयापन करता है। यही उसका स्वधर्म, अर्थात् उसका व्यक्तिगत धर्म है। 

केवल अपनी स्वाभाविक बुद्धि का अनुसरण करके ही कर्म में पूर्णता प्राप्त की जा सकती है।

श्रीमद भागवत गीता के अनुसार

 बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।२.५०।।


बुद्धि से युक्त होकर कर्म करते हुए मनुष्य को शुभ और अशुभ—दोनों कर्मों का त्याग करना चाहिए। ऐसी कर्म-बुद्धि के द्वारा ही कर्म में पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। (2.50)

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण एक अत्यंत महान ज्ञान की बात कह रहे हैं। यदि हम केवल ‘अच्छे’ कर्म या पुण्य कर्म करने और ‘बुरे’ कर्म से बचने में ही लगे रहें, तो मनुष्य जन्म–मृत्यु के इस चक्र में अनंत काल तक फँसा रहता है। इसका कोई अंत नहीं होता।

परंतु जिसे हमें वास्तव में समझना चाहिए, वह यह है कि यदि हम अपने स्वाभाविक, जन्मजात अथवा अंतर्निहित बुद्धि के अनुसार कर्म करना प्रारंभ कर दें, तो वही कर्म मोक्ष या मुक्ति के द्वार खोल देता है।

अपनी स्वाभाविक बुद्धि के अनुसार किया गया कर्म मोक्ष की ओर ले जाता है।

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।।२.५१।।


क्योंकि आदरणीय  ॠषिगण इस कर्मयोग—अर्थात् स्वाभाविक कर्म-बुद्धि के योग—के अंतर्गत कर्म करते हुए मोक्ष को प्राप्त हुए हैं और बिना किसी क्लेश के जन्म–मृत्यु के चक्र से मुक्त हो गए हैं। (2.51)

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण उन आदरणीय ॠषियों के उदाहरण दे रहे हैं, जिन्होंने इसी सिद्धांत और अवधारणा के अनुसार कर्म करके जन्म–मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त की।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।२.५२।।


जब तुम्हारी बुद्धि आसक्ति के घने वन को पार कर लेगी, तब जो कुछ सुना जा चुका है और जो भविष्य में सुना जाएगा— उन सबके प्रति तुम विरक्त हो जाओगे। (2.52)

अर्थात, जब तुम्हारी बुद्धि धन, संपत्ति, भोग, कामना आदि आकर्षणों से विचलित होना बंद कर देती है और अपनी मूल, स्वाभाविक, अंतर्निहित बुद्धि पर स्थिर हो जाती है, तब तुम्हारी बुद्धि महान प्रकृति अथवा परमेश्वर की योजना के अनुसार कार्य करने लगती है।

क्योंकि वही प्रकृति है जिसने तुम्हें वह विशेष बुद्धि एक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रदान की है।

ध्यान देने योग्य है कि इन सभी श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण ने बार-बार ‘बुद्धि’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘बुद्धि’ का शाब्दिक अर्थ है—मनुष्य की विवेकशील बुद्धि, उसकी निर्णय क्षमता और अंतर्दृष्टि।

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।१८.४५।।


अपने स्वभावगत कर्मों में निरंतर संलग्न रहते हुए मनुष्य परम परमेश्वर की परम गति को प्राप्त करता है। स्वकर्म में लगे रहकर वह उस परम गति को कैसे प्राप्त करता है— इसे सुनो। (18.45)

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण इसी सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यदि मनुष्य इसी प्रकार अपने जीवन में अपने स्वाभाविक कर्म के अनुसार कार्य करता रहे, तो वह निश्चित रूप से परम गति अथवा मोक्ष को प्राप्त करता है।

दूसरों का धर्म (यानि दूसरों की बुद्धि को अपनाना या उस का अनुसरण करना) अपनाने से श्रेष्ठ है अपनी स्वाभाविक बुद्धि और कर्म का अनुसरण करे।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।१८.४७।।


दूसरों की भली-भाँति स्थापित बुद्धि भी अपनी बुद्धि से श्रेष्ठ नहीं है। अर्थात् अपनी बुद्धि दूसरों की बुद्धि से इसलिए श्रेष्ठ है, क्योंकि जो बुद्धि स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के भीतर से उत्पन्न होती है, उसका पालन करने से मनुष्य जीवन में समस्याओं में नहीं पड़ता। (18.47)

यहाँ ‘धर्म’ से अभिप्राय उस बुद्धि से है जो व्यक्ति को जन्म से प्राप्त होती है।

आगे यहाँ भगवान यह स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि इस प्रकार से किए गए कर्म ही मनुष्य का सच्चा धर्म हैं।

सामान्य दृष्टि से देखें तो किसी अन्य व्यक्ति का ‘धर्म’ (अर्थात उसकी बुद्धि) बहुत आकर्षक प्रतीत हो सकती है, क्योंकि वह धर्म अधिक धन, वैभव या सफलता उत्पन्न कर रहा होता है।

परंतु होने पर भी, अपने ही स्वाभाविक धर्म या जन्मजात रूप से प्रदत्त बुद्धि का अनुसरण करना दूसरों की बुद्धि का अनुसरण करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। और इसका कारण स्पष्ट है—

जो व्यक्ति अपनी स्वाभाविक बुद्धि के अनुसार कर्म करता है, वह जीवन में अनावश्यक संघर्षों और समस्याओं में नहीं फँसता।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।१८.४८।।


जिस प्रकार अग्नि के साथ धुआँ जुड़ा रहता है, उसी प्रकार प्रत्येक धर्म (अर्थात प्रत्येक प्रकार की बुद्धि) में कुछ न कुछ दोष अवश्य होते हैं।
अतः अपने धर्म में दोष होने पर भी मनुष्य को अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। (18.48)

इस प्रकार, सभी प्रकार की बुद्धियों तथा उन बुद्धियों के अनुसार किए गए कर्मों के अपने-अपने लाभ और हानियाँ होती हैं।

प्रथम दृष्टि में किसी अन्य व्यक्ति का व्यवसाय या पेशा बहुत आकर्षक और लाभकारी प्रतीत हो सकता है, परंतु जब कोई उस पेशे की लघुताओं में प्रवेश करता है, तब उसके नकारात्मक पक्ष भी स्पष्ट होते हैं।

उदाहरण के लिए, ऊपरी तौर पर व्यापार करना बहुत आकर्षक लगता है, क्योंकि उसमें केवल धन ही धन दिखाई देता है।

परंतु वास्तव में व्यापार में उतरने पर पूँजी की व्यवस्था करना, उत्पादों की श्रृंखला विकसित करना, निर्माण एवं विपणन प्रणालियाँ बनाना, धन प्रबंधन की व्यवस्थाएँ स्थापित करना और धन-सृजन का सतत चक्र निर्मित करना— इन सबके लिए व्यापारी-सुलभ बुद्धि और निरंतर उसी दिशा में सोचने की क्षमता आवश्यक होती है।

इसलिए किसी भी प्रकार के व्यवसाय या स्टार्ट-अप में प्रवेश करने से पूर्व यह मूल्यांकन करना अत्यंत आवश्यक है कि क्या व्यापार चलाने की मूलभूत बुद्धि आपकी अपनी विवेक शक्ति में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है या नहीं।

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।१८.४९।।


जिसकी बुद्धि किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं है, जो अपने आत्म-स्वरूप पर नियंत्रण रखता है, जो किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करता— वह सांख्ययोग के अनुसार सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त करता है और बिना आसक्ति के कर्म में पूर्णता को प्राप्त करता है। (18.49)

यह श्लोक पुनः अत्यंत महत्वपूर्ण अर्थ से परिपूर्ण है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस मनुष्य ने अपनी बुद्धि पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है, जो दूसरों से स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ में नहीं लगा है, ऐसा व्यक्ति उच्चतम बुद्धि वाला होता है और वही कर्म में पूर्णता को प्राप्त करता है।

अतः धर्म का अर्थ है— कुछ निश्चित सिद्धांतों का पालन करना।

इस कारण धर्म को जीवन में एक सिद्धांत के रूप में अपनाना आवश्यक है, और यही सनातन धर्म अथवा हिंदू धर्म की मूल आधारशिलाओं में से एक है।

इस प्रकार धर्म को व्यक्ति की जन्मजात रूप से प्रदत्त बुद्धि और उस बुद्धि के अनुरूप किए जाने वाले कर्मों से संबंधित कर्तव्यों के समुच्चय के रूप में परिभाषित किया गया है।

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित
धर्म का संबंध कहीं भी देवताओं में विश्वास करने,
पूजा करने या ईश्वर से कुछ माँगने से
नहीं जोड़ा गया है।


जीवन में केवल अपनी स्वाभाविक बुद्धि की क्षमताओं के अनुसार इन सिद्धांतों पर आधारित कर्म करना ही इतना शक्तिशाली है कि वह मोक्ष या मुक्ति के द्वार खोल देता है।

इस मूलभूत सिद्धांत का पालन मानव बुद्धि के निरंतर शोधन, सुधार और उन्नयन की दिशा में अगला और अनिवार्य कदम बन जाता है।

सनातन धर्म का मार्ग इस मानव बुद्धि को उच्च्तम बना कर एक सुखी जीवन जीने का मार्ग है।