ज्योतिष क्या है?

आधुनिक तर्क-विचार इस धारणा के लिए बहुत कम स्थान छोड़ता है कि यह विशाल ब्रह्मांड— उसकी आकाशगंगाएँ, सौरमंडल, ग्रह और स्वयं जीवन की उत्पत्ति— केवल किसी आकस्मिक ब्रह्मांडीय दुर्घटना का परिणाम है।

जिस अद्भुत सटीकता से यह ब्रह्मांड संचालित हो रहा है, वह किसी न किसी बुद्धि, सुनियोजित संरचना और निश्चित उद्देश्य की स्पष्ट माँग करता है।

मानवता सृष्टि की कोई आकस्मिक उपज नहीं है।

मनुष्य इस विराट ब्रह्मांडीय संरचना का एक सुनियोजित और अभिप्रेत अंग है— और यह ब्रह्मांड मनुष्य के अस्तित्व के लिए ही रचा गया है। वह भी एक स्पष्ट और निश्चित उद्देश्य के साथ।

अपने स्वयं के जीवन को समझने के लिए हमें उन नियमों और सिद्धांतों का अध्ययन करना होगा जो इस महान ब्रह्मांडीय संरचना को संचालित करते हैं।

व्यक्तिगत भाग्य की पहेली

पृथ्वी पर अरबों मनुष्य एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न जीवन जी रहे हैं।

  कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन-क्रम को पूर्णतः साझा नहीं करता।

यह कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, अपितु एक प्रत्यक्ष और अनुभवजन्य सत्य है। अत्यंत परिश्रम करने पर भी कोई भी मनुष्य सामान्यता, अधिक धन, पूर्णतः संतुष्ट और सर्वथा पूर्ण जीवन प्राप्त नहीं कर पाता।

कुछ इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं, कुछ लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं होते। यहाँ तक कि सबसे शक्तिशाली, सबसे धनी अथवा सबसे अधिक ज्ञानी व्यक्ति भी किसी न किसी सीमा का अनुभव करता है।

यह निर्विवाद सत्य हमें एक ही निष्कर्ष तक ले जाता है— मानव जीवन केवल व्यक्तिगत इच्छा-शक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं होता।

एक और अधिक गहरा, सूक्ष्म और अदृश्य तंत्र प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करता है— जो अनुभवों, प्रवृत्तियों, अवसरों और परिणामों को आकार देता है।

ज्योतिषी क्या है?
यह नियंत्रण कहाँ से उत्पन्न होता है?

ब्रह्मांडीय प्रभावों का तंत्र (System)

पृथ्वी कोई अलग-थलग गोला नहीं है जो शून्य में तैर रहा हो। यह एक जीवंत ब्रह्मांड के भीतर स्थित है— एक ऐसा ब्रह्मांड जो नियमों, शक्तियों और पारस्परिक प्रभावों द्वारा संचालित होता है, जो ब्रह्मांड मानव इंद्रियों की सीमाओं से कहीं आगे तक विस्तृत हैं।

पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर गति समय की गणना को निर्धारित करती है। सूर्य स्वयं जीवन-धारण करने वाली संपूर्ण ऊर्जा का स्रोत है— यह तथ्य आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है। परंतु सूर्य के अतिरिक्त भी—

• नौ ग्रह
• चंद्रमा
• और बारह नक्षत्र

सभी एक अत्यंत सटीक ब्रह्मांडीय लय में गतिशील हैं।

यदि उद्देश्य केवल दिन और रात का क्रम ही होता, तो सूर्य–पृथ्वी का संबंध ही पर्याप्त था। फिर भी ब्रह्मांड में इससे कहीं अधिक व्यवस्था विद्यमान है। यह स्पष्ट रूप से किसी उद्देश्य और अभिप्राय की ओर संकेत करता है।

इन सभी आकाशीय पिंडों का पृथ्वी पर

• गुरुत्वाकर्षणीय
• तथा सूक्ष्म ऊर्जात्मक

प्रभाव पड़ता है।

यद्यपि आधुनिक उपकरण इन अत्यंत सूक्ष्म शक्तियों को अभी माप नहीं सकते, फिर भी उनके प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता।

प्राचीन ऋषि उस सत्य को जानते थे जिसे आधुनिक विज्ञान अब धीरे-धीरे पुनः खोजने लगा है

ब्रह्मांड मौन नहीं है।

वह निरंतर पृथ्वी पर स्थित जीवन से संवाद करता रहता है।

पूर्ण सृष्टि चक्र को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें

जन्म का क्षण

जन्म का क्षण एक ब्रह्मांडीय हस्ताक्षर है
प्रत्येक मानव विशिष्ट और अद्वितीय ब्रह्मांडीय परिस्थितियों के अंतर्गत 
जीवन में प्रवेश करता है

तीन तत्व प्रत्येक जन्म को अद्वितीय बनाते हैं:

जन्म-स्थान
जन्म-तिथि
जन्म-समय

ये तीनों तत्व उस क्षण ग्रहों और नक्षत्रों की एक अत्यंत सटीक ब्रह्मांडीय स्थिति निर्मित करते हैं— जब व्यक्ति उस स्थान पर, उस तिथि को, उस समय अपनी पहली श्वास लेता है।

प्राचीन भारतीय विज्ञानों के अनुसार, उस क्षण विद्यमान अत्यंत सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षणीय और ऊर्जात्मक शक्तियाँ नवजात शिशु के मन पर— विशेषकर विकसित हो रहे सूक्ष्म मस्तिष्क पर— अपना प्रभाव अंकित कर देती हैं।

यही प्रभाव जीवन की
व्यापक रूपरेखा निर्धारित करता है।


अतः व्यक्ति के जीवन का खाका जन्म के समय ही निर्धारित हो जाता है, जैसे—

• उसकी अंतर्निहित शक्तियाँ
• चुनौतियाँ
• प्रवृत्तियाँ
• स्वास्थ्य
• कार्य-दिशा (करियर)
• धन-सम्भावनाएँ
• संबंध
• और यहाँ तक कि मृत्यु की सामान्य प्रकृति भी

इस विज्ञान को ज्योतिष— अर्थात भारतीय वैदिक ज्योतिष— कहा जाता है, जो प्राचीन मानव सभ्यता द्वारा विकसित सबसे उन्नत विश्लेषणात्मक प्रणालियों में से एक है।

भारतीय ज्योतिष ही क्यों अधिक सटीक है?

विश्व में प्रचलित ज्योतिष की मुख्यतः दो प्रणालियाँ हैं

1. पाश्चात्य (पश्चिमी) प्रणाली जिसमें एक सौर वर्ष को 12 राशियों में बाँटकर प्रत्येक राशि को एक-एक महीना दिया जाता है।
2. भारतीय (वैदिक) प्रणाली जिसमें—
• प्रत्येक चंद्र दिवस को 12 राशियों में विभाजित किया जाता है
• और आगे 27 नक्षत्रों में भी

भारतीय प्रणाली में

• राशियाँ और नक्षत्र स्थिर होते हैं
• ग्रह निरंतर गतिशील रहते हैं
• जन्म-समय में कुछ ही मिनटों का अंतर कुंडली को पूर्णतः बदल सकता है

यही कारण है कि वैदिक ज्योतिष अत्यंत सूक्ष्म, गहन और अधिक सटीक माना जाता है। जहाँ पाश्चात्य ज्योतिष सामान्य व्यक्तित्व-प्रकार बताता है, वहीं भारतीय ज्योतिष व्यक्ति के सटीक कर्मिक खाके (कर्म-ब्लूप्रिंट) को उजागर करता है।

नामकरण और नक्षत्र

इसी कारण भारतीय परंपरा में बच्चे के नाम का प्रथम अक्षर उसके नक्षत्र के आधार पर रखा जाता है। अर्थात—

• नाम राशि या नक्षत्र तय नहीं करता
• अपितु राशि और नक्षत्र नाम निर्धारित करते हैं यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कोई भी व्यक्ति अपने जन्म-परिस्थितियों को बदल नहीं सकता— और इसलिए नाम बदलकर अपनी कुंडली भी नहीं बदल सकता।

विज्ञान पूर्ण है— जब कि मानव द्वारा की गई उस की व्याख्या नहीं

ज्योतिष एक विज्ञान के रूप में पूर्णतः सटीक है। परंतु उसकी व्याख्या पूरी तरह ज्योतिषी के ज्ञान और अनुभव पर निर्भर करती है।

जैसे— हर भौतिकी का छात्र भौतिकी को समान स्तर पर नहीं समझ पाता, वैसे ही हर ज्योतिषी कुंडली को एक-सी गहराई से विश्लेषण नहीं कर पाता।

ज्योतिष विज्ञान में त्रुटियाँ विज्ञान में नहीं,
मानव व्याख्या में होती हैं।


ब्रह्मांडीय खाका स्वयं में निर्दोष और पूर्ण है।

भाग्य में भिन्नता क्यों होती है?

  जीवन के उत्थान और पतन ग्रहों की गतियों द्वारा संचालित चक्रों में घटित होते हैं। इसी कारण—

० एक अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति गुमनाम रह सकता है
० साधारण क्षमता वाला व्यक्ति असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है
० अचानक लाभ या अप्रत्याशित हानि बिना तर्क के घटित होती प्रतीत होती है
० अचानक अप्रतिश्याशित घटनायें बिना पूर्व संकेत के घटित हो सकती हैं। जैसे कि दुर्घटनायें।


कुंडली समय के अनुकूल व प्रतिकूल
समय-निर्धारण को दर्शाती है।


फिर भी प्रत्येक मनुष्य के पास ऐसी असाधारण शक्तियाँ है— जो उसे भाग्य से भी ऊपर उठा सकती है।

मानव जीवन को वैज्ञानिक एवं वैदिक दृष्टिकोण से समझें

मनुष्यों में अंतर्निहित महाशक्तियाँ

सचेतन कर्म

 पशु केवल जीवित रहने के लिए कर्म करते हैं—केवल भोजन, सुरक्षा और प्रजनन के लिए।

केवल मनुष्य के पास ही ऐसी विकसित बुद्धि है जो उसे 

• चयन करने में
• चिंतन करने में
• आत्म-सुधार करने में
• और जीवन को सचेत रूप से दिशा देने में

सक्षम बनाती है 

यही क्षमता मनुष्य को समस्त सृष्टि में अद्वितीय बनाती है। और यहीं सनातन धर्म अपना एक अत्यंत गूढ़ और महान रहस्य प्रकट करता है

भाग्य निर्धारित है

परंतु उसके प्रभावों को सचेत कर्म द्वारा प्रभावित किया जा सकता है, बढ़ाया जा सकता है या पूर्णतः रूपांतरित किया जा सकता है।

भाग्य को रूपांतरित करने के प्राचीन विज्ञान

यद्यपि जीवन की मूल रूपरेखा जन्म के समय निर्धारित हो जाती है, परंतु जीवन की गुणवत्ता निर्धारित नहीं होती।

प्राचीन भारतीय विज्ञान जो योग, मंत्र, साधना और कर्म-शुद्धि पर आधारित हैं ऐसी विधियाँ प्रदान करते हैं जिनसे

• कठिन ग्रह-दशाओं के प्रभाव कम किए जा सकते हैं
• शुभ कालों के लाभ कई गुना बढ़ाए जा सकते हैं
• पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के नकारात्मक कर्मों के प्रभाव घटाए जा सकते हैं
• उच्चतर बुद्धि और चेतना के स्तर जाग्रत किए जा सकते हैं
• भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति को तीव्र किया जा सकता है

यह कोई अंधविश्वास नहीं है

यह चेतना और ब्रह्मांडीय अंतःक्रिया की गहन समझ पर आधारित एक परिष्कृत विज्ञान है। जीवन से प्राप्त प्रमाण वास्तविक जीवन में इसके असंख्य उदाहरण मिलते हैं—

• शक्तिशाली कुंडली वाला व्यक्ति यदि कर्म और आचरण में दुर्बल हो, तो आगे नहीं बढ़ पाता
• कठिन कुंडली वाला व्यक्ति यदि अनुशासन, ज्ञान और साधना अपनाए, तो असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँच जाता है

भाग्य मंच तैयार करता है;
परंतु मनुष्य का प्रयास कथा का लेखन करता है।


मानव संभावनाओं की चरम सीमा जब शक्तिशाली कुंडली वाला व्यक्ति उच्च ज्ञान, सही कर्म और प्राचीन भारतीय परंपरा में वर्णित साधनाओं को अपनाता है, तो परिणाम अद्भुत और असाधारण होते हैं।

ऐसे व्यक्ति

• अपार यश
• समृद्धि
• और आध्यात्मिक सिद्धि को प्राप्त करते हैं

अनेकों बार समाज की कल्पना से भी परे।

ग्रथों प्राचीन भारत के राजाओं, ऋषियों और यहाँ तक कि साधारण जनों के भी सैकड़ों–हज़ारों उदाहरण हैं जिन्होंने

• अपने कर्म को संयमित करके
• और दैवी शक्तियों का आश्रय लेकर अपने जीवन में असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं।

ये केवल पुराणों की कथाएँ या कल्पनाएँ नहीं हैं— ये प्राचीन भारत के महान व्यक्तियों के ऐतिहासिक अभिलेख हैं जिन्होंने अद्वितीय वैभव और गौरव प्राप्त किया।

सनातन धर्म का वचन और ज्योतिष का उद्देश्य है

• भाग्य की छिपी हुई संरचना को प्रकट करना
• और मनुष्य को अपनी सीमाओं से ऊपर उठने के लिए समर्थ बनाना यही सनातन धर्म की शाश्वत और महान प्रतिज्ञा है।

अपने जीवन को किस प्रकार अपने ही नियंत्रंण मे लाया जाय, यह जानने के लिये वैदिक मार्ग को पूर्ण रूप से समझें

बहु-शरीरी ब्रह्मांड और
भाग्य की संरचना

मानव भाग्य की इस पड़ताल में
एक और वैज्ञानिक अवधारणा
अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है
तीन-पिंड समस्या
(The Three-Body Problem)

 आधुनिक विज्ञान यह स्वीकार करता है कि केवल तीन आकाशीय पिंडों की परस्पर क्रिया भी ऐसी गणितीय जटिलता उत्पन्न कर देती है जिसका सटीक पूर्वानुमान संभव नहीं होता। विश्व के सबसे अधिक शक्तिशाली कम्प्यूटर भी इस प्रकार की परस्पर क्रिया का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते।

और हम पृथ्विवासी तो केवल तीन-पिंड प्रणाली में नहीं, अपितु एक विशाल बहु-पिंडीय ब्रह्मांड के भीतर रहते हैं— जहाँ गुरुत्वीय तथा अत्यंत सूक्ष्म ऊर्जात्मक अंतःक्रियाएँ लगातार पृथ्वी पर जीवन को प्रभावित करती रहती हैं।

तीन-पिंड समस्या मानव जीवन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है

यदि हम केवल सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा को ही ध्यान में लें।

हम यह पहले से जानते हैं

• सूर्य के बिना जीवन संभव नहीं है
• चंद्रमा के बिना ज्वार-भाटा प्रणाली नष्ट हो जाती है, पारिस्थितिकी तंत्र विफल हो जाते हैं, और अनेक जैविक तथा मानसिक लय अपना संतुलन खो देती हैं

ये तीनों मिलकर एक ऐसी गतिशील गुरुत्वीय प्रणाली बनाते हैं जो इतनी जटिल है कि आधुनिक भौतिकी भी इसका सामान्य गणितीय समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकती। विश्व के सबसे शक्तिशाली कम्प्यूटर भी इस जटिल प्रणाली का विस्तार से विश्लेषण करने में असमर्थ हैं।

तीन-पिंड समस्या का आधुनिक ए.आई. आधारित विवरण इसे स्पष्ट रूप से संक्षेपित करता है

जब तीन विशाल पिंड गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से परस्पर क्रिया करते हैं, तो उनकी गति को नियंत्रित करने वाले समीकरण अराजक, अनिश्चित और अत्यंत कठिन हो जाते हैं।

यदि केवल तीन पिंड गणितीय पूर्वानुमान को असंभव बना देते हैं, तो उस प्रणाली का क्या होगा जिसके भीतर हम वास्तव में रहते हैं?

हम एक बहु-पिंडीय प्रणाली में रहते हैं जो विज्ञान की गणनात्मक क्षमता से कहीं अधिक जटिल है।

हमारा अस्तित्व केवल सूर्य और चंद्रमा से ही नहीं, अपितु निम्न ग्रहों से भी प्रभावित होता है

• बुध
• शुक्र
• मंगल
• बृहस्पति
• शनि
• अरुण (यूरेनस)
• वरुण (नेपच्यून)

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में अरुण और वरुण जैसे दीर्घ कक्षीय अवधि वाले दो अतिरिक्त ग्रहों का भी उल्लेख मिलता है।

इनकी कक्षीय अवधि सौ वर्षों से अधिक होती है, इसी कारण मानव जीवन की औसत आयु सौ वर्षों से कम होने के कारण इन्हें व्यावहारिक ज्योतिषीय गणनाओं में सम्मिलित नहीं किया जाता। फिर भी, केवल ज्ञात ग्रहों को ही जोड़ दें, तो हम पहले से ही दस-पिंड समस्या से जूझ रहे हैं जो सबसे शक्तिशाली सुपरकंप्यूटरों की क्षमता से भी कहीं परे है।

जटिलता यहीं समाप्त नहीं होती इन ग्रहों से परे

• बारह राशियाँ
• और उनके भीतर सत्ताईस विशिष्ट नक्षत्र स्थित हैं।

ये कोई आकस्मिक तारामंडल नहीं हैं, अपितु स्थिर ब्रह्मांडीय संकेतक हैं जो एक अत्यंत सटीक आकाशीय ढाँचा निर्मित करते हैं। इस प्रकार, हम

• न केवल तीन-पिंड प्रणाली में
• न ही दस-पिंड प्रणाली में
अपितु सैंतीस-पिंडीय प्रणाली में रहते हैं

एक ऐसा ब्रह्मांडीय तंत्र (System) जो आधुनिक गणनात्मक विज्ञान की पूर्ण पहुँच से बहुत बाहर है।

फिर भी

प्राचीन भारतीय वैदिक ग्रंथों मे इस ग्रहीय प्रणाली का पूर्ण विवरण मिलता है।
यह तथ्य और भी आश्चर्यजनक हो जाता है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराओं ने इन शक्तियों का मानचित्रण, विश्लेषण और समेकन हज़ारों–दसियों हज़ारों वर्ष पहले ही कर लिया था।

यही ज्ञान आज ज्योतिष शास्त्र अर्थात वैदिक ज्योतिष के नाम से जाना जाता है। प्राचीन ॠषियों की गहन दृष्टि वैदिक ॠषियों ने यह देखा कि

• प्रत्येक आकाशीय पिंड सूक्ष्म शक्तियों का विकिरण करता है
• ये शक्तियाँ गुरुत्वीय, विद्युत-चुंबकीय तथा अन्य अभी तक अपरिभाषित ऊर्जाओं के रूप में कार्य करती हैं

ये प्रभाव

• पृथ्वी पर
• और विशेष रूप से जन्म के समय मानव मस्तिष्क पर अपना प्रभाव अंकित करते हैं।

यही प्रभाव मनुष्य की

• मानसिक संरचना
• भावनात्मक प्रवृत्तियाँ
• और कर्मिक खाका निर्मित करते हैं

जो आगे चलकर व्यक्ति के भाग्य को आकार देता है।

सृष्टि चक्र को वैदिक ज्ञानानुसार समझें

ज्योतिष कोई भविष्य-कथन नहीं है यह ब्रह्मांडीय जीवविज्ञान
(Cosmic Biology) है।

ज्योतिष उस अध्ययन का नाम है
जिसमें यह समझाया  जाता है कि
आकाशीय लय (Celestial Rhythms)
किस प्रकार नवजात मानव के
तंत्रिका तंत्र (Nervous System)
पर अपना सूक्ष्म प्रभाव अंकित करती हैं।
आत्मा की ब्रह्मांड के माध्यम से यात्रा

 इस व्यवस्था के इस प्रकार कार्य करने का कारण समझने के लिए हमें यह समझना आवश्यक है कि आत्मा के पृथ्वी पर आने से पहले क्या घटित होता है।

मृत्यु के पश्चात, आत्मा अपने भीतर अपने पूर्व जन्मों की सम्पूर्ण स्मृति और कर्म-संस्कारों को धारण किए हुए पितृलोक की यात्रा करती है

वह लोक जहाँ पूर्वजों के कर्मों के अभिलेख बुद्धि रूप में सुरक्षित रहते हैं। इसके बाद की यात्रा पूर्णतः आत्मा के संचित कर्मों पर निर्भर करती है

• अत्यंत सात्त्विक आत्माएँ देव लोक, ब्रह्म लोक, विष्णु लोक, शिव लोक अथवा देवी का दिव्य लोक मणिद्वीप प्राप्त कर सकती हैं।
• मुक्त आत्माएँ गोलोक में प्रवेश करती हैं— जो भगवान श्रीकृष्ण, एकमात्र परमेश्वर, का दिव्य धाम है।
• राजसिक या तामसिक कर्मों से आवृत्त आत्माएँ अपने विकास को आगे बढ़ाने हेतु पुनः पृथ्वी पर लौट आती हैं।

परंतु सब ही आत्माएँ तुरंत मानव रूप में जन्म नहीं लेतीं।

अनेक आत्माओं को पहले निम्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है

• वनस्पति
• वृक्ष
• कीट
• पक्षी
• अथवा पशु

तिर्यक् योनियों की यह यात्रा हज़ारों वर्षों तक चल सकती है।

इस समय काल में आत्मा दुःख भोगती है, विकसित होती है और क्रमशः ऊपर उठती है, जब तक कि वह आत्मा पुनः मानव रूप में जन्म लेने की योग्यता अर्जित नहीं कर लेती।

निम्न योनियों में ये पुनर्जन्म वास्तव में बुद्धि के शोधन और सुधार की प्रक्रिया हैं वही बुद्धि जो प्रत्येक देह के मृत्यु के समय आत्मा के साथ आगे बढ़ती है। केवल जब आत्मा मानव शरीर में प्रवेश करती है, तब ही बहु-पिंडीय ब्रह्मांडीय व्यवस्था का पूर्ण प्रभाव उस पर लागू होता है।

भाग्य को समझने के लिए अस्तित्व की संपूर्ण व्यवस्था को समझना आवश्यक है

ज्योतिष को अलग-थलग रूप में समझा नहीं जा सकता। वह तभी सार्थक होता है जब उसे निम्न के साथ जोड़ा जाए

• कर्म
• पुनर्जन्म
• ब्रह्मांडीय चक्र
• तथा चेतना और आकाशीय गतियों के बीच की अंतःक्रिया

इसी कारण प्राचीन भारतीय सभ्यता एक पूर्ण, संगठित और सुसंगत ब्रह्मांडीय विज्ञान विकसित करने में सफल हुई

जबकि आधुनिक विज्ञान, अपनी समस्त तकनीकी शक्ति के होने पर भी, आज भी ब्रह्मांड की गहन कार्यप्रणाली के केवल एक अंश को ही समझ पाने में संघर्ष कर रहा है।

ज्योतिष मानव जीवन और ब्रह्मांड के बीच का संयोजक तंत्र है।

यह कर्म और भाग्य के बीच की सेतु-रेखा है। यह अस्तित्व का ऑपरेटिंग सिस्टम है— जिसे भारतीय ज्ञान परंपराओं ने डिकोड किया, विश्व ने भुला दिया, और जिसे आधुनिक साधक अब धीरे-धीरे पुनः खोज रहे हैं।

आत्म-साक्षात्कार पर आधारित एक विस्तृत एवं निःशुल्क पाठ्यक्रम के लिए कृपया हमारी YouTube वीडियो श्रृंखला SRS 1 से SRS 42 देखें।

यह सम्पूर्ण ज्ञान प्राचीन हिंदू शास्त्रों पर शत-प्रतिशत आधारित है।

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