संस्कृत भाषा ही ब्रह्मांड की भाषा है।

संस्कृत भाषा - वर्तमान समझ से कहीं अधिक उच्चतम्

मानव बुद्धि को
उच्चतम् बनाने की भाषा

कुछ पाश्चात्य भारतीय शास्त्रों के विद्वानों ने
संस्कृत भाषा को एक मृत भाषा बताया है
जो कि पूर्णतया गलत है।

संस्कृत भाषा की एक अत्यंत उन्नत प्रणाली है—जिसे एक सटीक उद्देश्य के साथ अभिकल्पित किया गया है, जिसे आधुनिक विद्वत्ता प्रायः समझने में असफल रही है।

६०० से अधिक प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन पर आधारित हमारा शोध यह प्रमाणित करता है कि संस्कृत को कभी भी दैनिक बोलचाल की भाषा के रूप में कार्य करने के लिए नहीं बनाया गया था।

यद्यपि अनेक भारतीय और पाश्चात्य विद्वान संस्कृत को एक मृत भाषा कहते हैं, क्योंकि इसका सामान्य बातचीत में उपयोग नहीं होता, परंतु यह निष्कर्ष स्वयं इसकी वास्तविक प्रकृति के प्रति एक मौलिक भ्रांति को प्रकट करता है।

संस्कृत कोई साधारण भाषा नहीं है
मेरा सिद्धांत सरल किंतु गहन है।


संस्कृत का निर्माण सामान्य संप्रेषण के लिए नहीं किया गया था। यह एक उन्नत भाषिक और संज्ञानात्मक प्रणाली है, जिसे मानव बुद्धि और चेतना के साथ कार्य करने के लिए संरचित किया गया है, न कि जन साधारण की बातचीत के लिए।

यह तथ्य स्वयं प्राचीन ग्रंथों की प्रकृति से स्पष्ट हो जाता है— सभी मूल वेद और पुराण वैदिक संस्कृत में रचित हैं, न कि बाद की शास्त्रीय या प्रचलित भाषाओं में।

ये सभी ग्रंथ पूर्णतः सटीक छंदबद्ध श्लोकों में हैं, न कि व्याख्यात्मक गद्य या अनुच्छेदों में। इन ग्रंथों में संरक्षित पारंपरिक कालक्रम के अनुसार, संस्कृत का प्रकटीकरण इस सृष्टि-चक्र के आरंभ में हुआ था—
अर्थात् 2024 से लगभग 1,943,789,125 सौर वर्ष पूर्व।

केवल यह तथ्य ही हमें इस आधुनिक धारणा पर प्रश्न उठाने के लिए बाध्य करता है कि संस्कृत केवल एक सामाजिक भाषा के रूप में विकसित हुई थी।

आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की सीमाएँ

आधुनिक विज्ञान प्रायः एक संकीर्ण, मानव-केंद्रित ढाँचे के भीतर कार्य करता है। वह मनुष्य जीवन व शरीर का अध्ययन पृथक रूप से करता है और उस व्यापक बुद्धिमत्ता की उपेक्षा करता है, जिसका महत्वपूर्ण भाग मनुष्य स्वयं है।

फिर भी वर्तमान संदर्भ में, समस्त तकनीकी उन्नति के होते हुये भी, मानव जीवन के लिए आवश्यक प्रत्येक मूल तत्व—भोजन, वायु, जल—सीधे प्रकृति से ही प्राप्त होते है।

प्राचीन भारतीय दर्शन ने कभी
मनुष्य को प्रकृति से अलग नहीं किया।


आधुनिक विज्ञान, अपनी ही बौद्धिक अनिश्चितताओं में उलझा हुआ, इस मूलभूत निर्भरता को सामान्यता अनदेखा कर देता है।

यही अंध-बिंदु उसे यह समझने से रोकता है कि संस्कृत जैसी भाषा की संरचना ऐसी क्यों है।

संस्कृत के दो वास्तविक उद्देश्य

हमारा शोध यह दर्शाता है कि संस्कृत के दो अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं, जिन्हें मुख्यधारा का विज्ञान अब तक पहचान नहीं पाया है—

मानव मस्तिष्क–बुद्धि प्रणाली की पुनः-प्रोग्रामिंग

संस्कृत के श्लोक सूचनात्मक कथन नहीं हैं; वे सुव्यवस्थित वर्णात्मक संरचनाएँ हैं, जिन्हें मानव मस्तिष्क की तंत्रिका और संज्ञानात्मक व्यवस्था के साथ अंतःक्रिया करने के लिए रचा गया है।

उच्चतर चेतना और बुद्धिमत्ता के क्षेत्रों से संप्रेषण संस्कृत एक इंटरफ़ेस भाषा के रूप में कार्य करती है—जो ब्रह्म, चेतना और बुद्धि के उन सूक्ष्म क्षेत्रों से संवाद करने में सक्षम है, जो निरंतर सम्पूर्ण अस्तित्व में व्याप्त हैं।

बुद्धि-विकास का एक नया सिद्धांत

प्राचीन ग्रंथों के साक्ष्यों पर आधारित और तंत्रिका-विज्ञान में उभरते निष्कर्षों से समर्थित, मैं यह स्पष्ट सिद्धांत प्रस्तुत करता हूँ कि संस्कृत मानव बुद्धि को कैसे विकसित करती है।

यह कोई दार्शनिक कल्पना नहीं है—यह शास्त्रीय संरचना, संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली से निकला हुआ एक तार्किक निष्कर्ष है।

यह संस्कृत का पहला और प्रधान उद्देश्य है, और यह भाषा, बुद्धि तथा मानव क्षमता को समझने का एक पूर्णतः नया दृष्टिकोण खोलती है।

जो आगे आता है, वह पुनर्व्याख्या नहीं—पुनःखोज है।

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मानव बुद्धिमता व
संस्कृत भाषा का सिद्धांत

प्राचीन भारतीय ज्ञान
इंद्रिय-नियंत्रण, बुद्धि और मानवीय सुख- दुःख के बीच
एक प्रत्यक्ष और शक्तिशाली संबंध स्थापित करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब मनुष्य अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण खो देता है, तो उसकी बुद्धि का पतन होने लगता है। जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तब मनुष्य के कर्म और कर्तव्यों से विचलित हो जाते हैं जिन्हें शास्त्र पाप कहते हैं।

जिसके परिणामस्वरूप जीवन त्रुटियाँ, दुःख तथा प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं।

बुद्धि के इस पतन को आधुनिक शब्दों में मानव मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग में उत्पन्न विकृति के रूप में समझा जा सकता है। जब यह आंतरिक प्रोग्रामिंग बिगड़ जाती है, तब मनुष्य सही निर्णय लेने की क्षमता खो देता है। और गलत निर्णय अनिवार्य रूप से दुःख उत्पन्न करते हैं—चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो या सामाजिक स्तर पर।

क्या विकृत बुद्धि को सुधारा जा सकता है?

आधुनिक विज्ञान आज भी बुद्धि की एक समग्र और सटीक परिभाषा देने में संघर्ष कर रहा है।

इसके विपरीत, प्राचीन हिंदू शास्त्र न केवल बुद्धि को परिभाषित करते हैं, अपितु उसे सुधारने, परिष्कृत करने और उन्नत करने की व्यवस्थित विधियाँ भी प्रदान करते हैं।

वैदिक परंपराओं का एक बहुत बड़ा भाग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानव बुद्धि के सर्वोत्तम कार्य-तंत्र को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से ही रचा गया है।

क्या संस्कृत स्तोत्र और मंत्र
मस्तिष्क के लिए सॉफ़्टवेयर हैं?


मेरा सिद्धांत यह प्रमाणित करता है कि संस्कृत के स्तोत्र और मंत्र मानव मस्तिष्क–कंप्यूटर के लिए सॉफ़्टवेयर स्ट्रिंग्स की भाँति कार्य करते हैं।

सावधानीपूर्वक संरचित श्लोकों से, उनमें विकृत बुद्धि को सुधारने और संज्ञानात्मक स्पष्टता को उन्नत करने की क्षमता होती है।

आज के विश्व में मनुष्य निरंतर
इंद्रिय-उत्तेजनाओं से घिरा हुआ है


उत्पाद, मीडिया और अनुभव, जो केवल इंद्रियों की तृप्ति के लिए बनाए गए हैं मानव बुद्धि को उत्तेजित कर रहे हैं। इस निरंतर इंद्रिय-अतिभार ने दृष्टि, श्रवण, स्वाद, स्पर्श और गंध इन सभी इन्द्रियों पर हमारे नियंत्रण को अत्यंत क्षीण कर दिया है।

परिणामस्वरूप, आवेगपूर्ण इच्छाएँ निर्णय-प्रक्रिया पर हावी हो जाती हैं, जिससे ऐसे कर्म होते हैं जो व्यक्तिगत संतुलन और सामाजिक समरसता—दोनों को भंग कर देते हैं।

समय के साथ यह स्थिति स्वयं विचार-प्रक्रिया को ही विकृत कर देती है।

इस अवस्था से बाहर निकलने का मार्ग वैदिक साधनाओं के शाश्वत पथ में विस्तार से वर्णित है।

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सनातन वैदिक मार्ग की एक केंद्रीय आवश्यकता है
संस्कृत में विशिष्ट स्तोत्रों और मंत्रों का उच्चारण व जप।


मानव शरीर एक उन्नत प्रणाली के रूप में जैसा कि पहले चर्चा की गई है और जैसा कि प्राचीन हिंदू ग्रंथों में बताया गया है, मानव का भौतिक शरीर एक उपकरण है और इसकी तुलना एक अत्यंत उन्नत रोबोट से की जा सकती है। भारतीय प्राचीन ग्रंथ भी उच्च्तर उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु, मानव शरीर को एक उपकरण ही मानते हैं।

इसके केंद्र में मस्तिष्क– एक अत्यन्त उन्नत कंप्यूटर स्थित है, जो अनुभूति, विचार और निर्णय-प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ ज्ञानेंद्रियों का वर्णन करते हैं—वे अंग जो मस्तिष्क में सूचना प्रविष्ट कराते हैं:

• नेत्र
• कर्ण
• नासिका
• त्वचा
• जिह्वा

भाषा मस्तिष्क में केवल इंद्रियों के माध्यम से प्रवेश करती है: देखना, पठन या लिखित भाषा की दृश्य प्रक्रिया सुनना — बोले गए या जप किए गए शब्दों को सुनना उच्च स्वर में बोलना — जिसमें विचार-निर्माण के साथ श्रवण-प्रतिपुष्टि भी सम्मिलित होती है मस्तिष्क से कोई प्रत्यक्ष भौतिक या तारयुक्त संपर्क नहीं होता।

सभी सूचनाएँ इंद्रियों के माध्यम से ही प्रवेश करती हैं। यह समझ आधुनिक विज्ञान द्वारा मस्तिष्क को मशीनों से जोड़ने के प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक उन्नत है।

मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग को सुधारना

एक सामान्य कंप्यूटर को बाहरी उपकरणों से वायरस-मुक्त किया जा सकता है। परंतु मानव मस्तिष्क को केवल उपयुक्त इंद्रिय-इनपुट्स के माध्यम से ही सुधारा जा सकता है—विशेषकर संरचित भाषा-इनपुट द्वारा।

वेद मानव जीवन और समाज के समुचित संचालन के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में प्रकट हुए। उनमें अनेक संस्कृत स्तोत्र निहित हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए रचा गया है। कुछ स्तोत्र भक्ति की अभिव्यक्ति हैं, जबकि अन्य अत्यंत सटीक उपकरण हैं, जो भूत और वर्तमान कर्मों के प्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिए बनाए गए हैं।

प्राचीन ग्रंथ बार-बार बताते हैं कि दुःख अनेक जन्मों में संचित कर्मों से उत्पन्न होता है। ये कर्म बुद्धि की स्पष्टता को बाधित करते हैं और मानसिक प्रोग्रामिंग को विकृत कर देते हैं।

ग्रंथों में बताई गई अनेक सुधारात्मक प्रक्रियाओं में, विशेष रूप से रचित संस्कृत स्तोत्रों और मंत्रों का जप एक केंद्रीय स्थान रखता है।

इन स्तोत्रों को मानव मस्तिष्क के लिए एंटी-वायरस प्रोग्राम के रूप में समझा जा सकता है। विकृत विचार-पैटर्न को शुद्ध करके, वे स्पष्टता, संतुलन और सही निर्णय-क्षमता को पुनः स्थापित करते हैं। शुद्ध बुद्धि के साथ, मनुष्य स्वाभाविक रूप से अधिक शांत जीवन की ओर अग्रसर होता है—ऐसा जीवन जो उच्च ज्ञान, सृजनात्मकता और वास्तविक आंतरिक विकास को पोषित करता है।

इस दृष्टि से, संस्कृत केवल एक भाषा नहीं है—
यह बुद्धि शोधन व विकास की एक तकनीक है।

केवल संस्कृत ही क्यों कार्य करती है?

  यह सब केवल और केवल तभी संभव है जब स्तोत्र और मंत्र स्वयं संस्कृत भाषा में ही जपे जाएँ—न कि किसी अन्य भाषा में अनुवादित रूप में।

मंत्र और स्तोत्र अनुवाद होते ही अपनी कार्यात्मक सटीकता खो देते हैं।

अनुवाद अर्थ को तो व्यक्त कर सकता है, परंतु वह उस वर्णात्मक संरचना को सुरक्षित नहीं रख सकता, जो केवल संस्कृत में निहित है।

अर्थ गौण है; वर्ण अक्षर प्रधान है।

संस्कृत वास्तव में मानव मस्तिष्क–सुपरकंप्यूटर की स्वाभाविक भाषा है।

मानव मस्तिष्क केवल विचारों या भावनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं करता—वह संरचित वर्णात्मक इनपुट्स पर प्रतिक्रिया करता है।

संस्कृत को असाधारण सटीकता के साथ इस प्रकार अभिकल्पित किया गया है कि उसकी ध्वनियाँ, स्वराघात और छंदात्मक संरचनाएँ सीधे तंत्रिका और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के साथ अंतःक्रिया करती हैं।

यही कारण है कि संस्कृत स्तोत्र कठिन छंदों में रचे गए हैं और उच्चारण में सूक्ष्म परिवर्तन को भी परंपरागत रूप से त्रुटिपूर्ण माना जाता है। विश्व की कोई अन्य भाषा इस उद्देश्य से निर्मित नहीं की गई है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि पृथ्वी पर कोई अन्य धर्म, आस्था-प्रणाली या प्राचीन सभ्यता ऐसी तुलनीय पद्धति प्रदान नहीं करती।

कहीं और हमें भाषा का ऐसा पूर्ण, व्यवस्थित उपयोग नहीं मिलता, जो मानव बुद्धि को सुधारने, परिष्कृत करने और उन्नत करने का उपकरण हो। अन्य परंपराएँ केवल विश्वास, भावना या नैतिक उपदेश पर आधारित होती हैं।

संस्कृत-आधारित साधनाएँ इससे कहीं अधिक गहराई तक जाती हैं—वे संज्ञानात्मक प्रोग्रामिंग के स्तर पर कार्य करती हैं।

यही कारण है कि— अनुवादित प्रार्थनाएँ भक्ति उत्पन्न कर सकती हैं, पर वे वह कार्य नहीं कर सकतीं जिन के लिये मंत्र स्तोत्र इत्यादि रचे गये।

संस्कृत मंत्रों को ठीक उसी रूप में सुनना, बोलना और आत्मसात करना आवश्यक है।

वास्तविक शक्ति अनुवाद और व्याख्या में नहीं, अपितु निष्पादन में निहित है।

  संस्कृत पवित्र केवल इसलिए नहीं है कि वह प्राचीन है। वह पवित्र इसलिए है क्योंकि वह कार्यशील है।

इस संदर्भ में संस्कृत को सांस्कृतिक धरोहर नहीं, अपितु मानव बुद्धि के लिए एक सटीक तकनीक के रूप में समझना चाहिए—जिसका संसार में कहीं कोई समकक्ष नहीं है।

अतः संस्कृत स्तोत्रों और मंत्रों का चयन वैदिक ग्रंथों में निर्दिष्ट विधानों के अनुसार ही किया जाना चाहिए, न कि मनमाने ढंग से उठाकर उनका जप किया जाना चाहिए।

 संस्कृत भाषा अपने में एक पूर्ण विज्ञान है।

संस्कृत भाषा के वर्ण अक्षर सृष्टि के भौतिक अनावरण के समय ही रचे गये। अतः संस्कृत वर्णाक्षर ज्ञान मानव शरीर से सम्बंधित एक गहन विज्ञान है। हर एक संस्कृत अक्षर मंत्र रूपी है व मानव जीवन पर एक गहरा प्रभाव डालता है।

वैदिक मार्ग भी गहन रूप से संस्कृत मंत्रों इत्यादि का प्रयोग एक सुनिश्चित प्रणाली द्वारा करता है।

सृष्टि को पूर्ण रूप से समझें।

संस्कृत भाषा का
संख्याओं से संबंध

प्राचीन भारतीय ग्रंथों पर किए गए कुछ प्रारंभिक शोध कार्य अब यह दर्शा रहे हैं कि संस्कृत भाषा का गणितीय अंकों से भी गहरा संबंध है।

 पाठकों की जानकारी के लिए यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में कटपयादि नामक एक प्रणाली विद्यमान है। इस प्रणाली में संस्कृत वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर को एक निश्चित संख्या प्रदान की गई है।

संस्कृत भाषा और संख्याओं का संबंध

पाठकों की जानकारी के लिए यह जानना उपयोगी होगा कि प्राचीन संस्कृत साहित्य में कटपयादि नामक एक प्रणाली है, जिसमें प्रत्येक संस्कृत अक्षर को एक संख्या से जोड़ा गया है।

प्राचीन भारतीय साहित्य में अत्यंत रोचक श्लोक पाए गए हैं। शंकर वर्मा के ग्रंथ सद्-रत्नमाला में पाया गया एक प्रसिद्ध श्लोक नीचे प्रस्तुत है:

भद्राम्बुद्धिसिद्धजन्मगणितश्रद्धा स्म यद्ब भूपगीः।।

जब इस श्लोक में प्रयुक्त अक्षरों को विभाजित करा जाता है और प्रत्येक पूर्ण व्यंजन के लिए निर्धारित अंकों के अनुसार एक सारणी बनती है, तो यह निम्नलिखित संख्यात्मक क्रम प्राप्त होता है:

423979853562951413

जब उपर्युक्त अंकों की पंक्ति को उलटा किया जाता है, तो प्राप्त होता है:

314159265358979324

उपरोक्त संख्या गणित में π (पाई) का मान है, जो 17 दशमलव स्थानों तक सही है।

अंतिम अंक को 4 पर पूर्णांकित (राउंड ऑफ) किया गया है।

निम्नलिखित श्लोक π के मान को 31 दशमलव स्थानों तक सांकेतिक रूप में प्रस्तुत करता है:

गोपीभाग्यमधुव्रात-श्रुग्ङिशोदधिसन्धिग।
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर।।


यह श्लोक निम्नलिखित संख्या प्रदान करता है:

31415926535897932384626433832792 जो π का मान 31 दशमलव स्थानों तक दर्शाता है।

उपर्युक्त तथ्य केवल प्राचीन भारतीय ग्रंथों के एक सतही अध्ययन से ही प्राप्त हुए हैं, और संख्याओं का ऐसा सटीक सामंजस्य किसी भी प्रकार से संयोग नहीं हो सकता।

संस्कृत भाषा का उपयोग करते हुए प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ऐसे अनेक रोचक और अद्भुत प्रयोग विद्यमान हैं।

हम यह भी जानते हैं कि प्राचीन हिंदू ग्रंथों की सभी प्रार्थनाएँ संस्कृत भाषा में हैं और वे छंदों या ‘श्लोकों’ के रूप में रचित हैं। यह इस बात का संकेत देता है कि श्लोक-रचना और संख्यात्मक कूटलेखन के बीच एक अत्यंत गहरा संबंध है।

श्लोक केवल अर्थ के आधार पर ही नहीं बनाए गए हैं, अपितु वे संख्याओं की ऐसी शृंखला का भी निर्माण करते हैं, जिनका एक निश्चित उद्देश्य है—जिससे मानव जाति अभी तक अनभिज्ञ है।

वही प्रार्थना या मंत्र जब उच्चारित किया जाता है, तो वह एक विशेष विचार-प्रक्रिया उत्पन्न करता है, और वह प्रक्रिया भी संख्याओं की उसी शृंखला से जुड़ी होती है।

अब यह स्मरण रखें कि कंप्यूटर में संग्रहित समस्त डेटा गणितीय अंकों के रूप में ही होता है।

अतः मानव मस्तिष्क, जो एक विशाल कंप्यूटर के समान है, बोले गए अंकों की इन शृंखलाओं का विश्लेषण करने की क्षमता रखता है और उसके परिणामस्वरूप एक विशेष प्रकार की बुद्धि, क्षमता या कौशल उत्पन्न करता है, जिसका उपयोग व्यक्ति अपने लाभ के लिए कर सकता है।

संस्कृत भाषा और संगीत

संस्कृत भाषा का संख्याओं से संबंध केवल यहीं तक सीमित नहीं है, अपितु यह भारतीय संगीत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

कर्नाटक संगीत प्रणाली में मेलकर्ता रागों के नाम इस प्रकार रखे गए हैं कि उनके नाम के पहले दो अक्षर ही उस राग की संख्या बता देते हैं।

पाठक कर्नाटक संगीत में निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान दें:

मेलकर्ता राग 1 से 36 तक म (मध्यम) के प्रथम स्वर (Ma1) का उपयोग करते हैं, जबकि 37 से 72 तक म के द्वितीय स्वर (Ma2) का उपयोग होता है। अन्य स्वरों का निर्धारण (मेलकर्ता संख्या − 1) को 6 से भाग देकर प्राप्त भागफल और शेष के आधार पर किया जाता है।

सा और प स्वर स्थिर (फिक्स्ड) होते हैं।

रि और ग के स्वर-स्थान इस प्रकार होते हैं:

यदि भागफल 0 हो: Ri1 और Ga1
यदि भागफल 1 हो: Ri1 और Ga2
यदि भागफल 2 हो: Ri1 और Ga3
यदि भागफल 3 हो: Ri2 और Ga2
यदि भागफल 4 हो: Ri2 और Ga3
यदि भागफल 5 हो: Ri3 और Ga3

इसी प्रकार ध और नि के स्वर-स्थान भी निर्धारित होते हैं।

हम सभी जानते हैं कि संगीत मानव की विचार-प्रक्रिया और मन को शांत करने की क्षमता रखता है। यह भी सर्वविदित है कि संगीत तंत्रिकाओं को शांति प्रदान करता है। यह भी सत्य है कि भारतीय संगीत में रागों के मानक समूह हैं, जिनके आधार पर असंख्य मधुर और अद्वितीय रचनाएँ की जा सकती हैं—जैसा कि भारतीय संगीत का इतिहास प्रमाणित करता है।

इस प्रकार संगीत मानव मन के चंचलपन को कम करता है। मन की चंचलता कम होने से एकाग्रता बढ़ती है।

जैसा कि उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है, भारतीय संगीत को भी संख्याओं की शृंखला के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

संगीत जब श्रवण-प्रक्रिया के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है, तो अंततः मस्तिष्क तक पहुँचता है। अंततः मस्तिष्क ही उन संख्यात्मक शृंखलाओं को ग्रहण करता है, जिससे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर एक विशिष्ट प्रभाव पड़ता है और परिणामस्वरूप मानव बुद्धि प्रभावित होती है।

इसके विपरीत, आज का पश्चिमी संगीत मानव मस्तिष्क पर एक झकझोर देने वाला प्रभाव डालता है। यह प्रभाव मन की चंचलता को और अधिक बढ़ाता है तथा मानव मस्तिष्क को निम्नतर बुद्धि की ओर ले जाता है।

इन तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि संस्कृत भाषा कितनी वैज्ञानिक है, मानव मस्तिष्क पर इसका प्रभाव कितना महत्वपूर्ण है, और भारतीय शास्त्रीय संगीत कितना वैज्ञानिक है।

निस्संदेह, इस विषय पर गणित और संस्कृत के विद्वानों द्वारा संगठित एवं गहन शोध की आवश्यकता है।

पश्चिमी देशों में किए गए वैज्ञानिक अनुसंधान पहले ही यह दर्शा रहे हैं कि संस्कृत स्तोत्रों का जप मानव बुद्धि के स्तर को बढ़ाता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि विज्ञान, कंप्यूटर, मानव कल्याण और देवताओं के साथ हमारे संवाद का भविष्य संस्कृत भाषा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संस्कृत मानव बुद्धि की प्रोग्रामिंग की भाषा है। संस्कृत भाषा और मानव बुद्धि का संवर्धन संस्कृत एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसके माध्यम से मानव बुद्धि को वर्तमान स्तरों से कहीं अधिक उन्नत किया जा सकता है। और अधिक पढ़ें—पुस्तक में:

Sanatan Dharma: A Complete Scientific Analysis 

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