Yam & Niyamas
यम एवं नियम
यम और नियम सनातन धर्म के मार्ग के लिए निर्धारित कुछ नियम हैं।
ये कोई वैकल्पिक नियम नहीं हैं, अपितु आत्म उत्थान के माध्यम से आत्मा के उत्कर्ष के लिए अनिवार्य हैं, जिससे एक सुखी, समृद्ध और पूर्ण जीवन की प्राप्ति होती है।
ये अनुशासित जीवन के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए सिद्धांतों का एक समुच्चय हैं।
यह अनियंत्रित आधुनिक जीवन-पद्धति से एक कदम आगे है।
हिंदू दर्शन में, विशेष रूप से पतंजलि के योगसूत्रों में, यम और नियम अष्टांग योग के पहले दो अंग हैं, जो योग का आठ अंगों वाला मार्ग है।
दूसरी ओर, अष्टांग योग सनातन धर्म वैदिक प्रक्रियाओं का एक अविभाज्य वैदिक मार्ग है।
इस प्रकार यम और नियम सनातन हिंदू जीवन-पद्धति का एक अभिन्न अंग बन जाते हैं।
यह एक स्वस्थ मानव समाज में जीवन की आधारशिला हैं।
यह आगे चलकर मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि की ओर ले जाते हैं —
जो आध्यात्मिक प्रगति और अंततः आत्म-साक्षात्कार (आत्म-ज्ञान) के लिए अनिवार्य है।
इनका पालन केवल योग आसनों का अनुकरण करने वालों के लिए ही नहीं, अपितु एक सभ्य मानव जीवन-शैली के रूप में किया जाना चाहिए।
अनियंत्रित पाश्चात्य सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न समस्याओं को देखते हुए, इन सिद्धांतों का पालन केवल आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है।
आइए दोनों को विस्तार से देखें:
यम — नैतिक सामाजिक अनुशासन
यम वे नैतिक सिद्धांत हैं जो समाज और संसार के भीतर हमारे व्यवहार का मार्गदर्शन करते हैं। ये आत्म-संयम और सामाजिक-पारिस्थितिक सामंजस्य से संबंधित हैं।
1. सदैव सत्य बोलना एवं सत्य का पालन करना
• अर्थ: सभी परिस्थितियों में वाणी और कर्म में सत्यनिष्ठ होना तथा सत्य का पालन करना।
• विचार, वाणी और कर्म का सत्य के साथ सामंजस्य।
• अभ्यास: जो वास्तविक और सत्य हो वही बोलना, बिना छल, पक्षपात या अतिशयोक्ति के।
2. अहिंसा
• वास्तविक अर्थ: निर्दोष जीवों को न तो पीड़ा देना और न ही उनका वध करना।
यह उस सामान्य अर्थ से भिन्न है जिसमें अहिंसा को केवल हिंसा न करना माना जाता है।
प्राचीन ग्रंथों में अहिंसा की परिभाषा के अनुसार, जो व्यक्ति मानवता के नियमों के विरुद्ध जाता है, उसे दंडित किया जाना आवश्यक है।
अहिंसा का अर्थ पूर्ण अहिंसा नहीं है, अपितु आवश्यकता पड़ने पर विवेकपूर्वक हिंसा का प्रयोग करना है।
अहिंसा का अर्थ सार्वभौमिक प्रेम और करुणा का विकास भी है।
अर्थात सभी जीवों में परमेश्वर को देखना। यह एक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य भी है।
• अभ्यास: दया, धैर्य और सहिष्णुता के साथ-साथ अमानवीय शक्तियों को दंडित करना।
3. अस्तेय
दूसरों की छोटी से छोटी वस्तु की भी चोरी न करना
• अर्थ: जो आपका नहीं है, उसे न लेना — चाहे वह भौतिक हो या अन्य किसी रूप में।
• दूसरों की उपलब्धियों या संपत्ति के प्रति लोभ और ईर्ष्या से बचना।
• अभ्यास: जो आपके पास है, उसमें संतोष और कृतज्ञता रखना।
4. ब्रह्मचर्य
• वास्तविक अर्थ: विवाह से पूर्व यौन-संबंधों में लिप्त न होना और विवाह के पश्चात अपने जीवनसाथी के प्रति निष्ठावान रहना।
विवाह से पूर्व का जीवन किसी भी मानव के लिए सीखने और ज्ञान अर्जन के वर्ष होते हैं।
यौन शक्ति अत्यंत प्रबल होती है। यदि कोई इन निर्माण वर्षों में यौन-सुख में लिप्त हो जाता है, तो उसकी समस्त ऊर्जा और ध्यान उसी में केंद्रित हो जाता है।
इस कारण युवावस्था में व्यक्ति न तो अध्ययन पर ध्यान केंद्रित कर पाता है और न ही अपनी ऊर्जा का सही उपयोग कर पाता है।
• ब्रह्मचर्य इस ऊर्जा को भोग में न लगाकर आध्यात्मिक और नैतिक आधार के निर्माण की ओर मोड़ना है।
• अभ्यास: इच्छाओं पर नियंत्रण, सजग संबंध, और उच्च आदर्शों के प्रति समर्पण।
5. अपरिग्रह
• अर्थ: दूसरों की संपत्ति को न तो हथियाना और न ही हड़पना।
• वास्तविक अर्थ: दैवी व्यवस्था में विश्वास। जो प्राप्त है उसमें संतोष रखना और कर्म को कर्तव्य भाव से करना।
• अभ्यास: केवल आवश्यक वस्तुओं के साथ जीवन जीना और धन का उपयोग उच्च उद्देश्यों के लिए करना।
नियम — व्यक्तिगत अनुशासन
नियम
व्यक्ति के स्वयं के साथ संबंध का मार्गदर्शन करते हैं — ये शुद्धि, अनुशासन और भक्ति की प्रक्रियायें हैं।
1. शौच — शरीर की शुद्धता
• अर्थ: शारीरिक स्वच्छता।
2. संतोष (Contentment)
• अर्थ: जीवन में जो प्राप्त हो, उसे स्वीकार करना और उसमें संतुष्ट रहना।
• दैवी इच्छा को शांत भाव से स्वीकार करना।
• अभ्यास: कृतज्ञता, आंतरिक आनंद और निरंतर अधिक की इच्छा से मुक्ति।
3. तप — मन पर नियंत्रण का विकास
• अर्थ: ध्यान के मार्ग पर आरंभ करना, जिसके साथ साथ साधनाओं का मार्ग अपनाना।
वास्तव में यह मन के नियंत्रण द्वारा बुद्धि का विकास और प्रशिक्षण है। इससे धृति शक्ति का भी विकास होता है, जो मनुष्य की दूसरी मूल बुद्धि शाखा है।
• अभ्यास: वैदिक परंपरा के अनुसार ध्यान के माध्यम से मन पर नियंत्रण विकसित करना।
इसके पश्चात इस प्रशिक्षित मन का उपयोग साधनाओं के माध्यम से परमेश्वर और देवी-देवताओं से संपर्क स्थापित करने, भविष्य को सुरक्षित करने और मोक्ष की दिशा में कार्य करने हेतु किया जाता है।
4. स्वाध्याय — वैदिक और पौराणिक ग्रंथों का आत्म-अध्ययन
• अर्थ: शास्त्रों का नियमित अध्ययन, जिससे वैदिक ज्ञान की वास्तविक समझ विकसित होती है।
• शास्त्रों में निहित ज्ञान के माध्यम से अपने स्वभाव, अस्तित्व और दैवी संबंध को समझना।
• अभ्यास: शास्त्रों के पठन के द्वारा वेदों को समझना।
कुछ ग्रंथ ऐसे हैं जिन्हें पढ़ना और समझना आवश्यक है, जैसे — पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण आदि।
कुछ अन्य ग्रंथ ऐसे हैं जिनमें स्तोत्रों और मंत्रों के पाठ की सामग्री है।
वेदों में दोनों समाहित हैं — समझने योग्य ज्ञान भी और ईश्वर से संपर्क स्थापित करने हेतु मंत्रों और स्तोत्रों का भक्ति-मय, पाठ योग्य भंडार भी।
वर्तमान समय में जनमानस जिसे समझना चाहिए उसका पाठ कर रहे हैं और जिसका पाठ करना चाहिए उसे समझने का प्रयास कर रहे हैं। आज समस्त ज्ञान आपस में मिश्रित हो गया है।
5. ईश्वर प्रणिधान — ईश्वर के अस्तित्व का बोध
• ब्रह्मांड और अस्तित्व की गहन समझ के माध्यम से परम सत्ता के प्रति भक्ति और पूर्ण समर्पण।
• यह समझ विकसित करना कि परमेश्वर का अस्तित्व केवल तार्किक ही नहीं, बल्कि पूर्णतः वैज्ञानिक भी है।
• इस अस्तित्व की वैज्ञानिक समझ विकसित करना — यह कैसे उत्पन्न हुआ, कैसे संचालित हो रहा है, और इसमें मानव जीवन की क्या भूमिका है।
• अभ्यास: परमेश्वर और इस अस्तित्व के वास्तविक स्वरूप को समझने के बाद, देवी-देवताओं के अस्तित्व की भी समझ विकसित होती है और सच्ची भक्ति का अंकुर प्रस्फुटित होता है।
• इस सच्ची भक्ति के साथ साधनाओं और अन्य वैदिक अभ्यासों का पालन करना और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होना।
हालांकि कुल मिलाकर १२ यम व १४ नियम बताये गये हैं उप्लिखित यम नियम मुख्य हैं।
यम नियमों का पालन मानव जन्म ले कर मानव रूप में जीने के लिये अनिवार्य हैं, वर्तमान का आधुनिक समाज चाहे जो भी समझे।
यम व नियम वैदिक मार्ग पर चलने के लिये प्रारम्भिक आवश्यक्तायें भी हैं। पूर्ण वैदिक मार्ग समझने के लिये निम्न पृष्ठ पर जायें।